आपका मखमली ‘पश्मीना’ अब ख़त्म हो रहा है।

नई दिल्ली

14 हजार फीट से अधिक की ऊंचाई, सर्दियों में बर्फ से पूरी तरह ढका पठार, माइनस 40 डिग्री फैरेनहाइट तक गिरकर हड्डियों तक को गला देने वाला तापमान। ऐसी दुश्कर परिस्थितियों में यह यकीन करना तक मुश्किल है कि बर्फ के विशाल रेगिस्तान में कोई जीवित भी रह सकता है। भारत और चीन के पठार पर स्थित चांगथांग का विशाल रेगिस्तान हिमालय और काराकोरम पर्वत श्रृंखलाओं के मध्य स्थित है। यह अत्यंत दुर्लभ चांगरा बकरी का घर है, जिसे हम पश्मीना बकरी के नाम से भी जानते हैं। पश्मीना ऊन, शाल व अन्य वस्तुओं के मुरीदों की दुनिया में कोई कमी नहीं है। जलवायु परिवर्तन ने बकरी की इस प्रजाति को भी अपने कोप का शिकार बना लिया है।

वैज्ञानिकों के अनुसार तमाम प्रतिकूल हालातों के साथ अब इस खास ऊन की गुणवत्ता और उत्पादकता में काफी गिरावट दिखी है।

एक शॉल में 180 घंटे

पश्मीना के लिए बसंत के मौसम में बकरियों के बालों की कटाई की जाती है। इसके बाद अच्छे फाइबर को हाथ से अलग किया जाता है। एक बार साफ करने के बाद एक कश्मीरी बकरी से उपयोगी ऊन मात्र चार औंस तक होती है। रेशों को फिर हाथ से काटा जाता है। इसके बाद ही बुनाई की प्रक्रिया शुरू होती है। एक पश्मीना शॉल बनाने में करीब 180 घंटे लग सकते हैं। वहीं बड़ी वस्तुओं को लकड़ी के करघे पर बुनाई के लिए उच्च कुशल कारीगरों को कई महीने या एक साल भी लग सकता है। फिर उन्हें दुनिया भर में निर्यात किया जाता है चांगरा बकरी के बाल की चौड़ाई महज 12 माइक्रान होती है जो इंसानी बालों से करीब आठ गुना पतले होते हैं।

मांग पूरी कर रहा चीन

चांगथांग पठार के दर्जनों घुमंतू परिवार 180 किलोमीटर दूर लेह के बाहरी इलाके में अपने गांव खरनाक से दूर चले जाते हैं। वहां चरवाहों ने अपना खानाबदोश जीवन छोड़ दिया है। यदि मौसम का यही पैटर्न जारी रहा तो यह चांगथांग पर पश्मीना बकरी पालन पर अपरिवर्तनीय प्रभाव हो सकता है। लद्दाख के चरवाहों से पश्मीना ऊन की कमी के चलते कश्मीर के बुनकरों ने अपने उत्पादों की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए चीन और मंगोलिया से कच्ची पश्मीना आयात करना शुरू कर दिया है।

जलवायु परिवर्तन से बढ़ी मुश्किलें

अब चांगपा का जीवन जीने का प्राचीन तरीका जलवायु परिवर्तन और चीन से नकली पश्मीना आयात के डर के साए में है। पिछले कुछ वषों से यहां तेजी से ज्यादा बर्फबारी हो रही है। अप्रत्याशित बर्फबारी चरवाहों के लिए बड़ी असुविधा है।

पश्मीना बकरी का क्लोन

कश्मीर विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने दुनिया की पहली पश्मीना बकरी का क्लोन तैयार किया। 2012 में नूरी का जन्म हुआ, लेकिन व्यापक रूप से क्लोन का उपयोग करने का विचार चांगपा चरवाहों के बीच विवादास्पद साबित हो चुका है। वे अपने बौद्ध विश्वासों के कारण इसे ठीक नहीं मानते हैं।

Next Post

अब हेयर ड्रायर, वैक्यूम क्लीनर और स्टीम आयरन के भरोसे है बीसीसीआई

Mon Jan 6 , 2020
नेहा श्रीवास्तव, इंदौर। आपने कई अनोखे किस्से सुने होंगे लेकिन आपने कभी बालों को सुखाने और कपड़े प्रेस करने वाले यंत्रों से क्रिकेट मैच का फ़ील्ड सुखाते हुए देखा है। हाँ पता है आप भी मेरी तरह हैरान हैं लेकिन ये बीसीसीआई की कल की हरक़त है। भारत और श्रीलंका […]