दो महीने शोषण झेल कर खुद को बचाने के लिए 2 महीने लगातार चली आदिवासी लड़की

नेहा श्रीवास्तव, इंदौर। आजकल कितना आसान हो गया है नौकरी दिलाने के बहाने किसी को गुमराह कर देना। भारत में तो शायद ये आम बात हो गयी है क्योंकि रिपोर्ट के अनुसार अगर यहाँ की बेरोजगारी दर पर नज़र डाली जाये तो ये सबसे आसान काम है।

एक गाँव का लड़का जो भरोसा दिलाता है कि वो उसे नौकरी दिलाएगा लड़की मान जाती है और उसके साथ चली जाती है। दिल्ली जाने पर लड़की को पता चलता है यहाँ तो काम दिलाने का मतलब बलात्कार होना है। दिल्ली में जिसके यहां उस लड़की को बेचा जाता है, वहां वो दो महीने तक झाड़ू-पोछा करती है।

राजधानी रांची से लगभग 400 किलोमीटर दूर बरहेट थाना है। संथाली, पहाड़िया, पड़हिया आदिवासी बहुल। बरहेट थाना से 15 किलोमीटर दूर श्रीरामपुर गांव की इस लड़की ने बताया उसके पिता नहीं हैं, उसकी मां खेत में काम करतीं हैं।

किसी की भी बर्दाश्त की एक सीमा होती है उस लड़की की भी थी। एक दिन उस लड़की के साथ चार लड़के एक साथ रेप करने की कोशिश करते हैं।

लड़की बताती है, “मुझे एक ऑफिस में रखा जाता था। मैं वहीं झाडू-पोछा लगाने का काम करती थी। रात को खरीदार मेरे साथ रेप करता था। विरोध करने पर चाकू दिखाता था। एक रात चार लड़के आ गए, वह बहुत बड़े और हट्टे-कट्ठे थे। हम तीन लड़कियां एक साथ खड़ी थीं। एक ने मेरा हाथ पकड़ा ही था, हाथ छुड़ाकर घर की खिड़की से हम तीनों कूद गईं।”


बहरहेट बाजार में जहां खरीदारी करने पहुंचते हैं आदिवास. फ़ोटो क्रेडिट- दि प्रिंट

उसने भागना शुरू किया और फिर लगातार लगभग दो महीने तक भागती रही। लगभग दो महीने पैदल चलती रही, रास्ता पता नहीं था। दिल्ली से चलती हुई वह मध्य प्रदेश के सीधी जिला पहुंच गई।

लड़की आगे बताती है कि रास्ते में किसी होटल के आगे फेका खाना खा लेती थीं। लोग पागल समझते थे, इसलिए कुछ कहते नहीं थे। नहाई नहीं तो शरीर से बदबू आने लगी थी। डर से पेड़ पर सोती नहीं थी। दिन में कभी झपकी लेती थी, फिर चलना शुरू कर देती थी।

लोगों को वो लड़की वहां बेहोशी की हालत में मिली। पुलिस आई थाने और फिर वन स्टॉप सेंटर ले गई। कमजोरी से उसकी आंखें बाहर निकली लग रही थीं। शरीर में केवल हड्डी नजर आ रही थी।

चार दिन बाद वह बोलने के हालात में आई, केवल संथाली भाषा जानती थी। हिन्दी या दूसरी भाषा न तो कभी सुना था, न ही बोली थी। बात-बात में उसके मुंह से निकल गया झारखंड।

पुलिस ने तलाशना शुरू किया। संपर्क हुआ धनबाद के युवक अंकित राजगढ़िया से, उसने अपने एक दोस्त जो संथाली जानता था, उससे उसकी बात कराई। गांव और पिता के नाम का पता चला। अंकित ने घर जाकर तस्दीक की और तसल्ली होने के बाद उसने साहिबगंज पुलिस को मामले की जानकारी दी। मामला बरहेट थाना आईपीसी की धारा 370 और 371 कांड संख्या 152/19 के तहत दर्ज की गई है।

लड़की का घर. फ़ोटो क्रेडिट- दि प्रिंट

घर में मां के अलावा भाई और उसका परिवार है। मजदूरी से ही घर चलता है, गांव के एक लड़के सृजन मुर्मू ने कहा मिशनरी में नौकरी दिलवा देगा। पांच हजार रुपए महीना मिलेगा। लड़की तैयार हो गई तथा झारखंड से पुरानी दिल्ली ले जाकर सृजन ने उसे बेच दिया। इस लड़की के साथ उसी के गांव की एक और लड़की थी। पास के गांव की भी एक लड़की थी, सब बेच दी गई थीं।

इस मामले में साहेबगंज एसपी अमन कुमार ने बताया कि इस इलाके में यह अब आम बात हो चली है। वहीं वहां के स्थानीय पत्रकार अजीत झा बताते हैं कि इस इलाके में पहाड़िया, संथाली आदिवासी लड़की का बाहर जाना और फिर वापस लौट कर नहीं आना, आम बात हो गई है। हम लोगों के लिए यह आम बात है। आए दिन खबर छापते हैं, लेकिन कुछ होता नहीं है।

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की ओर से जारी आंकड़े के मुताबिक 2018 में पूरे देशभर में मानव तस्करी के सबसे अधिक 373 मामले झारखंड में दर्ज किए गए हैं। इसमें 314 नाबालिग लड़कियों की तस्करी हुई है। दर्ज मामलों के आधार पर 158 लोगों को मुक्त कराया गया है। वहीं दूसरे स्थान पर महाराष्ट्र 311, तीसरे स्थान पर असम में 262 मामले दर्ज किए गए हैं और देशभर में कुल 2,367 मामले दर्ज किए गए हैं।

झारखंड पुलिस की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक 2013 से 2019 तक कुल 608 मामले दर्ज कराए गए। इसमें 736 महिलाएं और 182 पुरुषों को मुक्त कराया गया। वहीं इस दौरान कुल 555 मानव तस्करों को गिरफ्तार किया गया। जिसमें 355 पुरुष और 200 महिलाएं शामिल हैं।

ख़बर इनपुट- दि प्रिंट

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