नेहरू ने घोषणा की थी कि वे देश के प्रथम सेवक हैं

आनंद मोहन माथुर

हम आजाद हुए। 14 और 15 अगस्त 1947 के दरमियानी रात को 12 बजे से कुछ क्षण पहले जवाहरलाल नेहरू जो भारत के पहले प्रधानमंत्री नियुक्त किए गए थे उन्होंने भारत की संसद में घोषणा की थी : ‘‘बहुत बरस हुए हमने भाग्य से जो वक्त मुक़र्रर किया था, वह अब आ गया है, जब हम अपनी प्रतिज्ञा को पूरी तरह से नहीं तो कुछ हद तक पूरा करेंगे। अब आधी रात को घण्टा बजेगा और दुनिया सोती होगी तब भारत आज़ाद होकर नई जिंदगी हासिल करेगा। इतिहास में ऐसा क्षण कभी कभी ही आता है जब हम प्राचीनता से नवीनता की तरफ कदम उठाते हैं। अब भविष्य आराम और विश्राम का नहीं है, वरन अनेक बार ली गई प्रतिज्ञाओं और आज ली जाने वाली प्रतिज्ञा को पूरा करने के लिए लगातार कोशिश करने का है। भारत की सेवा का मतलब करोड़ों पीड़ितों की सेवा है। इसका मतलब है गरीबी, अशिक्षा और अवसर की असमानता का खात्मा।

हमारी पीढ़ी के सबसे बड़े आदमी की आकांक्षा थी कि हर आँख का आंसू पोंछा जाए, यह वक्त ओछी और नुकसानदेह आलोचना का नहीं है, न दूसरों की बुराई और नुक्ताचीनी का। हमारे स्वतंत्र भारत की एक ऐसी आलीशान इमारत बनाना है जिसमें भारत के हर बच्चे को रहने को जगह हो।’’

15 अगस्त 1947 को नेहरू ने रेडियो पर राष्ट्र के नाम एक सन्देश प्रसारित किया। नेहरू की आँखों में एक सपना था वह उस दिन पूरा हुआ इसलिए उन्होंने कहा था कि 15 अगस्त का दिन शुभ और मुबारक दिन है, वो जो सपना उन्होंने बरसों से देखा था वो हमारी आँखों के सामने आया, दिल हमारा खुश होता है कि एक मंजिल पर हम पहुँचे, लेकिन हमारा सफर खत्म नहीं हुआ और अभी बहुत मंजिलें बाकी हैं।

इस दिन हम एक आजाद मुल्क के आजाद लोग हैं। नेहरू ने कहा कि वे एक सरकारी हैसियत से बोल रहे हैं , लेकिन जो असल नाम मेरा है वह है कि मैं भारत की जनता का प्रथम सेवक हूँ और जिस हैसियत से मैं बोल रहा हूँ वो आपने मुझे दी है, गौर करने की बात है कि यदि आज के जमाने को उस जमाने से तुलना करें तो नेहरू ने अपने आप को प्रथम सेवक कहा था और वर्तमान प्रधानमंत्री ने प्रधानसेवक कहा था। मंत्रिमंडल के मंत्रीगण भी सेवक हैं लेकिन चूंकि प्रधानमंत्री सेवकों में प्रथम है इसलिए उन्होंने अपने आप को प्रथम सेवक कहा।

प्रधानसेवक में एक अहंकार झलकता है और एक ऊँचे पद का अहसास होता है, नेहरू में विनम्रता थी और वर्तमान प्रधानमंत्री में एक शक्तिमान व्यक्तित्व का अहसास होता है। नेहरू ने कहा था कि हमारा मुल्क तो आजाद हो गया लेकिन हमे बड़ी जिम्मेदारियों का सामना करना है, हमें गरीबी दूर करना है बीमारी दूर करना है, अनपढ़ापन दूर करना है। नेहरू के ख्याल में आजादी एक सियासी चीज नहीं है और वह तब तक आजादी नहीं है जब तक जनता का फायदा न हो।

नेहरू व्यक्तिगत जिंदगी में, कहा जा सकता है कि बड़े कंजूस थे। उनका एक किस्सा है कि उनका नौकर नत्थू उनके फटे मोजे सिल रहा था। इसी समय मौलाना आजाद आ गये और उन्होनें नत्थू से पूछा कि ये क्या कर रहा है, तो वह बोला कि साहब ने कहा था कि अभी ये मोजे पहने जा सकते है जहाँ फटे हैं वहाँ से सिल ले। जवाहरलाल में समानता दिमागी चीज नहीं, एक जिंदगी जीने का तरीका था। नत्थू भले ही उनका नौकर था लेकिन वे नत्थू का बड़ा ख्याल रखते थे। एक बार वो बाहर गए थे और आने का समय दे गए थे लेकिन वो दो घंटे तक नहीं आए तो नत्थू उनके कमरे में फर्श पर ए.सी. चला कर सो गया। नेहरू जब आए और उन्होंने उसे उठाने की कोशिश की तो गहरी नींद में होने से वह नहीं उठा, वो उसे लांघकर अपने कमरे में गए, कपड़े बदले, खाना खाया और फिर बाहर जाने के लिए निकले। तब तक नत्थू भी सोया हुआ था। फिर उन्होनें नत्थू को लांघ कर वहां के सुरक्षा कर्मचारियों को कहा कि इसको सोने देना, मत उठाना। नेहरू बाहर चले गए और जब नत्थू उठा तो देखा कि दो सुरक्षा कर्मचारी उसके पास खड़े हैं, घबरा कर नत्थू ने पूछा कि आप यहाँ क्यों खड़े हैं? क्या बात है? तो उन्होंने कहा कि नेहरू ने कहा है कि इस पर निगाह रखना और इसको सोने देना, जब नेहरू लौट कर आए तो नत्थू बहुत घबराया हुआ था लेकिन नेहरू ने उससे कुछ नहीं कहा। एक प्रधानमंत्री का अपने मामूली से नौकर के प्रति यह मानवीय व्यवहार उनकी महानता का प्रतीक है।

नेहरू के जीवन का एक और प्रसंग है जिससे मालूम होता है कि उनके पास कोई सम्पत्ति नहीं थी और वो एक मामूली इंसान की तरह रहते थे। विजयलक्ष्मी पंडित उनकी छोटी बहन थी जो उनसे दस साल छोटी थी। विजयलक्ष्मी एक बार शिमला गई, दो दिन ठहरी लेकिन राजभवन का बिल उन्होंने नहीं चुकाया था, उस समय विजयलक्ष्मी अमेरिका में भारत की राजदूत थी। उस समय हिमाचल प्रदेश नहीं बना था और शिमला पंजाब राज्य का अंग था, जिसके मुख्यमंत्री थे भीमसेन सच्चर। चूंकि काफी दिन से बिल पेंडिंग था तो उन्होंने नेहरू से कहा कि विजयलक्ष्मी का बिल कई महीनों से पेंडिंग है और चूंकि आप उनके बड़े भाई हैं इसलिए आपको कह रहा हूँ कि ये सरकारी बिल अभी तक पेंडिंग दिखाया जा रहा है। नेहरू ने कहा कि ये 2500 रूपये का बिल मैं दूंगा, लेकिन 500 रू. महिने की किश्त से मुझसे ले लिया जाए। यह ईमानदारी नेहरू महानता का एक और नमूना है।

प्रधानमंत्री होकर भी नेहरू में बड़ी विनम्रता के गुण थे। मौलाना आजाद उनके दोस्तों में से थे, और दोनों के बीच यह तय हुआ था कि रोज एक दूसरे को टेलीफोन करेंगे। जब मौलाना आजाद फोन करते तो नेहरू खुद उठाते और जब नेहरू करते तो मौलाना खुद उठाते। एक बार मौलाना ने जवाहरलाल को फोन किया तो उनके सहायक जॉन मथाई ने फोन उठाया। उसके बाद जब नेहरू मौलाना से मिले तो उन्होंने तंज किया कि जवाहरलाल क्या तुम्हारी उंगलियों में कोई तकलीफ है, नेहरू समझ गए उन्होंने माफी मांगी और आइंदा ऐसा न करने का वचन दिया। आज मंत्री किसी भी पार्टी के हों कभी कोई व्यक्तिगत रूप से किसी का फोन नहीं उठाते हैं, ऐसा शायद ही कभी हुआ हो कि किसी मंत्री से बिना पी.ए. के हस्तक्षेप के बात हुई हो। सादगी महानता का लक्षण है। मुझे याद है कि मध्यप्रदेश के यशस्वी मुख्य न्यायाधीश जी.पी. सिंह हमेशा खुद फोन उठाया करते थे, कभी उनके पी.ए. ने नहीं उठाया। क्या ये अपेक्षा की जा सकती है कि वर्तमान में जो मंत्रीगण हैं, वो लोगो के फोन खुद उठायेंगे। कुछ तो यह लोग नेहरू और जी.पी. सिंह से सीखें।

आजादी के बाद नेहरू का हिन्दुस्तानी फौज रखने का अपना नजरिया था, नेहरू का मानना था कि जो लोग आजादी चाहते हैं उन्हें उसे बचाने के लिए अपने आप को न्यौछावर करने को तैयार रहना चाहिए, जब कौम गफलत में आ जाती है तो वो कमजोर हो जाती है और गिर जाती है। उनको कहना था कि हमारा मुल्क फौज और लड़ाई का सामान इसलिए तैयार नहीं करता कि किसी को गुलाम बनाया जाए, बल्कि अपनी आजादी को बचा सके और किसी भी मुल्क को गुलाम बनाने की सोचे नहीं, बल्कि गुलाम मुल्को को आजादी हासिल करने में मदद करे।

1947 को जो हिन्दुस्तान नेहरू को मिला वह दुनिया का सबसे गरीब देश था। ब्रिटिश शासन में लूट, उपेक्षा और शोषण, यह नियति थी एक आम हिन्दुस्तानी की। हिन्दुस्तान से कच्चा माल ब्रिटेन जाता था और तैयार माल वहाँ से आता था। हिन्दुस्तान में सुई तक नहीं बनती थी। 30 करोड़ लोगों के देश में ढांचागत कोई व्यवस्था नहीं थी। अर्थव्यवस्था तथा शासन तंत्र सभी इस तरह निर्मित और प्रशिक्षित किये गए थे कि वो ब्रिटिश शासन को मजबूत करे और आजादी के अभियान को दबाने का प्रयास करें।

नेहरू को विरासत में हिन्दुस्तान का पूर्वी राज्य बंगाल मिला था जिसमें अकाल पड़ा हुआ था और 3 लाख लोग मारे गए थे औैर नेहरू को विरासत में, बंटवारे के बाद 14 लाख शरणार्थियों से भरा भारत मिला था। बंटवारे का नतीजा यह था कि लाखों लोग भारतीय पंजाब से पाकिस्तानी पंजाब गए और उतने ही पाक पंजाब से भारत आए। यही हाल बंगाल का था। पूर्वी बंगाल से लोग पश्चिम बंगाल में आए और उतने ही पश्चिम बंगाल से पूर्वी बंगाल गए। हिन्दुस्तान की आधी आबादी गरीबी रेखा के नीचे थी, 80 फीसदी लोग अनपढ़ थे। औसत जीवनदर 30 बरस थी।

भारत अंग्रेजों का गुलाम था और जनता जमींदार, जागीरदार और राजाओं की गुलाम थी। जमींदार और जागीरदार पूरे हिन्दुस्तान में जगह-जगह थे पहले राजा महाराजा शासन करते थे, राजा महाराजाओं के अंतर्गत जागीरदार और जमींदार थे। जागीरदारी और जमींदारी में जितने भी गांव होते थे उस जनता के मालिक जमींदार और जागीरदार थे। जागीरदारी और जमींदारी गांव में पूरा शासन उनके हाथों में था। उनके पास प्रशासनिक, दीवानी और फौजदारी दोनों अधिकार थे, उनमें जागीरदार और जमींदार बनाए हुए कानून ही चलते थे।

जागीरदार और जमींदार अपने राज्य के किसी भी आदमी से बेगार का काम ले सकता था। बेगार प्रथा में जनता का यह कर्तव्य था कि वह जब भी जागीरदार और जमींदार बुलाएं तब उसे उसके सेवा में एक गांव से दूसरे गांव जाना पड़ता था। वो घोड़े पर जाते थे और ये पैदल सामान लेकर जाता था, लेकिन मेहनताना उसको कुछ भी नहीं मिलता था। समय भी उनके मर्जी से चलता था। कई तो ऐसे थे कि अगर दोपहर 1 बजे सोकर उठे तो जो घण्टे बजते थे तो 7 बजा दिए जाते थे, चूंकि वह रोज 7 बजे उठते थे। गांव की सुंदर स्त्रियां कतई सुरक्षित नहीं थी। जागीरदार और जमींदार ऐसी महिलाओं को कभी भी उठवा सकता थे। उनकी अपनी कोर्ट होती थी, उनकी अपनी जेल होती थी, दोनों ही अपनी अपनी जनता का खूब शोषण करते थे। भारत के गांव की यह स्थिति थी अपनी मनमर्जी से जागीरदार या जमींदार लगान वसूल करता था। जागीरदारी और जमींदारी में बड़े-बड़े किसान थे जिनके पास सैकड़ों एकड़ जमीन थी। किसान अपनी जमीन के लिए इनके मोहताज थे। अधिकतर किसान खेतिहर मजदूर थे।

भारत के गांव में सामंतवाद का बोलबाला था, अंग्रेजों ने राजाओं को छूट दे रखी थी जिनके राज में उनके अपने सिक्के चलते थे, उनकी अपनी पुलिस होती थी, उनकी अपनी न्याय व्यवस्था होती थी। ये देश कृषि प्रधान देश है, लेकिन आम किसान के पास शोषण के अलावा कुछ नहीं था। अंग्रेज ने राजाओं पर अपना प्रभुत्व जमा कर रखा था और हर एक राजा इस होड़ में लगा रहता था कि ब्रिटिश सम्राट का सबसे ज्यादा वफादार वह ही है। राजाओं को नियंत्रित करने के लिए जगह जगह रेजिडेंट होते थे और जगह जगह कन्टोनमेंट थे।

ऐसे हिन्दुस्तान को समर्पित, ईमानदार, अलग -अलग पार्टी के उछभट विद्धानों ने मिलकर संविधान सभा के द्वारा भारत का संविधान बनाया। जो 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ। अधिकतर विद्धानों की मानसिकता सामंतवादी और पूंजीवादी थी।

संविधान में अधिक से अधिक भारत की जनता जिसमें हिन्दू, मुसलमान, सिख ईसाई तथा दलित एवं आदिवासी थे उनके लिए अच्छे अच्छे प्रावधान किए थे। किन्तु जागीरदारी और जमींदारी प्रथा और उसकी बुराईयों पर संविधान निर्माताओं का ध्यान नहीं गया था, या वे लोग इसको विवादास्वष्द समझकर इस विषय पर मौन थे लेकिन नेहरू चाहते थे कि जो हिन्दुस्तान का गरीब है, बेसहरा है, गुलामी से जकड़ा हुआ है, उसकी मुक्ति के लिए संविधान का उपयोग करना चाहिए इस बात को ध्यान में रखकर नेहरू ने जागीरदारी और जमींदारी प्रथा खत्म करने की मन में ठान ली और यह काम उन्होनें संविधान संशोधनों के माध्यम से करने का काम दिया।

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