कोरोना वायरस के कारण शेरपाओं के रोजी-रोटी पर संकट

नई दिल्ली

हिमालय की तलहटी में बसा खुमजुंग इस समय एवरेस्ट पर चढ़ाई करने वाले पर्वतारोहियों से भरा रहता है। कोरोना वायरस के कारण दुनिया भर में तालाबंदी है और हिमालय की चढ़ाई भी बंद है। शेरपाओं के लिए रोजीरोटी का संकट पैदा हो गया है। कई मशहूर शेरपाओं का घर इसी कस्बे में है। अब तक यहां कोरोना का कोई मामला सामने नहीं आया है। हिमालय के इस इलाके में लेकिन वैसे ही तालाबंदी चल रही है क्योंकि हवाई यात्राओं पर रोक के कारण कोई पर्वतारोही यहां नहीं आया।

17 साल की उम्र से एवरेस्ट पर चढ़ते आ रहे फुरबा न्यामगाल शेरपा को अपने भविष्य की चिंता सता रही है। यही हाल सैकड़ों दूसरे गाइडों और कुलियों का भी है। रस्सियां और फावड़े खुमजुंग के घरों की छतों पर पड़े हैं।

पर्वतारोहियों और ट्रेकिंग करने वालों से भरे रहने वाले हॉस्टल और चाय की दुकानें खाली पड़ी हैं। 8,848 मीटर की ऊंचाई पर चढ़ने से पहले लोग यहीं पर वातावरण में खुद को ढालते हैं। नेपाल ने 12 मार्च से पर्वत पर चढ़ने के सारे अभियानों पर रोक लगा दी, वास्तव में उसने अपने पर्वतों की चोटियों की तालाबंदी कर दी है। इसका मतलब है कम से कम 40 लाख अमेरिकी डॉलर के राजस्व का नुकसान जो नेपाल को चढ़ाई के परमिट रूप में मिलता है। एक परमिट की कीमत ही करीब 11000 डॉलर है। आमतौर पर शेरपा अपने परिवार में कमाने वाले अकेले सदस्य होते हैं और उनके सामने ज्यादा बड़ी समस्या है। एवरेस्ट पर चढ़ाई का मौसम अप्रैल में शुरू हो कर मई के आखिर तक चलता है। शेरपाओं की सीजन में 5 से 10 हजार डॉलर की कमाई होती है इससे उनका पूरे साल का खर्च चलता है। फिलहाल बेस कैंप वीरान पड़ा है।

ऐसे में उनके सामने पूरे साल के लिए इस स्थिति से लड़ने की चुनौती होगी। एक शेरपा ने एक समाचार एजेंसी से कहा, “हम पहाड़ों में अपनी मर्जी से नहीं जाते, हमारे पास काम का बस यही जरिया है।” 31 साल के इस शेरपा की 26 साल की बीवी है और छह साल का बेटा। वह आठ बार एवरेस्ट की चोटी पर गया है और दर्जनों पर्वतारोहियों को वहां तक पहुंचने में मदद की है। आमतौर पर शेरपा इस समय तक एवरेस्ट के बेस कैंप में पहुंच जाते हैं। वहां सैकड़ों लोग पर्वत पर चढ़ाई के लिए अच्छे मौसम के इंतजार में होते हैं। पिछले साल 885 लोग एवरेस्ट पर पहुंचे थे जो एक रिकॉर्ड है।

2020 में कम से कम 20 लाख लोगों के आने की उम्मीद थी जो अब ध्वस्त हो गई

कोरोना वायरस के कारण बेस कैंप में कोई नहीं है, कैंप से पहले आखिरी कस्बा नामचे बाजार भी खाली पड़ा है। गाइड, कुली, रसोइये और दूसरे लोग यहां तक आते हैं और फिर खाली हाथ लौट जाते हैं। केवल शेरपा ही परेशान नहीं है। नेपाल की जीडीपी में करीब आठ फीसदी की हिस्सेदारी पर्यटन की है। कम से कम 10 लाख लोगों को इसकी वजह से रोजगार मिलता है। नेपाल अब भी 2015 के भूकंप की त्रासदी से उबरने की कोशिश कर रहा है। 2020 में कम से कम 20 लाख लोगों के आने की उम्मीद थी जो अब ध्वस्त हो गई है। बावजूद इसके लोग यही मान रहे हैं कि सरकार का फैसला सही है। यहां संक्रमण का सचमुच खतरा है। वसंत के मौसम में सैकड़ों विदेशी पर्वतारोही और ट्रेकर आते हैं। बेस कैंप में ये लोग नेपाली लोगों के आसपास ही रहते हैं।

Next Post

लॉकडाउन के चलते एयर इंडिया के 200 कर्मचारियों का कॉन्ट्रैक्ट रद्द

Fri Apr 3 , 2020
नेहा श्रीवास्तव, इंदौर।  कोविड-19 महामारी की वजह से सबसे अधिक धक्का एविएशन सेक्टर को लगा है। यही कारण है कि अब एक-एक कर लगातार कई कंपनियों ने अपनी वर्कफोर्स में कटौती करने का ऐलान किया है। एअर इंडिया ने अपने 200 पायलटों के कॉन्ट्रैक्ट को सस्पेंड कर दिया है। वरिष्ठ […]