कुछ नहीं तो कम से कम मज़हब की ही बात मान लो…

हेमंत शर्मा

एक धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति की तीसरी ‘सांप्रदायिक’ टिप्पणी

हदीस : हज़रत अब्दुर्रहमान बिन औफ़ के मुताबिक, हज़रत मुहम्मद (स.) ने फ़रमाया कि “अगर आप को पता लगे कि किसी जगह महामारी फैली है तो उस जगह मत जाओ और अगर ये महामारी उसी जगह फैली है जहां आप हो तो उस से बचने के लिए बाहर मत जाओ।”
(सही बुख़ारी – वॉल्यूम 7, किताब 71, नंबर 626)

नीतिशास्त्र : नीतिशास्त्र के सबसे बड़े ध्वजवाहक आचार्य चाणक्य ने स्पष्ट तौर पर कहा था- यदि शत्रु अदृश्य है तो छुप जाइये।

चरक संहिता : महर्षि चरक ने सैकड़ों वर्ष पूर्व चिकित्सकों को कहा था कि उनका कर्तव्य है कि हर परिस्थिति में वे मरीज का ईलाज करें।

धर्म, नीति और विज्ञान तीनों इस वक्त एक साथ कह रहे हैं कि बाहर मत निकलिए, खुद को घर में बंद रखिए और जरूरी है तो चिकित्सक के पास जाकर ईलाज करवाइये क्योंकि वह अपनी जान की परवाह किए बगैर अपने उस धर्म का पालन कर रहा है जिसे दुनिया के हर धर्म ने सबसे पहले रखा है- इंसानियत।

अफसोस इस बात का है कि अपने वक्त के इस सबसे नाजुक दौर में भी हम धर्म, नीति और विज्ञान को नज़रअंदाज कर, आंखों पर पटि्टयां बांधे अपने परिवार के साथ खुद को ईलाज से महरूम रखकर उस अंधे कुएं की तरफ जा रहे है जिसकी परिणति सिर्फ मौत है। क्योंकि हम इतने जाहिल हैं कि खुद कुछ पढ़ना-समझना नहीं चाहते। हम ऊपर वाले के प्रति इतने बेगैरत हैं कि उसकी दी हुई जान को कुछ बेअक्ल और हमसे बड़े जाहिलों के कहने पर दांव पर लगाने को तैयार हैं।

और इसका कारण क्या है? पहला कारण यह है कि हमारे वजनदार मज़हबी रहनुमाओं ने बिना रोशनदान की कोठरी के भीतर डाईबिटीज़ की ऐलोपैथिक गोलियां खाने के बाद अपनी दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए और ‘टूथ पीक’ से दांतों के बीच सफाई करते हुए कहा है- कहीं मत जाइये, मौत आनी है तो कोई बचा नहीं पाएगा।

और दूसरा कारण, ऐसे शैतानी मैसेज हैं जो कह रहे हैं कि कोरोना के नाम पर मुस्लिम बस्तियों से मुसलमानों को जांच के लिए ले जाएंगे और वहां कोरोना पॉजिटिव की फर्जी रिपोर्ट बनाकर रोक लेंगे। फिर काफ़िर ज़हर का इंजेक्शन लगाकर मार देंगे।

क्या कोई भी पढ़ा-लिखा हिंदू-सिख-मुस्लिम या इसाई इस बात पर यकीन करेगा कि भारत में कोई भी सरकार ऐसा कर सकती है? क्या किसी सरकार के प्रति आपका इतना अविश्वास और डर आपको पूरे भारतीय जनमानस से अलग-थलग नहीं कर रहा? आपके चंद लोगों के दिमाग में बैठा ये फितूर पूरी कौम का कितना नुकसान कर रहा है और आगे भी करेगा- इसका कोई अंदाज़ा भी लगाया है आपने?

मैं मोदी सरकार के दसियों निर्णय से इत्तेफ़ाक नहीं रखता लेकिन एक भारतीय और एक हिंदू होने के नाते मैं यह सवाल तो आपसे कर ही सकता हूं कि ज़रा बताइये- इस सरकार ने आने के बाद आप पर कौन-कौन से ज़ुल्म ढा दिए? अपने तीस साल के पत्रकारिता के पेशे में एक बात जो मैंने 2002 से 2010 के बीच मुंबई में देखी वह तो और ज्यादा खतरनाक थी। देश भर में उस समय जगह-जगह बम विस्फोट हो रहे थे और मुंबई में तो सबसे ज्यादा। क्या आप उस विदेश से अपने घर छुटि्टयां मनाने आए ख़्वाज़ा यूनुस की कहानी भूल गए जिसे महाराष्ट्र पुलिस ने पिकनिक मनाते हुए उठाया था और फिर पुलिस लॉकअप में उसकी मौत हो गई? तब वहां भाजपा की सरकार थी या कांग्रेस की? केंद्र और राज्य में दोनों जगह मौजूद कांग्रेस की सरकारों ने तब देश भर में मुस्लिम लड़कों पर जितने जुल्म ढाए, वह अपने आप में किसी जनसंहार से कम नहीं था।

यहां उस बात का जिक्र इसलिए नहीं है कि कांग्रेस को भी भाजपा के बराबर साबित करना है बल्कि इसका मकसद आपको यह स्पष्ट करना है कि भाजपा को यदि आप दुश्मन मानते हैं तो कांग्रेस भी कोई आपकी दोस्त नहीं है। राहुल गांधी ने कोरोना को लेकर ट्वीट किया और घर बैठ गए। वे चाहते तो अपनी पार्टी के निचले स्तर तक के नेताओं को कहते कि आप लोगों को घरों से बाहर आने को कहें, जांच कराने को कहें। लेकिन वे घर में बैठ गए क्योंकि उन्हें पता है कि कोई भी सरकार वही करती जो भाजपा सरकार कर रही है।

बस यह बात आपको नहीं पता। क्योंकि आप भूल गए कि आपकी पवित्र किताब इल्म यानी पढ़ने के हुक्म से शुरू हुई है। लेकिन आप न तो इतिहास पढ़ते हैं और न विज्ञान। अब यह मत कह दीजिएगा कि यह तो पूरी कौम पर तोहमत लगा रहे हैं। बात यहां सिर्फ उनकी हो रही है जो मज़हब की आड़ में जांच नहीं करवा रहे और जिनकी तालीम सिर्फ फिरकापरस्तों ने की है। परेशानी यह है कि जिस ईलाज को हमें विज्ञान में ढूंढना चाहिए उसे हम मज़हब में ढूंढने लगते हैं। फिलहाल जो चल रहा है वह धर्म का तो मुद्दा ही नहीं है। निज़ामुद्दीन मरकज़ में जो लोग थे वे बेहद धार्मिक थे। हो सकता है नेक भी हों। लेकिन देश का सवाल यह है कि उनसे कोरोना फैला या नहीं? और जैसे ही यह बात उठाई गई तो आप ‘विक्टिम कार्ड’ खेलने लगे। सोशल डिस्टेंसिंग की बात कही जाने लगी तो आपको बुरा लगने लगा।

अरे भाई, आप पैगंबर मोहम्मद साहब की बात मान लो, चाणक्य की बात मान लो, चरक की बात मान लो, राहुल गांधी की बात मान लो- ईलाज तो करवा लो। ईलाज करने टीम आती है, आप फिर पत्थर फेंकने लगते हो। फिर पुलिस सख्ती करती है तो कांग्रेस को याद करने लगते हो।

एक बात खुले दिमाग से समझना जरूरी है। वह यह कि यदि कांग्रेस की सरकार होती तो वह भी यही करती। अब भी समय है- ईलाज कराओ। अपने मज़हब और घर में रोशनदान बनाओ, फिर देखो इल्म की रोशनी से मुल्क और कौम कैसे रोशन होते हैं…।

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