कमल दल में तुलसी का नया दौर… इंदौर को कोरोना से उबारना बड़ी चुनौती

प्रशांत कालीधार | इंदौर

मालवा की राजनीति के नए समीकरण का आगाज स्वास्थ्य मंत्री रहते बीमारी को लेकर सिलावट जो नहीं कर पाए उसका मौका फिर मिला

कमल दल में तुलसी को फिर कोरोना चैलेंज मिला है। सरकार ने पुराने स्वास्थमंत्री तुसली सिलावट को अपने ही शहर को पटरी पर लाने का वह बड़ा अवसर दिया है जिसकी गंभीरता को वे पाला बदलने की जद्दोजहद में बैंगलुरु में बैठ के समझ नहीं पाए थे। पाला बदलना भी एक तरह का संक्रमण काल ही होता है। इसमें अच्छे-बुरे प्रभावों की चिंता खाए जाती है। पर वह दौर जाता रहा। अब नया दौर है। इसमें इंदौर को संभालना बड़ी जिम्मेदारी है।

तुलसी सिलावट इंदौर को बखूबी समझते हैं। जो कंटेंनमेंट एरिया है उनकी नब्ज और बीमारी फैलने की गंभीरता को भी जानते हैं। ऐसे में प्रशासन को बीमारी काबू करने में उनके अनुभव काम आ सकते हैं। सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता भी यही है और यही कारण है कि समूचे संभाग से केवल उन्हें मंत्री बनाये जाने का संताप भी भाजपा के पुराने और प्रबल दावेदार नेताओं के चेहरे पर नजर नहीं आ सकता। कारण साफ है संक्रमण काल में ऐसे तमाम नेताओं के चेहरों पर भी मास्क चढ़े हुए हैं, वे चाहकर भी बोल नहीं सकते। अभी बोल तो सिलावट भी नहीं सकते। वक़्त दूसरा होता तो उनके पोर्टफोलियो के लिए महाराज खुद इशारा करते क्योंकि वे जिस सिपहसालार को डिप्टी सीएम बनाना चाहते थे उसका जिक्र तो पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजयसिंह खुद कर चुके थे। हो सकता है महामारी के बुरे दौर से निपटने के बाद उन लोगों की मुराद भी जल्द पूरी हो पाए जो पुनः मंत्री बनने की चाह में अपनी विधायकी को भी दांव पर लगा चुके हैं।

लंबे वनवास के बाद कमल भी खिले

बात कमल दल की हो रही है तो कमल पटेल को कैसे भूल सकते हैं। आज उनका मंगल हुआ है। लम्बा वनवास झेलने के बाद सत्ता में ऐसे लौटने की आस उन्हें नजदीक से जानने वालों को भी न थी। मगर राजनीति में चुप्पी और सहनशीलता का अपना महत्व होता है। कमल पटेल को इस संक्रमण काल में वह संजीवनी मिल गई जिसकी आस को खत्म करने में उन्हीं के कुनबे ने कोई कसर न छोड़ी थी।

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