काशी के घाट का वह फनकार जिसने ‘शहनाई से संगीत और संगीत से ख़ुदा तक का सफ़र तय किया’

विभव देव शुक्ला
प्रजातंत्र, इंदौर

मशहूर शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खान के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने “शहनाई से संगीत और संगीत से खुदा तक का सफर तय किया ।” चाहे काशीविश्वनाथ के मंदिर में कोई बड़ी पूजा हो या मोहर्रम के मौके पर करबला के शहीदों को याद करना हो । उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की शहनाई हर मौके पर उतनी ही गर्मजोशी के साथ फिज़ा में घुलती थी ।

पंडित भीमसेन और बिस्मिल्लाह खान की अनूठी दोस्ती

उनके साथ एक और खास बात यह थी कि उनकी शुरूआत हमेशा ‘राग यमन’ से होती थी । पंडित भीमसेन जोशी और उस्ताद बिस्मिल्लाह खान बहुत अच्छे दोस्त थे । पंडित भीमसेन जब भी बनारस आते तो दोनों साथ में गंगा नदी जाते और साथ में डुबकी लगाते थे । जो ज़्यादा डुबकियाँ लगाता था उसे वहाँ पर पूजा करने वाले पंडे दही जलेबी खिलाया करते थे ।

पंडित भीमसेन का आख़िरी कार्यक्रम

दोनों लगभग 40 साल तक एक दूसरे से नहीं मिले थे लेकिन जब मिले तो एक दूसरे को देख कर तुरंत रोने लगे । इतनी लंबी दोस्ती के बावजूद दोनों का कभी कोई साझा कार्यक्रम नहीं हुआ था, फिर तय हुआ कि दोनों एक मंच साझा करेंगे । इत्तेफाक से यह पंडित भीमसेन जोशी का आख़िरी कार्यक्रम था ।

जो पत्थर मंदिर में लगा है वही तो मज़ार में भी लगा है

पंडित बिस्मिल्लाह खान ने अपने एक साक्षात्कार में कहा कि मंदिरों के दरवाजे पर जो पत्थर लगा हुआ है, जिस पर हम गंगा जल छिड़कते हैं, फूल चढ़ाते हैं । वही पत्थर तो मजार में भी लगा होता है न, मैं कहीं भी हाथ रखूँ, एक जैसा ही है । वह अक्सर भिखारियों को देख कर रोने लगते थे और उन्हें बनारस का दूसरा कबीर भी कहा जाता था ।

मामू से लिया शहनाई का इल्म

उस्ताद बिस्मिल्लाह खान को शहनाई बजाने का इल्म अपने मामू से हुआ । उनके मामू का शहनाई बजाने का किस्सा बेहद दिलचस्प है । पहले वो गायक बनना चाहते थे, फिर उन्हें समझ आया कि तमाम बेहतरीन गायक पहले से ही मौजूद हैं । फिर उन्हें लगा कि कोई साज़ पकड़ा जाए, इसमें भी जब उनकी निगाह सितार, सरोद और सारंगी पर गईं उन्हें समझ आ गया कि यहाँ भी दिग्गजों की भरमार है ।

शहनाई को नवाज़ा ताल और राग से

आखिर में बिस्मिल्लाह खान के मामू ने सबसे कम नज़र आने वाला साज़, शहनाई पकड़ा और इसे संगीत के सरगम से नवाज़ा । बिस्मिल्लाह खान का मानना था कि शहनाई में गायकी भी है और ठुमरी भी, ताल भी है और राग भी । भले यह साज़ लोगों की निगाह में न पड़ता हो लेकिन इसके रंग सबसे अलग हैं ।

एक साधे सब सधे, सब साधे सब जाए

बनारस के घाट पर रियाज़ करते हुए उस्ताद बिस्मिल्लाह खान अक्सर कहा करते थे ‘एक साधे सब सधे, सब साधे सब जाए ।’ यानि मेहनत करनी है तो किसी एक विधा में करनी चाहिए और आखिर तक करनी चाहिए । जब अगस्त साल 2006 में उस्ताद बिस्मिल्लाह खान इस दुनिया से मरहूम हुए तब हर पंथ और हर कौम की आँखों में आँसू थे ।

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