जहां आज भी औरतें माहवारी के दिन गोशाला में बिताती हैं वहां मेंस्ट्रुअल हाइजीन की सारी बहस फेल है

नेहा श्रीवास्तव, इंदौर।

औरत के जीवन का एक अहम हिस्सा पीरियड है लेकिन हमें बचपन से ही इस पर गर्व करने के बजाए इसके धब्बों से शर्माना बताया गया है। मुझे यकीन है कि जब भी किसी लड़की को पहली बार पीरियड आया होगा वो किसी ना किसी बात से घबराई होगी।

आज मेंस्ट्रुअल हाइजीन डे है। आज इस पर तमाम चर्चाएं होगी इससे जुड़ी कई जानकारियां बतायी जाएंगी लेकिन इसको फॉलो करने में हम हर बार नाकाम होते हैं शायद इसलिए भारत में पीरियड के दौरान साफ सफाई का ध्यान केवल 36 प्रतिशत महिलाएं ही दे पातीं हैं।

पीरियड आने के पहले या बाद में साफ सफाई का ध्यान देने की बात तो छोड़िए कई जगहों पर तो पीरियड आयी महिलाओं को स्वीकार भी नहीं किया जाता क्योंकि वो उनके धर्म के खिलाफ होता है। भारत के उत्तराखंड में भी एक ऐसा गांव है जहां महिलाओं के मुश्किल दिनों में उसे एक गंदे कमरे में अकेले छोड़ दिया जाता है।

हरियाणा की एक लड़की जो उत्तराखंड के इस परंपरा को तोड़ देती है


प्रतीकात्मक तस्वीर। फ़ोटो सोर्स- सोशल मीडिया

एक लड़की जो खुद हरियाणा के एक गांव में पली बढ़ी है लेकिन जब वो उत्तराखंड पहुंचती है और वहां स्त्रियों के हालात देखती है तो वो अपने आप को रोक नहीं पाती वहां की स्त्री व्यवस्था पर सवाल उठाने से।

मोना सिंह जो एक स्टूडेंट हैं और ‘चलत मुसाफिर’ नामक एक हिंदी ट्रेवलॉग में बतौर ट्रेनी काम करती हैं। मोना कहती हैं, “मैं जैसे ही उत्तराखंड के रोतांग पहुँची तो लॉकडाउन की घोषणा हो गयी अब मुझे थोड़ी चिंता हो रही थी और खुशी भी थी कि इसी बहाने मैं यहाँ की संस्कृति-सभ्यता और यहां के खान पान से रूबरू हो पाऊंगी लेकिन हुआ इसके उलट।”

मोना आगे दुःखी होते हुए बताती है, “मुझे तब बहुत धक्का लगा जब मुझे पता चला कि जहाँ मैं ठहरी थी उसी के पास एक घर की महिला अपनी पीरियड्स के कारण 2 साल की छोटी सी बेटी के साथ गोशाला में रह रही है। उसे 3-4 दिनों के लिए घर के अंदर आने की अनुमति नहीं है। और कारण पूछने पर आस पास के लोग बड़े शान से बोलते हैं (जिसमें महिलाएं भी शामिल हैं) उसकी उपस्थिति घर को अशुद्ध कर देगी इसलिए उसे दूर रखा गया है।”

एक चौदह साल की लड़की को गोशाला में रखा जाता है


जागरूकता तथा जांच कैंप। फ़ोटो सोर्स- डॉक्टर मधुलिका

वहीं एक चौदह साल की एक लड़की जिसे पीरियड्स के बारे में अभी ठीक से कोई जानकारी नहीं है उसे वहां रखा जाता है जहां रोशनी ना के बराबर है और हाइजीन के नाम पर उसके आस पास केवल कचड़ा ही है।

मोना आगे बताती है जब मुझे भी वहां एक महीने से ज्यादा दिन हो गया तो वो लोग मुझसे भी पूछने लगे कि आपका माहवारी कब आता है? मैंने अचकचाते हुए बताया कि आने वाला है तो मुझे भी इस रिवाज को फॉलो करने का दबाव बनाया जाने लगा। मुझे बोला गया कि आपको भी गांव से दूर रहना पड़ेगा। मैंने मना किया तो वो लोग और ज्यादा दबाव बनाने लगे।

मैं वहाँ मार्च के महीने में गयी थी और अभी भी यहीं हूँ मैंने उन औरतों से बात की जो माहवारी में गोशाला में रह कर लौटीं थीं। उन्होंने बताया यह यदि किसी ने उसे पीरियड्स में छुआ है तो उस व्यक्ति को अपनी अशुद्धता को दूर करने के लिए गंगा स्नान करना पड़ता है। इसके साथ ही वे इसे अपनी किस्मत मानती हैं।

वहां की औरतें इसे अपना सौभाग्य मानती हैं


जागरूकता तथा जांच कैंप। फ़ोटो सोर्स- डॉक्टर मधुलिका

मैंने उन्हें देखा है जब उन्हें घर से बाहर कर दिया जाता है, तो वो इन दिनों के अकेलेपन को हर महीने झेलतीं हैं ऊपर से इसे अपना सौभाग्य मानती हैं, जो कि वाकई में दिल तोड़ने वाला है। पीरियड्स यहाँ की महिलाओं के लिए एक सजा ही है।

बेडशीट और कंबल जो वे उपयोग करते हैं, उन्हें वो धो देतीं हैं ताकि अन्य लोग पीरियड्स में इसका उपयोग कर सकें। एक महिला अपने चेहरे पर कोमल मुस्कान लिए मुझसे कहती है, “वे कम कपड़े का उपयोग करतीं हैं ताकि धोने के लिए ज्यादा कपड़े ना हों।” लेकिन दिक्कत यह है कि यहां इस प्रथा को कोई बदलना नहीं चाहता।

डॉक्टर हाइजीन को लेकर क्या कहती हैं

डॉक्टर मधुलिका जो दिल्ली गवर्नमेंट हॉस्पिटल में काम करती थीं वो बताती हैं कि, “मेरे पास अक्सर ऐसे पेशेंट आते हैं जिनको हाइजीन के बारे में पता रहता है लेकिन एक दिन मेरे पास एक ऐसी पेशेंट आयी जो खुद अपनी समस्या तक नहीं बता पा रही थी उसकी समस्या उनकी मां बता रही थीं।”


जागरूकता तथा जांच कैंप। फ़ोटो सोर्स- डॉक्टर मधुलिका

अक्सर हम कपड़े के इस्तेमाल करने को नकारते हैं। लेकिन कुछ लोगों के पास पैड उपलब्ध नहीं होता है तो वो कपड़े को इस्तेमाल कर सकतीं हैं लेकिन केवल सूती कपड़ा हो ये ध्यान में रखना चाहिए साथ ही जब हम उसको धोते हैं तो केवल पानी से नहीं बल्कि डिटर्जेंट या डिटॉल से धोएं और धूप में ही डालें।

डॉक्टर मधुलिका कहती हैं कि जो पैड यूज़ करती हैं उनको कम से कम दिन में तीन दफे बदलना चाहिए। अक्सर इंडियन मेंटेलिटी होती है कि अगर हम नहीं बदलते हैं तो क्या ही दिक्कत हो जाएगा लेकिन यहीं से असल दिक्कत शुरू होती है। मधुलिका अब नोयडा में प्राइवेट प्रैक्टिस करतीं हैं।

माहवारी और हाइजीन के रिपोर्ट्स तो और भी डरावने हैं

वहीं अगर फैक्ट्स और रिपोर्ट्स की बात करें तो 70 प्रतिशत महिलाएं इस प्राकृतिक क्रिया को गंदा मानती हैं अर्थात शर्मनाक मानती हैं।

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार 57.6 प्रतिशत भारतीय महिला सैनिटरी पैड का उपयोग करती है जबकि 62 प्रतिशत अभी भी कपड़ा, राख, घास, जूट व अन्य सामग्रियों पर निर्भर हैं। 24 प्रतिशत किशोरियों अपने पीरियड्स के दौरान विद्यालय में अनुपस्थिति दर्ज कराती हैं। मासिक धर्म में बरती लापरवाही से भारत में सर्वाइकल, कैंसर की वृद्धि का होना भी देखा गया है।

88 प्रतिशत भारतीय महिलाएं अभी भी सेनिटरी नैपकिन इस्तेमाल नहीं करती और ग्रामीण क्षेत्रों में उनमें से 68 प्रतिशत को उचित ज्ञान ही नहीं है।

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