क्या कस्तूरबा को जीवन भर गांधी के महात्मा होने बोझ उठाना पड़ा?

नेहा श्रीवास्तव, इंदौर।

कहावत है एक सफल आदमी के पीछे औरत का हाथ होता है।
लेकिन इस कहावत का मर्म उन तमाम औरतों से पूछना चाहिए जो अपने जीवनसाथी को सफल बनाने में खर्च हो जातीं हैं। ऐसी ही एक महिला थीं कस्तूरबा कपाड़िया जो गांधी बनने के बाद ऐसी खर्च हुईं कि एक तबका उनके खुद के सरनेम के साथ नहीं पहचान पाता था।

गांधी के महात्मा होने के पीछे वाली कस्तूरबा

कस्तूरबा महात्मा गांधी की पत्नी तो थी पर उनकी अपनी भी एक अलग पहचान थी वो समाज सेविका की थी। 14 साल की उम्र में ही कस्तूरबा की शादी महात्मा गांधी से करा दी गई पर उनके गंभीर और स्थ‍िर स्वभाव के चलते उन्हें सभी ‘बा’ कहकर पुकारने लगे। ये बात लगभग सभी जानते हैं कि गांधीजी ने गरीब और पिछड़े वर्ग के लिए काम किया पर यही वो महिला थीं जो दक्ष‍िण अफ्रीका में अमानवीय हालात में भारतीयों को काम कराने के विरुद्ध आवाज उठाया था।

अगर आप गांधी जी के पूरी जीवनी पर ध्यान दें तो गांधी महात्मा बनने में एकदम सफल हुए लेकिन पति के तौर पर वो नाकाम थे।

साल 1922 में स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ते हुए महात्मा गांधी जब जेल चले गए तब स्वाधीनता संग्राम में महिलाओं को शामिल करने और उनकी भागीदारी बढ़ाने के लिए कस्तूरबा ने आंदोलन चलाया और उसमें कामयाब भी रहीं। 1915 में कस्तूरबा जब महात्मा गांधी के साथ भारत लौटी तो साबरमती आश्रम में लोगों की मदद करने लगीं। आश्रम में सभी उन्हें ‘बा’ कहकर बुलाने लगे। दरअसल, ‘बा’ मां को कहते हैं।

दरअसल 14 साल की कस्तूरबा कपाड़िया की शादी 13 साल के मोहन से हुई थी। मोहन दास बैरिस्टर बने, विलायत गए। किसी आम पत्नी की तरह कस्तूरबा भी बहुत खुश हुई होंगी।  मोहन धीरे-धीरे गांधी बन गए और वो कस्तूरबा से ‘बा’ बन गईं वहीं मोहन महात्मा, बापू और गांधी बाबा बन गए। इसके साथ इन चीजों को निभाने की उनकी जिद और जिम्मेदारी भी बढ़ती गई। हो सकता है ये उनकी मजबूरियां भी हो सकती थीं लेकिन इन सबके बीच बा चुपचाप गांधी के साथ बनी रहीं।

कस्तूरबा ने जब पहली बार साल 1888 में बेटे को जन्म दिया तब महात्मा गांधी देश में नहीं थे। वो इंग्लैंड में पढ़ाई कर रहे थे। कस्तूरबा ने अकेले ही अपने बेटे हीरालाल को पाल-पोस कर बड़ा किया। कस्तूरबा अपने सारे फर्ज निभाते हुए आगे बढ़ती रही। वहीं गांधी पति और पिता के तौर पर हर पड़ाव पर फेल होते रहे।

गांधी के होने के बाद बेटे से दूर हो गए

गांधी के महात्मा हो जाने पर बा के साथ-साथ उनके बेटे हरिलाल को भी इसका हर्जाना भरना पड़ा। उनके बेटे ने अपने पिता को अमीरी से गरीबी के तरफ़ जाते देखा है। हरिलाल का बचपन गांधी के अमीरी वाले दौर में गुजरा फिर गांधी सत्याग्रह के मार्ग पर चल पड़े अब गांधी को हरिलाल का स्कूल भेजना भी अपने उसूलों के खिलाफ जाने वाली बात लगने लगी उन्हें स्कूल छुड़वाकर घर पर ही पढ़ाया जाने लगा।

हरिलाल को ब्रिटेन जाकर पढ़ने के लिए स्कॉलरशिप मिली लेकिन गांधी ने मना करते हुए कहा गांधी के लड़के की जगह किसी ज़रूरतमंद को मिले ये जगह। इसके अलावा एक बार बा अफ्रीका में रहना चाहती थीं और गांधी भारत आना चाहते थे। ज़ाहिर है कि गांधी की ही चली और बा को मन मारना पड़ा इन दो घटनाओं के बाद हरिलाल और गांधी के बीच की दूरी बढ़ती चली गई, जो कभी खत्म नहीं हुई। कस्तूरबा अब बाप-बेटे के बीच में पिसती रहीं।

जब महात्मा गांधी ने एक पति के तौर पर बात की

प्रोफेसर स्टेनले वोलपार्ट ने अपनी किताब में लिखा है कि गांधी बा की मौत के बाद काफी टूट गए थे। लगभग अवसाद की स्थिति में गांधी बीच-बीच में खुद को थप्पड़ मारते और कहते ‘‘मैं महात्मा नहीं हूं…मैं तुम सब की तरह सामान्य व्यक्ति हूं और मैं बड़ी मुश्किल से अहिंसा को अपनाने की कोशिश कर रहा हूं।’’

गांधी जी ने बा के बारे में लिखा है, ‘‘मुझे अपनी पत्नी को आदर्श स्त्री बनाना था। वह साफ बने, साफ रहे, मैं जो सीखूँ, सीखे मैं जो पढ़ूँ, पढ़े और हम दोनों एक-दूसरे में ओत-प्रोत रहें। यह मेरी भावना थी, वे निरक्षर थीं, स्वभाव की सीधी, स्वतंत्र, मेहनती और मेरे साथ कम बोलने वालीं। उन्हें अपने अज्ञान पर असंतोष नहीं था। मैंने अपने बचपन में उनको कभी यह इच्छा करते हुए नहीं पाया कि जिस तरह मैं पढ़ता हूँ, उस तरह वह खुद भी पढ़ें तो अच्छा हो। उन्हें पढ़ाने कि मेरी बड़ी इच्छा थी, लेकिन उसमें दो कठिनाइयाँ थी-एक तो बा की पढ़ने की भूख खुली नहीं थी दूसरे बा अनुकूल हो जातीं तो भी उस जमाने के भरे-पूरे परिवार में इस इच्छा को पूरा करना आसान नहीं था।’’

बा की दर्दनाक मृत्यु

11 अप्रैल 1869 को पैदा हुई कस्तूरबा गांधी  की मृत्यु 22 फरवरी 1944 हुई थी, पर ये सामान्य मृत्यु नहीं थी।

अनिमेष द लल्लनटॉप के अपने एक आर्टिकल में लिखते हैं कि कस्तूरबा को ब्रॉन्काइटिस की शिकायत थी। फिर उन्हें दो दिल के दौरे पड़े और इसके बाद निमोनिया हो गया, इन तीन बीमारियों के चलते बा की हालत बहुत खराब हो गई।

डॉक्टर चाहते थे बा को पेंसिलिन का इंजेक्शन दिया जाए। गांधी इसके खिलाफ थे। गांधी इलाज के इस तरीके को हिंसा मानते थे और प्राकृतिक तरीकों पर ही भरोसा करते थे। बा ने कहा कि अगर बापू कह दें तो वो इंजेक्शन ले लेंगी। गांधी ने कहा कि वो नहीं कहेंगे, अगर बा चाहें तो अपनी मर्ज़ी से इलाज ले सकती हैं। गांधी के बेटे देवदास गांधी भी इलाज के पक्ष में थे वो पेंसिलिन का इंजेक्शन लेकर भी आए तब बा बेहोश थीं और गांधी ने उनकी मर्ज़ी के बिना इंजेक्शन लगाने से मना कर दिया। एक समय के बाद गांधी ने सारी चीज़ें ऊपरवाले पर छोड़ दीं। 22 फरवरी 1944 को महाशिवरात्रि के दिन कस्तूरबा गांधी इस दुनिया से चली गईं।

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