इस शायर को आवाम हिन्दू-मुस्लिम सरीखे मसलों पर खूबसूरती से कलम चलाने के लिए याद करेगी

विभव देव शुक्ला

देश को कवियों और शायरों ने हर कदम पर बहुत कुछ दिया है, शब्दों से लेकर विचारों तक और जागृति से लेकर क्रान्ति तक। हर कलमकार ने देश के कोरे कागज़ पर अपने हिस्से के शब्द ज़रूर खर्च किए हैं। नतीजतन हमारे आस-पास पैदा होने वाली हर बहस में वज़न बरकरार रखने के लिए शायरियों की कमी नहीं पड़ती है। ऐसे ही शायर का नाम है अजमल सुल्तानपुरी, जिन्होंने बुधवार की शाम 7 बजे ज़िन्दगी की अंतिम साँस ली।

‘मेरे बचपन का हिंदुस्तान’
अक्सर देखा जाता है कि एक रचनाकार से अधिक उसकी रचनाएँ मशहूर होती हैं, अजमल सुल्तानपुरी का किस्सा भी कुछ ऐसा ही है। गुज़रे कई सालों से सोशल मीडिया पर लोगों ने हिन्दू-मुसलमान सरीखे संजीदा मसले पर उनकी एक सुरीली शायरी का वीडियो खूब पसंद किया। शायरी में कृष्ण से लेकर राम का ज़िक्र था, बचपन से लेकर बागों का ज़िक्र था और कबीर से लेकर गालिब तक का ज़िक्र था। अजमल सुल्तानपुरी की उस गज़ल का मजमून ही यही था,
‘मेरे बचपन का हिंदुस्तान
न बांग्लादेश न पाकिस्तान
मेरी आशा मेरा अरमान, कहाँ है मेरा हिंदुस्तान
मैं उसको ढूंढ रहा हूँ।’

हिन्दी, संस्कृत और उर्दू के जानकार
हमारे देश का मिजाज़ ही कुछ ऐसा है कि शायरों की अहमियत का इल्म वक्त रहते कभी नहीं होता, न तो आवाम को और न ही हुकूमत को। इसलिए किसी शायर/कवि ने क्या खूब लिखा है “अमर होने के लिए भी इंसान को मारना पड़ता है।” अजमल साहब की कहानी का एक हिस्सा ठीक ऐसा ही है, आज से महज़ 7 साल पहले उन्हें उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी की तरफ से लाइफ टाइम एचीवमेंट अवार्ड मिला।
इतना ही नहीं अजमल साहब हिन्दी, संस्कृत और उर्दू बखूबी पढ़ते और लिखते थे। इन तीन भाषाओं के इतर उत्तर प्रदेश की मशहूर अवधी बोली के अच्छे जानकार थे, उन्होंने अवधी में भी तमाम रचनाएँ की हैं। इस खासियत के चलते अजमल साहब की सामाजिक स्वीकार्यता का दायरा बड़ा था। उनकी कृतियों में बातों से हट कर गंगा जामुनी तहज़ीब बख़ूबी नज़र आती है।

जिस घटना ने बदली ज़िन्दगी
सुल्तानपुर शहर से 15-20 किलोमीटर दूर स्थित कुड़वार बाज़ार के पास हरखपुर गाँव में जन्मे अजमल सुल्तानपुरी ने ज़िन्दगी में तमाम मुश्किलात का सामना किया। लेकिन मुश्किलात के लंबे दौर से गुज़रने के बावजूद उन्होंने कलम से इश्क नहीं छोड़ा। 1976 में उनके साथ एक घटना हुई थी जिसने उनकी ज़िन्दगी में बुनियादी स्तर पर बड़े बदलाव किए थे। अजमल साहब कट्टरता के खिलाफ़ लिखने से पहले खुल कर कहते थे और बिना संकोच कहते थे। एक बार उन्हें इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी।

कभी गाँव वापस नहीं लौटे
गाँव में किसी धार्मिक विषय पर उन्होंने साफ तौर पर विरोध दर्ज कराया। जिसके बाद लगभग 30 से 35 लोगों ने उन्हें जम कर पीटा, दुबले-पतले अजमल साहब की हालत खराब हुई। फिर पुलिस ने उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया। हालत में सुधार होने पर उन्होंने फैसला किया कि वह गाँव वापस कभी नहीं जाएंगे और वाकई पूरी ज़िन्दगी नहीं गए। गाँव के लोग उम्मीद ज़रूर करते थे कि एक न एक दिन अजमल साहब की वापसी होगी पर ऐसा कभी नहीं हुआ।

नहीं गए पाकिस्तान और अमेरिका
अजमल साहब स्वभाव के लिहाज़ से धार्मिक मुद्दों पर भले उदारवादी थे लेकिन सामाजिक मुद्दों पर तयशुदा तरीक़े से सोचते थे। कई बार उनके पास फिल्मी दुनिया से मौके आए, फिल्म से जुड़े लोगों ने उनसे फिल्मों में लिखने की गुज़ारिश की लेकिन वह नहीं माने। उनका कहना था कि आज मैं जितना लिखूंगा, कल को उस पर मेरे ही परिवार की बेटियाँ नाचेंगी। ऐसा मुझे किसी भी सूरत में क़बूल नहीं है।
अजमल साहब पूर्वोत्तर के तमाम देशों में काफी मशहूर थे, अक्सर वहाँ के मुशायरों में शायरियाँ भी पढ़ते थे। लेकिन दो देशों में शायरी पढ़ने कभी नहीं गए, पहला अमेरिका और दूसरा पाकिस्तान। इस मामले में भी उनका मत स्पष्ट था कि जिस देश से सालों पहले अलग हो गए वहाँ अब क्यों जाना? अजमल साहब मिजाज़ और अंदाज़ दोनों में बेहद पुराने थे। अतीत पर कुछ ऐसे लिखते थे कि उसकी अहमियत आने वाले कल में भी बरकारार रहे।

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