ऑस्ट्रेलिया में 70 हजार भारतीयों के सामने भुखमरी जैसे हालात

कैनबरा

महामारी का असर स्टूडेंट वीजा पर गए भारतीयों के सामने संकट, नौकरी गई, खाना-पीना भी हुआ मुश्किल, सरकार ने मदद से हाथ खींचे

ऑस्ट्रेलिया में करीब 70 हजार भारतीय ऐसे हैं जो स्टूडेंट वीजा पर हैं। कोरोना संकट के बीच उन्हें कोई सरकारी मदद नहीं मिल रही है। इन भारतीयों के लिए लगभग भूखे मरने की स्थिति पैदा हो गई है। स्टूडेंट वीजा पर होने का अर्थ है कि उन्हें कोई सरकारी मदद नहीं मिलेगी, जैसी कि ऑस्ट्रेलिया के स्थायी निवासियों को मिलती है। मसलन, स्थायी निवासियों के लिए शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं मुफ्त हैं। नौकरी जाने की स्थिति में उन्हें आर्थिक मदद भी मिल रही है। व्यापारियों को भी विशेष मदद दी जा रही है, लेकिन स्टूडेंट्स के लिए ऐसी कोई सुविधा नहीं है। बल्कि, सरकार ने स्पष्ट कह दिया है कि उन्हें अपने बारे में खुद ही सोचना होगा। ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन ने कहा है कि अस्थायी वीजा पर रहने वाले लोगों को अपने बारे में खुद ही सोचना होगा क्योंकि उनकी प्राथमिकता ऑस्ट्रेलियाई हैं। मीडिया से बातचीत में उन्होंने कहा, “जब स्टूडेंट्स पढ़ने के लिए ऑस्ट्रेलिया आते हैं तो वे लिखित में देते हैं कि उनके पास एक साल तक अपना खर्च उठाने के लिए पर्याप्त धन है।”

ऑस्ट्रेलिया के गोलबर्न शहर में रहने वाले मनबीर सिंह ऐसे ही भारतीयों में से हैं। उनके दो बच्चे हैं, लेकिन नौकरी नहीं है। उनको घर का किराया देना है। खाना-पीना और रोजाना का बाकी सामान चाहिए। डॉक्टरों को देने के लिए पैसे चाहिए। यूनिवर्सिटी की फीस देनी है, लेकिन सरकार से कोई मदद नहीं मिलेगी। कोरोना ने मनबीर की जिंदगी में ऐसी उथल-पुथल मचाई है कि अब कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा। ऐसी ही कहानी ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले हजारों भारतीयों की है। कोरोना वायरस के कारण लॉकडाउन का असर लाखों लोगों पर पड़ा है। काम-धंधे बंद हैं और हजारों लोगों को नौकरी से निकाल दिया गया है। स्थायी निवासी और नागरिक को करीब तीन हजार ऑस्ट्रेलियन डॉलर प्रतिमाह की मदद सरकार दे रही है। पर जो अस्थायी वीजा पर ऑस्ट्रेलिया में रह रहे हैं जैसे कि स्टूडेंट्स, उनको यह सुविधा नहीं है।

व्यवहारिक सच्चाई, तथ्यों से अलग

समस्या यह है कि व्यवहारिक सच्चाई, कागजों पर लिखे तथ्यों से एकदम अलग है। ऑस्ट्रेलिया या फिर दुनिया के किसी भी देश में पढ़ने के लिए जाने वाले भारतीय इस भरोसे के साथ जाते हैं कि वहां नौकरी करेंगे और अपनी पढ़ाई का खर्च भी उठाएंगे। यह भरोसा उन्हें उस मार्किटिंग के दौरान भी दिया जाता है, जो विदेशी यूनिवर्सिटी उन्हें आकर्षित करने के लिए जोर-शोर से करती हैं। एजेंट इन स्टूडेंट्स को बताते हैं कि विदेशों में बहुत काम है और छोटे-मोटे कामों में भी बहुत पैसा मिलता है। इसलिए खर्चे की चिंता मत करो। इस भरोसे के साथ लाखों लोग कर्ज लेकर भी विदेश जाते हैं।

समुदाय और यूनिवर्सिटी बने सहारा

ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले स्टूडेंट्स के लिए इस वक्त सबसे बड़ा सहारा यहां के भारतीय समुदाय हैं। हर शहर में ऐसे कदम उठाए गए हैं कि किसी स्टूडेंट को परेशानी ना हो। जैसे कि बहुत से भारतीय रेस्तराओं ने उनके लिए मुफ्त खाना उपलब्ध कराना शुरू कर दिया है। विभिन्न संगठनों ने उनके किराए आदि की जिम्मेदारी उठाई है। समूह बनाकर मनबीर जैसे लोगों तक पहुंचने की कोशिश की जा रही है। ‘एडॉप्ट एन इंडियन स्टूडेंट कोविड-19 सपोर्ट ग्रुप’ नामक संगठन की कोशिश है कि हर जरूरतमंद को एक परिवार मिल जाए जो उसकी देखभाल करे।

फिलहाल उड़ानें बहाल होने का इंतजार

ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले बहुत से भारतीय स्टूडेंट्स ऐसे हैं जो स्वदेश लौट जाना चाहते थे। चूंकि पढ़ाई बंद हो गई है या क्लास ऑनलाइन हो रही हैं, तो जिनकी नौकरियां चली गई हैं वे भारत जाना चाह रहे हैं, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया क्योंकि भारत सरकार ने सीमाएं बंद कर दीं। सैकड़ों स्टूडेंट्स ने तो टिकटें भी बुक करवा रखी थीं। बहुत से लोगों ने सरकार से मदद की औपचारिक मांग भी की। एक पत्र लिखा गया कि उन्हें एयरलिफ्ट करा लिया जाए, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

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