टोरी कॉर्नर नाम रखा दद्दू तिवारी ने और सबसे पहली गेर निकाली बाबूलाल गिरि ने

कीर्ति राणा | इंदौर

जिस टोरी कॉर्नर (मल्हारगंज) से शहर की पहली गेर की शुरुआत हुई, उस तिकोने रास्तों वाले तिराहे का टोरी कॉर्नर नामकरण पुराने समाजवादी दद्दू तिवारी (गंगाप्रसाद तिवारी) ने किया। शहर की इस पहली गेर की शुरुआत कांग्रेस के पूर्व पार्षद बाबूलाल गिरि (गिरि होटल) ने की, अब उनके पुत्र शेखर गिरि इसे जारी रखे हुए हैं। इस गेर के बाद अन्य संस्थाओं ने भी गेर निकालना प्रारंभ की, उनमें भी अधिकांश आयोजक पश्चिम क्षेत्र के ही हैं।

पुराने समाजवादियों में दद्दू तिवारी का नाम जाना-पहचाना है। उनकी इस तिराहे पर नियमित रात्रिकालीन बैठक थी। ब्रिटेन में मजदूरों की राजनीतिक पार्टी का नाम टोराटोरी (गुरिल्ला) होने से उन्होंने करीब 70 साल पहले नियमित बैठक वाले इस तिराहे को टोरी कॉर्नर नाम दिया था। बस तब से मल्हारगंज की गिरि होटल वाला यह क्षेत्र टोरी कॉर्नर के रूप में पहचाना जाने लगा।

देर रात की घटनाओं की सूचना मिल जाती थी- रात की बैठक वाला प्रमुख स्थान होने से टोरी कॉर्नर पर कांग्रेस, समाजवादी, जनसंघ, भाजपा आदि दलों से जुड़े नेताओं की नियमित आवाजाही, चाय-पोहे का दौर चलता रहता था। तत्कालीन एसपी (स्व.) सुरजीत सिंह रात में एक चक्कर जरूर लगाते थे। नेता-मित्रों के साथ बातचीत में उन्हें शहर की नब्ज के साथ ही देर रात की घटना से जुड़ी अनकही बातें भी पता चल जाती थीं। पूर्व विधायक-पद्मश्री (स्व.) बाबूलाल पाटोदी, पूर्व महापौर पुरुषोत्म विजय, समाजवादी लाड़ली मोहन निगम, बस मालिक हेमराज जायसवाल, पत्रकार गोपीकृष्ण गुप्ता, कवि सत्यनारायण सत्तन, इंदौर आने पर आशुकवि निर्भय हाथरसी से लेकर समाजवादी महेश चतुर्वेदी, गांधी नगर रामायण मंडल वाले रघुवीरसिंह चौहान, भाजपा नेता गोकुलदास भूतड़ा, गिरधर गोपाल राठी, लाड़लीप्रसाद राठी, वसंत पंड्या, पत्रकार गोकुल शर्मा, आरसी सलवाड़िया, शशींद्र जलधारी, बाबूलाल गिरि की नियमित बैठक में शहर के राजनीतिक मौसम, चुनावी हवा की भी थाह पता चल जाती थी।

अपने जमाने के धुरंधर छात्र नेता-पत्रकार सुभाष खंडेलवाल (रविवार) बताते हैं टोरी कॉर्नर पर नियमित बैठक-बहस का दौर अब भी जारी है। बस, चेहरे बदल गए हैं। उस्ताद प्रेमस्वरूप खंडेलवाल, एडवोकेट जेकेटी ऐसे बैठकबाज हैं, जो रात के ठीक 12 बजे ठीये पर आते हैं। डॉ. गिरि, ओम शर्मा, दुबे वकील, भगवानसिंह चौहान, सत्तन गुरु और उनके भाई (भोपाल) शिवाजी गुरु, कृपाशंकर शुक्ला, सुरेंद्र पुरी आदि शहर ही नहीं, प्रदेश और देश से जुड़े मुद्दों पर देर रात तक चर्चा करते हैं। कई बार तो अन्य लोगों को लगता है कि झगड़ क्यों रहे हैं।

पहली गेर का श्रेय बाबूलाल गिरि को

होलकर रियासत के वक्त महाराजा रंग खेलने लाव-लश्कर के साथ शहर में निकलते थे। बाद में इस परंपरा को टोरी कॉर्नर की गेर के रूप में बाबूलाल गिरि ने शुरु किया। पानी और रंग-गुलाल उड़ाती इस गेर में जमीन से चार-छह मंजिल तक के मकानों में मिसाइल से रंग-गुलाल फेंकने का श्रेय रमेश शर्मा (बोरिंग वालों) को जाता है। उन्होंने तेज गति से बेहद ऊंचाई तक रंग फेंकने वाली मिसाइल गेर में शुरु की। इस प्रयोग को बेहद सफलता मिलने का कारण यह भी रहा कि देर तक उस हिस्से में रंगों के गुबार छा जाते थे। शहर में पहली बार 1948 में टोरी कॉर्नर से गेर निकाली गई थी। इसके बाद अन्य स्थानों से भी गेर निकलने की परंपरा शुरू हुई।

Next Post

शिवराज और मैं मिलकर एक और एक दो नहीं, ग्यारह बनेंगे : सिंधिया

Fri Mar 13 , 2020
प्रजातंत्र ब्यूरो | भोपाल मेरी दादी, मेरे पिता को ललकारा गया तो उन्होंने कड़ा जवाब दिया मैं भी वही कर रहा हूं, जनसेवा में खून-पसीना बहाने में भी पीछे नहीं हटूंगा कांग्रेस से अलग होने के बाद भाजपा में शामिल हो चुके ज्योतिरादित्य सिंधिया गुरुवार को मध्य प्रदेश पहुंचे। भाजपा […]