ये शख्स काम पर जाते वक्त एक ही दुआ मांगता है कि ‘भगवान मुझे डूबने से बचा लेना’

नेहा श्रीवास्तव, इंदौर।

कोरोना वायरस का कहर थमने का नाम नहीं ले रहा है। देश में संक्रमितों का आंकड़ा  1 लाख के पार पहुंच गया है। ऐसे में देश में 31 मई तक लॉकडाउन बढ़ा दिया गया है। अब इस लॉकडाउन में जिसकी हालत ज्यादा खराब हुई है वो हैं मजदूर और मजबूर लोग जिनको अपने घर के लोगों का पेट भरने के लिए बाहर निकलना ही पड़ रहा है।

इन सबके बीच एक ऐसा मजबूर शख्स है जो रोज भगवान से दुआएं मांगते हुए अपने काम पर जाता है। उसकी दुआ में बस एक ही बात रहती है कि आज वो डूबने से बच जाए ताकि अपने बीमार माता पिता की देखभाल कर सके।

एक मजबूर व्यक्ति जो रोज भगवान से खुद के बचने की दुआ मांगता है

इस मजबूर व्‍यक्ति का नाम संजय पाल है जो पश्चिम बंगाल के पश्चिम बर्धवान में रहते हैं। वह नदिया जिले में स्थित ज्‍वैलरी की एक दुकान में काम करते हैं। वह अमूमन काम पर जाने के लिए नाव से नदी पार करते हैं। लेकिन पिछले 20 दिनों से लॉकडाउन के कारण नाव सेवा बंद है और वह तैरकर नदी पार करके काम पर जा रहे हैं।

संजय पाल ने पश्चिम बर्दवान में अपने गृहनगर से फोन पर पीटीआई को बताया, “मैं एक अच्छा तैराक नहीं हूं, लेकिन मेरे पास कोई और विकल्प नहीं है। मेरे परिवार में पांच लोग हैं। मेरे माता-पिता बेड से उठ नहीं सकते। ऐसे में मैं ही परिवार को पालन-पोषण करने वाला एकलौता शख्‍स हूं। मैंने हुगली नदी में कुल दो घंटे तैरकर काम पर जाता और आता हूं।”

हर रोज संजय पाल जल्‍दी से नाश्‍ता करके हुगली नदी के किनारे पहुंचते हैं और वहां अपने कपड़े उतार कर स्‍वीमिंग वाले कपड़े पहनते हैं। नौकरी वाले कपड़े वह एक पॉलीथिन में रखते हैं और उसे शरीर से बांधकर नदी पार करते हैं।

जितने दिन दुकान बंद पगार भी बंद

संजय बताते हैं, “मैं नदी पार करते वक्त भगवान से यही प्रार्थना करता हूँ कि भगवान मुझे डूबने से बचा लेना।”

संजय पाल सिंह को अपने ऑफिस आने-जाने के लिए लगभग 2 घंटे तक नदीं को तैरकर पार  करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि मेरे पास कोई और विकल्प नहीं है।मेरे माता-पिता बेड से उठ नहीं सकते। ऐसे में मैं ही परिवार को पालन-पोषण करने वाला एकलौता शख्‍स हूं।

महीने में 10 हजार रुपये कमाने वाले संजय दुकान पहुंचकर अपने कपड़े सुखाते हैं और 4 बजे वापस इसी तरह अपने घर आते हैं। जितने दिन दुकान बंद रही उतने दिन की उन्‍हें कोई भी पगार नहीं मिली।


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