कम से कम कबीर दास की तो लाज बचा लो सरकार

कबीर दास ने कहा था कि –

साँई इतना दीजिए, जामे कुटुम समाय।
मैं भी भूखा ना रहूँ, साधु न भूखा जाय।।

कोरोना महामारी के कारण अब यह दोहा किसी काम का नहीं रहा। देश में मार्च से चल रहे संकट ने सबकुछ बदल डाला है। अब तो लोग साँई यानी ईश्वर से सिर्फ यही प्रार्थना कर रहे हैं – प्रभु किसी तरह मेरा और मेरे परिवार का पेट भर दो। लेकिन साँई यानी हमारे देश के कर्ताधर्ता कान में रूई ठूंसे बैठे हैं। हजारों करोड़ के राहत की घोषणाएँ होती हैं, लेकिन जमीन पर कुछ नहीं दिख रहा।

संयुक्त राष्ट्र के एक आंकड़े के अनुसार भारत में 10 करोड़ से ज्यादा लोग गरीबी रेखा से नीचे चल जाएंगे। अभी रोज 245 रुपये से कम कमाने वालों को गरीबी रेखा के नीचे माना जाता है, लेकिन पिछले तीन-चार महीने में स्थिति और विकट हो गई है। जो लोग प्रतिदिन हजार से दो हजार रुपए तक कमाते थे, वे घर बैठे हैं। करोड़ों लोगों की नौकरियां चली गई हैं, तो कइयों की तनख्वाह इतनी कर दी गई है कि वे गरीबी रेखा के असपास पहुंच गए हैं।

विश्व बैंक के आय मानकों के अनुसार, भारत में फिलहाल करीब 81.2 करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रहे हैं। यह देश की कुल आबादी का 60 फीसदी हैं। महामारी और लॉकडाउन से गरीबों की यह संख्या बढ़कर 91.5 करोड़ हो जाएगी। यह कुल आबादी का 68 फीसदी हिस्सा होगा। ऐसी स्थिति में देश 10 साल पीछे चला जाएगा और जो मध्यमवर्ग 10 वर्षों से लगातार मेहनत कर गरीबी रेखा से ऊपर उठ पाया है, वह फिर रोटी के लिए संघर्ष करता दिखेगा।

बाढ़, सूखा, भूकंप, तूफान जैसी आपदा में पीड़ितों की पहचान आसान है। इन्हें सरकारी मदद भी मिल जाती है। टूटे मकान बनकर फिर से खड़े हो जाते हैं, लेकिन कोरोना ऐसी आपदा है जिसमें सिर्फ सड़क पर पैदल चलते मजदूर ही दिखाई दे रहे हैं। ऐसे मध्यम वर्ग पर सरकार की बिलकुल ही नजर नहीं है, जो राशन या राहत सामग्री के लिए लाइन में नहीं लग सकता। पेट खाली होते हुए भी किसी से खाना मांगकर नहीं खा सकता।

सरकार ने कर्ज लेने वालों को ईएमआई छह महीने नहीं जमा करने की राहत तो दी, लेकिन ऐसा कर मध्यम वर्ग को और उलझा दिया है। पहले से ही मोटा ब्याज चुका रहे लोग अब ब्याज के ऊपर ब्याज देने को मजबूर हैं। विडंबना यह है कि इनमें से अधिकांश लोग ऐेसे हैं जिनकी नौकरी या तो जा चुकी है या तनख्वाह काफी कम कर दी गई है। सरकार अगर मध्यम वर्ग का सोचती तो किस्त की माफी नहीं सही, लेकिन ब्याज के ऊपर ब्याज की माफी तो करवा ही सकती थी। सरकार को पता है कि खाली पेट, जूते में पॉलिश व गले में टाई बांध घर से बाहर निकलनेवाला यह वर्ग मनरेगा में काम नहीं करेगा। इसके बावजूद ऐसी कोई राहत की घोषणा नहीं की गई।

कोरोना काल में इस वर्ग पर कईतरफा मार पड़ी। लॉकडाउन के कारण तीन महीने से महंगा सामान खरीद कर खा रहा यह वर्ग बुरी तरह कर्जे में डूब गया है। इस वर्ग का पूरा कुनबा ही ऐसी हालत में है कि कोई आपस में किसी की मदद नहीं कर पा रहा। ऐसे में यह वर्ग कहां जाए? किससे मदद मांगे। न मकान मालिक किराया छोड़ रहा, न स्कूल अपनी फीस। सरकार के सारे निर्देश हवा में हैं, जिन्हें मानने की मजबूरी नहीं है। और तो और इस महामारी में सरकार प्राइवेट अस्पतालों के कान भी नहीं उमेठ पा रही, जो मामूली बीमारी पर भी लाखों रुपए का बिल बना दे रहे हैं। इतना ही नहीं जिस बीमारी की कोई दवा भी नहीं बनी उसके लिए लाखों के पैकेज तैयार कर दिए गए हैं।

सरकार के पास गरीब परिवारों की फेहरिस्त है, जिस आधार पर उन्हें मदद की जा रही है, लेकिन मध्यम वर्ग की सूची किसी के पास नहीं है? कौन नहीं जानता मध्यम वर्ग पर लदी जिम्मेदारियों के बारे में। क्या बैंकों, वित्तीय संस्थानों, बीमा कंपनियों को इस बात की जानकारी नहीं है कि उन्हें जो किस्तें आती हैं, वे कब नियमित नहीं होती? क्या निजी शिक्षा संस्थान अभिभावकों की चुनौतियों के बारे में नहीं जानते? बेचारा मध्यम वर्ग जो न तो सबके सामने हाथ फैला सकता है और न ही खुलकर अपना दर्द बयां कर सकता है। लॉकडाउन के दौरान विपरीत हालात में उसकी कोई सुनने वाला नहीं। यह वर्ग अब केवल भगवान के भरोसे ही है, जो अब अपने द्वार पर आए साधु की सेवा करने में भी सक्षम नहीं बचा है।
हे भगवान…कम से कम आप ही सुन लो। कबीर दास की लाज बचा लो। सरकार तो सुनने से रही। अगर जल्द ही कोई एक्शन न हुआ तो शायद धरती से मध्यम वर्ग का नामोनिशान मिट जाएगा, क्योंकि तब तक सब गरीबी रेखा के नीचे होंगे।

 

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