गांधी, लोहिया के बाद इक्कीसवीं सदी का एक नेता जो सेक्स पर चर्चा करने की सलाह देता था

नेहा श्रीवास्तव, इंदौर। देवी प्रसाद त्रिपाठी संक्षिप्त में कहें तो डीपी त्रिपाठी यानी डीपीटी। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के नेता और राज्यसभा सांसद लम्बे समय से कैंसर से पीड़ित थे। 2 जनवरी 2020 की सुबह दिल्ली में उनका देहांत हो गया।

एनसीपी नेता सुप्रिया सुले ने उनके निधन की जानकारी देते हुए ट्वीट करते हुए लिखा, ”डीपी त्रिपाठी के निधन के बारे में सुनकर काफी दुख हुआ। वो एनसीपी के महासचिव थे। हम सभी के मार्गदर्शक और संरक्षक थे। हम उनके परामर्श और मार्गदर्शन को याद रखेंगे, जो उन्होंने एनसीपी की स्थापना के वक्त किया था। उनकी आत्मा को शांति मिले।”

यूपी के सुल्तानपुर में जन्मे तथा 16 साल की उम्र में ही राजनीति में आए। पहले इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में गए फिर जेएनयू. स्टूडेंट यूनियन के प्रेसिडेंट चुने गए। उस समय डीपीटी वामपंथी संगठन एसएफआई से जुड़े हुए थे।

जब देश में इमरजेंसी लागू किया गया तो बहुत लोग इसके विरोध में आये जिसमें से डीपीटी भी एक थे। जब उनको गिरफ्तार करने पुलिस जेएनयू पहुंची तो डीपीटी वहां नहीं मिले। डीपीटी बाराखम्भा रोड की धोबियों की कॉलोनियों में जाकर छिप गए थे।

देवी प्रसाद सिर्फ नेता ही नहीं, एक अच्छे स्कॉलर के रूप में जाने जाते रहे थे। कई मौकों पर वो अपनी सिग्नेचर सफारी सूट पहनकर पहुंचते थे। अपने भाषणों में संस्कृत कवि कालिदास और भास से लेकर फैज़ और मीर का ज़िक्र करते थे।

28 मार्च 2018 को राज्यसभा में डीपी त्रिपाठी का आखिरी दिन था। इस दिन उन्होंने अपना आख़िरी भाषण दिया था जो बहुत वायरल हुआ। उन्होंने इस भाषण में कहा था, “कई बार सच नंगा और सख्त-खुरदुरा होता है। मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूं कि पिछले छह सालों में सदन के कामकाज का करीब 48 फीसद हिस्सा बाधा पहुंचाने और हंगामेबाजी में बर्बाद हुआ है। हंगामेबाजी को सेमी-परमानेंट रणनीति के तौर पर इस्तेमाल किए जाने की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए। लोकसभा को देखिए वो एक दिन के लिए भी स्थगित नहीं हुआ। वहीं राज्यसभा में स्थितियां सोच से भी परे हैं। हमें इसके लिए कुछ चीजें, कुछ इंतजाम करने होंगे। अध्यक्ष महोदय, ऐसे सदस्य जो कि वेल में नहीं जाते उनके साथ अच्छा व्यवहार होना चाहिए। उनका ख्याल रखा जाना चाहिए।”

फिर उन्होंने कहा कि सदन में महिलाओं की संख्या कम है, तो महिलाओं के मुद्दे सदन में क्यों नहीं उठाए जाते हैं। और महिला सदस्यों को बोलने के लिए ज्यादा वक़्त क्यों नहीं दिया जाता है?

देवी प्रसाद महिलाओं को लेकर थोड़े सजग थे वो हमेशा महिलाओं के अधिकारों की बात करते थे। कुछ ऐसे भी मुद्दे थे जिन्हें नेता-मंत्री लोग वोट कटने के डर से उस पर बात करने से भी कतराते थे वहीं डीपीटी उसपर खुल कर चर्चा करते तथा इसपर काम करने का सुझाव देते थे।

ऐसा ही एक मुद्दा सेक्स का था जिसपर उन्होंने अपने आखिरी भाषण में कहा था, “एक और भी मसला है, वो देश जहां कामसूत्र लिखा गया और जहां वात्स्यायन को ऋषि माना गया, जहां अजंता-एलोरा और खजुराहो हैं, वहां संसद ने सेक्स के बारे में सभ्य तरीके से कभी चर्चा नहीं की। हम क्यों डरते हैं? भारत में दो नेता हुए एक महात्मा गांधी, जिन्होंने अपने तरीके से सेक्स पर बात की। दूसरे राममनोहर लोहिया वो आखिरी नेता थे, जिन्होंने सेक्स के बारे में न केवल खुलकर बात की, बल्कि इसके बारे में लिखा भी।”

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