7000 दुर्लभ बीमारियों की जागरूकता के लिए चुनी गई है यह दुर्लभ तारीख़ 

विभव देव शुक्ला

आनुवांशिक रूप से मिलने वाली बीमारियाँ हमारे लिए बड़ी चुनौती रही हैं। ऐसी बीमारियों के लिए कहा भी जाता है अगर समय रहते इनकी जांच होती रहे और परामर्श लिया जाता रहे तो इन्हें काफी हद तक रोका जा सकता है। इस बारे में एक थैलेसीमिया विशेषज्ञ डॉ. गायत्री ने समाचार एजेंसी एएनआई से बात करते हुए विस्तार से जानकारी दी।

क्या कहते हैं जानकार
डॉ. गायत्री ने बात करते हुए कहा थैलेसीमिया और सिकल सेल की बीमारी का ईलाज संभव है। इन बीमारियों के कुछ वाहक होते हैं और समय रहते उनकी पहचान ज़रूरी होती है, इनकी पहचान खून की जांच के जरिये होती है। अगर इस तरह के लोग (वाहक) जिनमें इस बीमारी के लक्षण होते हैं, वह शादी करते हैं तो 25 फीसदी संभावनाएं होती हैं कि उनका बच्चा भी प्रभावित होता ही है।
लिहाज़ा इस बीमारी के लिए शुरुआत से ही सावधानी बरतनी पड़ती है। हमारा लक्ष्य यही होता है कि हम वाहकों को पहचानें, इसकी जांच बच्चा होने से पहले या शादी के पहले की जा सकती है। अगर किसी माता-पिता के बच्चे थैलेसीमिया से प्रभावित होते हैं तो परिवार के बाकी सदस्यों की जांच भी ज़रूरी हो जाती है। इसके अलावा इंडियन ऑर्गनाइज़ेशन ऑफ रेयर डिज़ीज़ की सदस्य डॉ कृष्णा राव ने भी इस बारे में जानकारी दी।

85 फीसद होती हैं आनुवांशिक
उन्होंने कहा ऐसी दुर्लभ बीमारियों को लेकर लोगों में जागरूकता फैलाने की ज़रूरत है। इसकी सबसे खास बात यही है कि यह एक दुर्लभ तारीख़ को मनाया जाता है 29 फरवरी जो खुद पूरे चार साल में एक बार आती है। इस तारीख़ को चुना भी इसलिए ही गया है क्योंकि यह खुद में दुर्लभ है और यह बीमारियाँ भी दुर्लभ हैं। हमारे समाज की एक बड़ी आबादी ने इस तरह की बीमारियों के बारे में सुना तक नहीं ऐसे में यह बेहद ज़रूरी है।
हम इनके बारे में लोगों को जागरूक करें। इसके बाद उन्होंने कहा दुनिया में लगभग 7 हज़ार दुर्लभ बीमारियाँ हैं और आंकड़ों के मुताबिक उसमें से 85 फीसद अनुवांशिक हैं। तेलंगाना में लगभग 20 लाख ऐसे लोग हैं जो इस दुर्लभ तरह की बीमारियों से जूझ रहे हैं। सबसे बड़ी दिक्कत की बात यह है कि इन बीमारियों को लेकर समाज में जागरूकता का स्तर बहुत सीमित है जिसका दायरा बढ़ाने की ज़रूरत है।

आने वाली पीढ़ियों की सुरक्षा
मोहम्मद इमरान दिव्यांग हैं, उनके शरीर की आधे से अधिक मांसपेशियाँ अच्छे से काम नहीं करती हैं। उन्होंने कहा कि उनके शरीर की कई मांसपेशियाँ काम ही नहीं करती हैं, वह खुद से न तो खड़े हो सकते हैं, न ही बैठ सकते हैं और न ही चल सकते हैं।
वह एक सॉफ्टवेयर कंपनी में काम करते थे लेकिन फिलहाल बेरोज़गार हैं, इस तरह की आनुवांशिक बीमारियों के बारे में समाज के भीतर जागरूकता ज़रूर होनी चाहिए। जिससे समय से जांच और निगरानी हो और आने वाली पीढ़ियों को इस तरह की बीमारियों से न जूझना पड़े।

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