दिल्ली में जो सीसीटीवी सिस्टम डेढ़ हजार करोड़ में बनाया, वह इंदौर ने 1 करोड़ में तैयार कर लिया

विकाससिंह राठौर | इंदौर

उपलब्धि… कोराना प्रभावित क्षेत्रों की छोटी-छोटी गलियों में कैमरों से पुलिस-प्रशासन ने की निगरानी, कोई बाहर घूमता दिखा तो कैमरों के साथ लगे अनाउंसमेंट सिस्टम से कंट्रोल रूम से ही उसे घर में रहने की हिदायत भी दी

24 मार्च को कोरोना वायरस ने शहर में पहली बार दस्तक दी। अगले ही दिन पूरे देश में लॉकडाउन घोषित हो चुका था। इस संक्रमण से लड़ने और लोगों को लॉकडाउन का पालन करवाने के लिए पर्याप्त अमला नहीं था। इसके कारण शुरुआत के कुछ दिनों लॉकडाउन का पालन करवाना भारी पड़ रहा था। इसी वजह से वायरस ने भी तेजी से पैर पसारे। इससे निपटने के लिए 30 मार्च को इंदौर में कलेक्टर के रूप में मनीष सिंह और डीआईजी के रूप में हरिनारायणाचारी मिश्रा को कमान सौंपी गई। अधिकारियों की इस टीम ने वायरस पर काबू पाने और लॉकडाउन का पालन कराने के लिए टेक्नोलॉजी को हथियार बनाया। फोर्स की कमी को कैमरों और अनाउंसमेंट सिस्टम से पूरा करने की योजना बनाई गई। इसके तहत प्रदेश में पहली बार संक्रमित क्षेत्रों में कैमरे लगाए और कंट्रोल रूम से इनकी निगरानी शुरू की गई। इसी क्रम में संभवत: देश में पहली बार सिर्फ एक सप्ताह में पांच सौ कैमरे लगाकर उन्हें कंट्रोल रूम से जोड़ा गया, ताकि शहर के हर प्रभावित हिस्से पर कंट्रोल रूम और थाने से नजर रखी जा सके। कैमरे की मदद से कोई बाहर घूमता नजर आया तो कंट्रोल रूम से अनाउंसमेंट करते हुए उसे घर में रहने का आदेश दिया, साथ ही नजदीकी थाने से बल को भी वहां भेजा।

शहर में इस पूरी व्यवस्था की योजना कलेक्टर और डीआईजी के साथ तैयार की स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के कंसल्टेंट जसदीप सिंह ने। जसदीप ने बताया कि कोरोना फैलने पर जब कलेक्टर और डीआईजी ने कहा कि जरुरी है कि प्रभावित क्षेत्रों में पूरे समय निगरानी रखी जाए, लेकिन गली-गली में पुलिस को तैनात किया जाए, इतना फोर्स नहीं है तो क्यों न इसके लिए कैमरों का इस्तेमाल किया जाए, जिसमें पब्लिक अनाउंसमेंस सिस्टम को भी जोड़ दिया जाए। इस पर सबसे पहले 2 अप्रैल को रानीपुरा क्षेत्र में कैमरे लगाए गए। इसका मॉनिटरिंग स्टेशन डीआईजी ऑफिस में बनाया गया। जब कोरोना शहर में फैलने लगा तो ज्यादा कैमरों की जरुरत महसूस हुई। शहर में पांच सौ कैमरे लगाने की योजना बनाई गई, लेकिन इतने ज्यादा कैमरों को कंट्रोल रूम से जोड़ने के लिए फाइबर ऑप्टिकल नेटवर्क बिछाने और काम शुरू करने में 200 से 250 करोड़ का खर्च और एक साल का समय लगना तय था। इसलिए अधिकारियों को सुझाव दिया कि क्यों न इंदौर में पहले से इंटरनेट और केबल सेवा देने वाली कंपनी से मदद ली जाए। जसदीप बताते हैं कि कलेक्टर को सुझाव बहुत अच्छा लगा और इंदौर की एक प्रमुख केबल कंपनी को इस काम से जोड़ा गया। सीएसआर के तहत कंपनी भी शहरहित में साथ देने को तैयार हो गई। इसके बाद एक कंपनी के साथ कैमरे लगाने का अनुबंध किया गया।

आठ दिन में संक्रमित क्षेत्रों में लगाए 500 कैमरे और बना दिया मॉनिटरिंग स्टेशन

जसदीप ने बताया शहर के संक्रमित क्षेत्रों में 21 से 28 अप्रैल के बीच यानी सिर्फ आठ दिन में 500 आईपी एसडी कैमरे लगाए। फाइबर ऑप्टिकल नेटवर्क की मदद से इन्हें नजदीकी थानों और डीआईजी ऑफिस में बनाए विशेष सेंट्रलाइज्ड कंट्रोल एंड मॉनिटरिंग स्टेशन से जोड़ा। संक्रमित क्षेत्रों जैसे रानीपुरा, टाटपट्‌टी बाखल, चंदन नगर, आजाद नगर, खजराना सहित प्रमुख स्थानों की छोटी-छोटी गलियों में टेक्नीशियंस ने पीपीई किट पहनकर दिन-रात काम करते हुए सिस्टम को तैयार किया।

60 से 70 प्रतिशत शहर पर नजर रखने में काम आए कैमरे, तीन मिनट में कार्रवाई

डीआईजी मिश्रा ने ‘प्रजातंत्र’ से बातचीत में बताया कि शहर में मॉनिटरिंग और त्वरित कार्रवाई के लिहाज से इस सिस्टम से 60 से 70 प्रतिशत पर नजर रखी जा रही है। इससे काफी मदद भी मिली है। मॉनिटरिंग स्टेशन में 10-10 लोगों की तीन टीमें तीन शिफ्ट में 24 घंटे यहां से शहर पर नजर रखती हैं। कोई भी गलत गतिविधि नजर आने पर तुरंत लाउड स्पीकर पर चेतावनी दी जाती है। साथ ही संबंधित थाना क्षेत्र को भी सूचना दी जाती है कि मौके पर जाकर देखें। इसके महज तीन मिनट में कार्रवाई भी होती है।

 

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