‘जब महिलाएं बड़ी संख्या में बाहर निकलती हैं, तो कानून बदल जाते हैं’-बुर्क़ा-बिंदी प्रोटेस्टर

नेहा श्रीवास्तव, इंदौर। हम नए सत्र में प्रवेश कर चुके हैं लेकिन अभी भी नागरिकता संशोधित कानून का विरोध देशभर में ज़ारी है। कई राज्य सरकारों ने भी इसके खिलाफ अपना विरोध दर्ज करवाया है।

इसी क्रम में जहाँ क्रिएटिव प्रदर्शनकारी देखे जा रहे हैं वहीं उनके प्रोटेस्ट का नामकरण भी काफ़ी रोचक हैं। दरअसल बेंगलुरु में महिलाओं ने अपने एक प्रोटेस्ट का नाम काफ़ी दिलचस्प रखा है ‘बुर्का-बिंदी’.

रविवार को बेंगलुरु के टाउन हॉल में सैकड़ों लोग बिंदी और बुर्का पहनकर नागरिकता संशोधन अधिनियम और प्रधानमंत्री के बयान का विरोध करने के लिए एकत्रित हुए। जिसके अंतर्गत पीएम ने कहा था ‘सीएए के खिलाफ प्रदर्शन करने वालों की पहचान उनके कपड़ों से की जा सकती है।’

बेंगलुरु के टाउन हॉल में, महिलाओं के नेतृत्व वाले ‘बुर्का-बिंदी’ विरोध में लगभग 1,500 लोगों का जमावड़ा देखा गया। जिन्होंने नए नागरिकता कानून और प्रस्तावित नागरिक रजिस्टर के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया।

“जब महिलाएं बड़ी संख्या में बाहर निकलती हैं, तो कानून बदल जाते हैं, लोग साथ बैठ जाते हैं और हमें नोटिस किया जाता है,” तारा कृष्णास्वामी ने विरोध के आयोजकों में से एक को भीड़ को संबोधित करते हुए कहा।

बुर्का और बिंदी पहनने वाली सैकड़ों महिलाएं, जो टाउन हॉल की सीढ़ियों पर बैठी थीं, सभी ने तारा के इस बयान पर खुशी जताई। तारा एक एक्टिविस्ट हैं।

तारा ने यह भी बताया कि कैसे हिंदू और मुसलमान एक साथ संविधान के खिलाफ़ आवाज़ उठाने और फासीवाद से लड़ने के लिए आए हैं। विभिन्न पृष्ठभूमि की बड़ी संख्या में महिला प्रदर्शनकारियों ने विरोध को अद्वितीय बना दिया है। उन्होंने एनआरसी और सीएए के खिलाफ पोस्टर लगाए और भारतीय झंडा लहराया। कुछ लोगों ने भारत के संविधान की प्रस्तावना की प्रतियां धारण कीं।

कलाकारों, गायकों, कार्यकर्ताओं और पत्रकारों की उपस्थिति के साथ-साथ मणिपुरी कार्यकर्ता इरोम शर्मिला भी शामिल थीं। एक अन्य विरोध टाउन हॉल में संशोधित नागरिकता कानून के खिलाफ़ विरोध इंजीनियर्स द्वारा आयोजित किया गया था।

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