आठ महीने से प्रेग्नेंट हूं दवाई तक नहीं मिल रही है, न दवा है न खाना

नेहा श्रीवास्तव, इंदौर।

कोरोना का असर सब पर पड़ा है वहीं अगर दिल्ली के शेल्टर होम की बात की जाए तो इस वक़्त यहाँ के हालात बहुत ख़राब है।

दरअसल कोरोना के कारण सरकार ने लॉकडाउन के निर्देश दिए गए हैं जिससे मजदूरों के सामने सबसे बड़ी समस्या रहने खाने की आ गयी है। कुछ मज़दूर अपने घर पैदल ही रवाना हो गए हैं वहीं बाकी मजदूरों ने रैन बसेरे में शरण लेने पहुंचे हैं। अब तादात इतनी है कि जहां 50 लोगों के लिए व्यवस्था है वहां लगभग 5000 लोग रहने को मजबूर हैं। हालांकि केबिन के अंदर गद्दे मुहैया कराए गए थे।

अब गद्दों के बाद इनके पास जो सबसे बड़ी समस्या है वो सोशल डिस्टेंस का है। इसके लिए वो एक मीटर की दूरी पर सो तो रहे हैं लेकिन जगह का अभाव के कारण लोगों को पाईप लाइन के पास सोना पड़ रहा है। वहीं लॉकडाउन की घोषणा होने के बाद 2000 लोगों के यहां शरण की मांग की है।

इन शेल्टर होम में स्वच्छता सामग्री का अभाव एक चिंता का विषय है। शेल्टर होम के मैनेजर उदय यादव ने इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए बताया, “इस एरिया में कई परिवार हैं जो दिन में आते हैं और यहां मौजूद लोगों को फल और स्नैक्स देते हैं। इसके साथ ही सरकारी आपूर्ति निरंतर हो रही है। लेकिन इसके अलावा हमें इन इलाकों में संक्रमण कम करने के लिए हमें साबुन, सेनेटाइजर और मास्क की आवश्यकता है।”

अभी तक यहां कोरोना से लड़ने के लिए बेसिक सुविधा भी उपलब्ध नहीं हो पाई है। वहीं यहां पानी की समस्या से भी लोग जूझ रहे हैं।

वहीं शेल्टर होम का एक दूसरा पहलू दिल्ली के मोतिया ख़ान में एक रैन बसेरे में रह रही 25 साल की सकोली बतातीं हैं, “आठ महीने से प्रेग्नेंट हूं। दवाई तक नहीं मिल रही है, न दवा है न खाना। सरकार से खाना पहुंचाने की गुज़ारिश है।”

सकोली जैसी आधा दर्जन के करीब महिलाएं प्रेग्नेंट हैं। एक महिला का शुक्रवार को यानी नौंवा महीना पूरा होने वाला है लेकिन कोरोना महामारी की वजह से किए गए 21 दिन के लॉकडाउन में इनके रैन बसेरे के बाहर ताला लगा दिया गया है और ऐसे सैंकड़ों बड़े, बूढ़ें, महिलाएं और बच्चे बिना खाना, पानी और मेडिकल सुविधा के यहां कैद हैं।

दिल्ली के सदर बाज़ार से तकरीबन आठ किलोमीटर की दूरी पर पुश्ते के पास कई रैन बसेरे हैं। जहां अधेड़ और बुजुर्ग मर्द तकरीबन 5000 की संख्या में हैं। ये आंकड़ा एक पुलिस वाले ने नाम न छापने की शर्त पर दिया। मोतिया ख़ान के लोगों से लेकर पुश्ता के रैन बसेरे वालों ने एक सुर में कहा, “कोरोना तो बाद में मारेगा, इससे पहले भूखे मर जाएंगे।”


जब लोगों की संख्या बढ़ी है तो शेल्टर होम पर तैनात कर्मचारी की ड्यूटी 10 घंटे से बढ़कर 18 घंटे हो गयी है।

ख़बर इनपुट-दि प्रिंट 

Next Post

80 देश आर्थिक मंदी से बचने के लिए लगा रहे हैं गुहार, पूरी दुनिया इसकी चपेट में

Sat Mar 28 , 2020
नेहा श्रीवास्तव, इंदौर। कोरोना वायरस संक्रमण और लॉकडाउन से कई देश जूझ रहे हैं। जिसका असर अर्थव्यवस्था पर पड़ा है और बेरोज़गारी का संकट भी अचानक बेतहाशा बढ़ा है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ़) की प्रमुख क्रिस्टलिना गोर्गिवा ने शुक्रवार को एक ऑनलाइन प्रेस वार्ता में कहा, “यह स्पष्ट है कि […]