बच्चे बिना किताबों के सत्र पूरा कर रहे हैं, वहीं उनको मिलने वाली किताबें कबाड़ों में बेची जा रही हैं

नेहा श्रीवास्तव, इंदौर। उत्तर प्रदेश में ‘सर्व शिक्षा अभियान’ की क्या हालत है? इसकी झलक बुधवार को बांदा में उस समय देखने को मिली, जब इस अभियान के तहत सरकारी स्कूलों में बच्चों को मुफ्त बांटे जाने वाली किताबों को कबाड़ में बेचने जा रहे लोगों को भीड़ ने पकड़ लिया।

बेसिक शिक्षा विभाग की हालत बहुत नाज़ुक हैं। जहाँ यूपी में शिक्षा की हालत दयनीय है ख़ासकर सरकारी स्कूलों की इस बीच चल रहे सत्र में बच्चों को मिलने वाली किताबें यदि कबाड़ में बेच दी जाती हैं तो आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि प्रशासन बच्चों की शिक्षा को लेकर कितनी गंभीर है। ये किताबें कहां से आई और किसने बेचा इसकी जांच अभी चल रही है।

बीते बुधवार को बांदा शहर के अतर्रा चुंग्गी के पास कबाड़ी जुबैद की दुकान में एक हजार से अधिक जूनियर स्कूल की किताबें मिली। इन्हें कबाड़ी ने बगल के ही एक मकान से छह रूपए किलो में खरीदा था। जहां से किताबें बिक्री को आई उसका नाम कबाड़ी को भी नहीं पता पर बोरों में रखी किताबें लाकर कबाड़ी अपनी दुकान में उन्हें तोल रहा था।

सातवीं और आठवीं कक्षा के पांच हजार छात्रों में बांटे जाने वाली ये सरकारी किताबें कबाड़ के भाव बिकने जा रही थीं। जिसे एक कबाड़ी ने महज 1,140 रुपये में खरीदा था। भीड़ ने ठेले में जा रही किताबों को पकड़कर इसकी सूचना जिलाधिकारी को दी, इसके बाद जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी (बीएसए) ने मौके पर पहुंचकर मौजूदा शिक्षा सत्र 2019-20 की इन 12 क्विंटल से ज्यादा किताबों को छुड़ाकर शिक्षा विभाग के कब्जे में ले लिया।

बीएसए हरिश्चन्द्र नाथ का कहना है कि मामला गंभीर है तथा इसकी जांच कर कठोर कार्रवाई की जाएगी। इसकी जांच कर 24 घंटे में कार्रवाई की जाएगी।

जिस मकान से किताबे लाई गई थी वहां तालाबंद मिला। बताया गया कि यहां बेसिक शिक्षा विभाग का ही एक कर्मचारी रह रहा है। बीएसए के पहंुचने पर वह घर से भाग निकला। बीएसए ने सभी किताबों को जब्त कर वापस गोदाम में पहंुचाया गया।

कबाड़ी की दुकान से किताबें बरामद होने के बाद यह साफ हो गया कि किताब वितरण में जमकर मनमानी हो रही है। साल का सत्र पूरा होने को है पर अभी बच्चे बिना किताबों के ही पढ़ रहे होंगे। किताब वितरण में जिम्मेदारों की भूमिका भी संदेह के दायरे मे है।

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