तीन दिन में एक ही परिवार के दो सदस्यों की बिना इलाज मौत

कीर्ति राणा | इंदौर

मेडिकल अनदेखी की इंतहा : तीनों अस्पतालों ने भगा दिया

कोरोना के भय का आलम यह है कि सामान्य मरीजों को अस्पताल में भर्ती करने या उनका उपचार करने से भी स्थानीय अस्पताल आनाकानी कर रहे हैं। पुलिस और प्रशासन का सहयोग भी ऐसे मरीजों की मदद में सहायक साबित नहीं हो रहा। मधुबन कॉलोनी निवासी समाधिया परिवार के दो सदस्यों की तीन दिन के दौरान मौत हो गई। ये परिवार अपने इन सदस्यों को भर्ती कराने के लिए तीन किलोमीटर से अधिक दूरी वाले एक से दूसरे अस्पताल में भटकता रहा, लेकिन कोरोना के भय के चलते किसी ने भर्ती नहीं किया। संभागायुक्त आकाश त्रिपाठी ने मरीजों की जान से खिलवाड़ करने वाले इन अस्पतालों पर सख्त एक्शन के साथ ही एसडीएम से जानकारी मंगाने को भी कहा है।

अन्नपूर्णा थाना क्षेत्र में 4, मधुबन कॉलोनी निवासी बसंत समाधिया का परिवार इस सदमे से उबर नहीं पाया है। इसी परिवार के धीरेंद्र समाधिया (56) लंबे समय से टायफाइड के मरीज थे। 2 अप्रैल को उन्हें सांस लेने में तकलीफ हुई, परिजन ने अन्नपूर्णा थाने से मदद मांगी। टीआई सतीश द्विवेदी और एसडीएम जूनी इंदौर शाश्वत शर्मा पहुंचे। परिजन अपनी कार में धीरेंद्र को लेकर पहले यूनिक अस्पताल गए, मरीज को सांस लेने में तकलीफ के चलते अस्पताल वालों को संदेह हुआ कि कहीं कोरोना पीड़ित न हो और भर्ती करने से इनकार कर दिया। यहां से एप्पल और फिर गोकुलदास अस्पताल ले गए। प्रशासन द्वारा लैब सील किए जाने के चलते सैंपल लेना, जांच करना संभव नहीं जैसी असमर्थता बताते हुए लौटा दिया गया। मधुबन कॉलोनी से इन तीन अस्पतालों में भटकने में इतना अधिक वक्त लग गया कि समय रहते बेहतर उपचार न मिल पाना वालीबॉल प्लेयर रहे धीरेंद्र समाधिया की मौत का कारण बन गया।

उनके भानजे प्रणव भारद्वाज ने ‘प्रजातंत्र’ से चर्चा में बताया मामा के निधन की जानकारी लगने पर नानी मीनाक्षी समाधिया (70) वर्ष की भी तबीयत बिगड़ गई। वहीं 4 अप्रैल को दादी की तबीयत भी बिगड़ गई। काफी देर तक परिजन और पुलिस एम्बुलेंस 108 को कॉल करते रहे, करीब पौन घंटे बाद गाड़ी आई। पहले यूनिक अस्पताल ले गए। टीआई द्विवेदी और एसडीएम शर्मा ने तो पूरा सहयोग किया, लेकिन अस्पताल वालों ने अंदर ही नहीं घुसने दिया। इस पर गोकुलदास और विशेष अस्पताल ले गए। अस्पताल प्रबंधन को शंका थी कि कहीं कोरोना पीड़ित न हो। उनका कहना था एमवाय अस्पताल से रैफर करा लाइए। इसके बाद ही एडमिट कर सकेंगे। इस सारी झंझट के चलते नानी ने एम्बुलेंस में ही दम तोड़ दिया। अन्नपूर्णा थाना प्रभारी सतीश द्विवेदी के मुताबिक समाधिया परिवार द्वारा मदद मांगे जाने की सूचना मिलने पर एसडीएम शर्मा और मैं पहुंच गए थे। एम्बुलेंस आने में किन कारणों से विलंब हुआ, कह नहीं सकते। अस्पताल वालों की अपनी समस्या थी।

नौ लोगों के सैंपल लिए, जिनकी रिपोर्ट आना बाकी

समाधिया परिवार में सांस संबंधी लक्षण के चलते तीन दिन में हुई दो मौत के बाद चौकन्ने हुए प्रशासन ने इस परिवार के 9 सदस्यों के सैंपल तो मेडिकल टीम ने 4 अप्रैल को ही ले लिए थे। इन सैंपलों की रिपोर्ट आना बाकी है। परिवार के लोग भी रिपोर्ट का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं।

बीमारों को इन अस्पतालों द्वारा रैफर करना था रेड कोड वाले एमआरटीबी में

जिला प्रशासन ने शहर के अस्पतालों को रेड, येलो और ग्रीन इन तीन कोड वाली श्रेणी में बांट दिया है। प्रशासन के स्पष्ट निर्देश हैं कि कोई अस्पताल मरीजों को भर्ती करने से इनकार नहीं कर सकता। यदि मरीज की प्रारंभिक जांच में कोरोना संदेही वाले लक्षण (सर्दी-खांसी-बुखार) पाए जाते हैं तो वह ऐसे मरीज को रेड या येलो कोड वाले अस्पताल के लिए रैफर कर सकता है। इन दोनों मृतकों के मामले में उल्टा हुआ, इन अस्पतालों ने यह दबाव बनाया कि पहले एमवायएच से रैफर करा के लाओ (कि सामान्य मरीज हैं) फिर एडमिट करेंगे।

टीआई-एसडीएम का भी प्रभाव नहीं पड़ा!

तीन दिन में एक ही परिवार के दो सदस्यों की मौत वाले इस मामले में टीआई और एसडीएम ने तो परिवार की मदद की, लेकिन यह सहयोग भी जान बचाने में कारगर साबित नहीं हुआ। ये दोनों अधिकारी यदि समय रहते अपने अधिकारों का सख्ती से पालन कराते या अस्पताल प्रबंधकों की बहानेबाजी की जानकारी देते या मरीजों को पहले सीधे एमवायएच ही ले जाया जाता तो संभवत: जान बच जाती।

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