जब सवाल पूछने का तरीक़ा गलत होगा तब सवाल की धार कमज़ोर ही होती है

विभव देव शुक्ला

बीते दिन सोशल मीडिया पर एक वीडियो आया और चंद घंटों में वीडियो लाखों लोगों ने देख लिया। वीडियो में देश के दो जाने-पहचाने नाम थे, पहले मशहूर स्टैंड अप कॉमेडियन कुणाल कामरा और दूसरे समाचार प्रस्तोता अर्नब गोस्वामी। लोगों के लिए अब इस बात का अंदाज़ा लगाना आसान होगा कि आखिर क्यों वीडियो इतनी चर्चा में रहा। इसके अलावा वीडियो में कुछ ऐसा हुआ जिसका अनुमान कम ही लोगों को था। जो हुआ वह सही था या नहीं यह बहस का मुद्दा ज़रूर हो सकता है लेकिन जो हुआ उस पर बहस ज़ोरों पर है।

कितनी बार, क्या कहा
पूरे वीडियो में कुणाल कामरा ने अर्नब से कई सवाल किए? सवाल कितने सही थे या कितने कम सही थे यह भी बहस का मसला हो सकता है। लेकिन उससे पहले सवाल उठ रहा है कि सवाल किस तरीक़े से पूछे गए और किन हालातों में पूछे गए। वीडियो को समझने के तमाम नज़रिये हो सकते हैं लेकिन नज़रियों की लंबी कड़ी में एक पहलू कुछ ऐसा है,
1 मिनट 51 सेकेंड के वीडियो में कुणाल ने कुल तीन शब्दों का ज़िक्र कई बार किया,
Coward (कायर)
Nationalist (राष्ट्रवादी)
Journalist (पत्रकार)
इन तीन शब्दों में जिस शब्द पर सबसे ज़्यादा ज़ोर दिया गया वह था ‘Coward’। पूरे वीडियो में कुणाल ने अर्नब से सवाल करते हुए कुल 6 बार Coward शब्द का ज़िक्र किया, 3 बार Nationalist और 3 ही बार Journalist। इन आंकड़ों के मार्फत मामले को समझना किसी के लिए भी आसान होगा कि पूरी बात किन पहलुओं के इर्द-गिर्द घूमती है। लेकिन यह तो उस वीडियो से जुड़े आंकड़े थे, इनके अलावा भी वीडियो में कुछ ऐसी बातें थीं जो अहम थीं।

सवाल जिनके जवाब ज़रूरी
वीडियो की शुरुआत में ही कुणाल ने साफ कर दिया था कि उनके सवाल अर्नब की पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं। उसके बाद कई दफ़े एक ही बात आई ‘Are you a coward or journalist’ (क्या आप कायर हैं या पत्रकार)? आखिर में कुणाल ने कहा कि वह इतना कुछ रोहित वेमुला की माँ के लिए कर रहे हैं। इसलिए अर्नब को रोहित वेमुला का आत्महत्या के ठीक पहले लिखा गया 10 पन्ने का पत्र पढ़ना चाहिए। जिसकी जाति पर वह अपने कार्यक्रम में चर्चा कर रहे थे। लेकिन यह आंकड़े और दलीलें कुछ सवालों का पेट नहीं भरतीं,
क्या सवाल इस तरह ही पूछे जाते हैं?
क्या सवाल पूछने का यह तरीक़ा सही है?
सवाल और आरोप के बीच का अंतर कहाँ था?
किसी के भी साथ ऐसा होना कहाँ तक सही है?
पत्रकारिता की पढ़ाई में एक थियरी पढ़ाई जाती है, ‘सोशल रिस्पोन्सिबिलिटी थियरी’। यानी अपने समाज के प्रति एक नागरिक की क्या और कितनी ज़िम्मेदारी है? बेशक सवाल आज पूछे गए हैं और कल भी पूछे जाएंगे लेकिन मुद्दा यह है कि अहम सवाल किस तरह पूछे जाते हैं? आखिर सवालों की एक तय ज़मीन है अगर सवालों की सूरत और मिजाज़ के साथ खिलवाड़ होता है तो सवाल अपनी ज़मीन खोत देते हैं।

ऐसी ही घटना साल 2017 में
लेकिन प्रकृति के एक और नियम से मुँह नहीं मोड़ा जा सकता है कि हर मौसम ढलता ज़रूर है पर उसकी वापसी भी होती है। जो घटना बीते कल में किसी एक के साथ हुई है उसका चश्मदीद आने वाले कल में कोई और होगा। जिस तरह की घटना कुणाल कामरा और अर्नब के बीच हुई इससे मिलती जुलती घटना साल 2017 के अगस्त महीने में हो चुकी थी।
उस किस्से में माइक के इस तरफ रिपब्लिक टीवी की दीप्ति सचदेवा थीं और फ्लाइट की सीट पर थे बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव। दीप्ति ने तेजस्वी यादव से महागठबंध पर सवाल किया, जवाब में सबसे पहले तेजस्वी ने कहा यह सवाल करने की सही जगह नहीं है। फ्लाइट के भीतर मौजूद लोगों को परेशानी हो रही है।
सवाल फिर से दोहराए गए नतीजतन तेजस्वी यादव को जवाब देना ही पड़ा, उन्होंने कहा सही समय का इंतज़ार कीजिये। दीप्ति ने कहा, लोगों में आपकी तरफ से सही संदेश जाना चाहिए। आखिर में तेजस्वी ने कहा अभी सब कुछ सही है और आने वाले समय में भी सब सही रहेगा। 45 सेकेंड के वीडियो को रिपब्लिक टीवी ने ‘सुपर एक्सक्लूजिव’ कह कर दिखाया था। इस घटना के माथे पर भी उपरोक्त लिखित सारे सवाल उड़ेल दीजिये कि सवाल का तरीक़ा कितना सही था?

ज़िम्मेदारी किसकी ओर
सोशल मीडिया पर इस मसले पर दो गुट हैं, एक कुणाल कामरा को सही ठहराने वाला और दूसरा अर्नब के प्रति सहानुभूति जताने वाला। लेकिन मन के किसी कोने में सभी जानते हैं कि अर्नब के सवालों का मिजाज़ कैसा होता है और कुणाल के सवालों की सूरत क्या थी? हो सकता है बहुत से लोगों को फिलहाल के लिए कुणाल कामरा का यह कदम सराहनीय लग रहा हो लेकिन मुद्दा महज़ इतने तक सीमित नहीं है।
नज़रिये के सारे चश्मे से इतर ख़बरों से जुड़े किसी भी इंसान के साथ ऐसा होना कितना सही है? घटना के कुछ ही देर बाद नागरिक उड्डयन मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने मामले को देखते हुए आदेश जारी किया। आदेश का मतलब साफ था, कुणाल कामरा पर कार्यवाई हो और ठीक वैसा ही हुआ। सबसे पहले इंडिगो फिए एयर इंडिया, स्पाइस जेट और आज गो एयर ने कुणाल पर प्रतिबंध लगा दिया है। इसमें ज़्यादातर प्रतिबंध 6 महीने के हैं।
लेकिन इस बात को भी नकारा नहीं जा सकता कि अर्नब के चैनल में जो होता है और अर्नब जो करते हैं उसकी बानगी पूरा देश देखता है। तेजस्वी यादव के साथ फ्लाइट में जो हुआ उसमें और कुणाल कामरा वाली घटना में अंतर का दायरा बहुत ज़्यादा नहीं है। ज़िम्मेदारी न तो महज़ ख़बर परोसने वालों की और न ही महज़ ख़बर देखने-सुनने वालों की। इतनी अहम ज़िम्मेदारी महज़ चंद कंधों में निपटाई ही नहीं जा सकती है, आखिर सवाल का असर समझे बिना सवाल पूछना भी तो सवाल के वजूद के साथ बेईमानी है।

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