देश के 40% सरकारी स्कूलों में न तो बिजली, न खेल के मैदान

नई दिल्ली

देश के 40 फीसदी से भी ज्यादा सरकारी स्कूलों में न तो बिजली है और न ही खेलने का मैदान। मानव संसाधन विकास मंत्रालय से संबद्ध संसदीय समिति की रिपोर्ट से यह खुलासा हुआ है। समिति ने स्कूल शिक्षा विभाग के बजट में 27 फीसदी कटौती के लिए भी सरकार की आलोचना की है। रिपोर्ट से पता चलता है कि शिक्षा का अधिकार कानून के लागू होने के बावजूद सरकारी स्कूलों की हालत इतनी दयनीय क्यों है और लाखों छात्र बीच में ही स्कूल क्यों छोड़ रहे हैं। समिति ने बीते सप्ताह संसद में जो रिपोर्ट पेश की है वह देश में सरकारी स्कूलों की दयनीय हालत की हकीकत पेश करती है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि स्कूली शिक्षा विभाग ने सरकार से 82,570 करोड़ रुपये मांगे थे, लेकिन उसे महज 59,845 करोड़ रुपये ही आवंटित किए गए। सर्वेक्षण के ताजा आंकड़ों के हवाले से रिपोर्ट में कहा गया है कि महज 56 फीसदी स्कूलों में ही बिजली है। मध्य प्रदेश और मणिपुर की हालत सबसे बदतर है। इन दोनों राज्यों में महज 20 फीसदी सरकारी स्कूलों तक ही बिजली पहुंच सकी है। ओडिशा और जम्मू-कश्मीर के मामले में तो यह आंकड़ा 30 फीसदी से भी कम है। देश में 57 फीसदी से भी कम स्कूलों में छात्रों के लिए खेल-कूद का मैदान है। देश में एक लाख से ज्यादा सरकारी स्कूल ऐसे हैं जो अकेले शिक्षक के दम पर चल रहें है। देश का कोई ऐसा राज्य नही है जहां इकलौते शिक्षक वाले ऐसे स्कूल न हो। राजधानी दिल्ली में भी ऐसे 13 स्कूल हैं। इन स्कूलों में इकलौते शिक्षक के सहारे पढ़ाई-लिखाई के स्तर का अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है। रिपोर्ट में सरकारी स्कूलों के आधारभूत ढांचे पर भी चिंता जताई गई है। इसमें सरकार की खिंचाई करते हुए कहा गया है कि हाल के वर्षों में हायर सेकेंडरी स्कूलों की इमारत को बेहतर बनाने, नए कमरे, पुस्तकालय और प्रयोगशालाएं बनाने की प्रगति बेहद धीमी है। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि सरकारी स्कूलों से छात्रों के मोहभंग की गति और तेज हो सकती है।

चारदीवारी न होने से छात्रों की सुरक्षा पर सवाल

समिति ने कहा है कि 31 दिसंबर, 2019 तक किसी भी सरकारी हायर सेकेंडरी स्कूल में एक भी नई कक्षा नहीं बनाई जा सकी है। यह हालत तब है जबकि वर्ष 2019-20 के लिए 1021 नई कक्षाओं के निर्माण को मंजूरी दी गई थी। इसी तरह 1343 प्रयोगशालाओं के अनुमोदन के बावजूद अब तक महज तीन की ही स्थापना हो सकी है। पुस्तकालयों के मामले में तो तस्वीर और बदतर है। 135 पुस्तकालयों के निर्माण का अनुमोदन होने के बावजजूद अब तक एक का भी काम पूरा नहीं हुआ है। लगभग 40 फीसदी स्कूलों में चारदीवारी नहीं होने की वजह से छात्रों की सुरक्षा पर सवालिया निशान लगे हैं।

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