मद्रास के दो स्टूडेंट्स ने ऐसा हॉस्पिटल बनाया है, जिसे दो लोग मिलकर चार घंटे में कहीं भी तैयार कर सकते हैं

नेहा श्रीवास्तव, इंदौर।

कोरोना अब अपने भयंकर रूप में आ गया है और अभी तक इसका कोई एंटीडोट इजाद नहीं हो पाया है। वहीं कोरोना से लड़ने के लिए मद्रास के दो छात्रों ने मिलकर एक ऐसा हॉस्पिटल तैयार किया है जिसे बनाने में महज चार घंटे लगते हैं।

दरअसल कोरोना से लड़ने के लिए भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मद्रास (आईआईटी-एम) और स्टार्ट-अप मॉड्युलस हाउसिंग ने एक पोर्टेबल हॉस्पिटल डेवलप किया है।

कोरोना काल में पोर्टेबल अस्पताल अहम हो सकता है

इसकी खासियत यह है कि इसे दो लोग मिलकर चार घंटे में कहीं भी तैयार कर सकते हैं। कोरोना के खिलाफ जंग में पोर्टेबल अस्पताल अहम भूमिका निभा सकता है।

इसे मेडिकेब नाम दिया गया है। इस पोर्टेबल माइक्रोस्ट्रक्चर के जरिए स्थानीय समुदाय में कोविड-19 संक्रमित की पहचान करने, जांच, आइसोलेट व इलाज की सुविधा दी जा सकेगी।

इसे आईआईटी मद्रास की इन्क्यूबेशन सेल सपोर्ट कर रही है

 

स्टार्टअप ने श्री चित्रा तिरुनल इन्स्टीट्यूट फॉर मेडिकल साइंसेज एंड टेक्नोलॉजी से साझा किया है जो इस प्रोजेक्ट के सर्टिफिकेशन व चलन में मदद करेगी।

आईआईटी के दो पूर्व छात्रों की ओर से स्थापित किए इस मॉड्युलस हाउसिंग को आईआईटी मद्रास की इन्क्यूबेशन सेल सपोर्ट कर रही है। इन्होंने कोविड-19 से लड़ाई के लिए यह विशेष रूप से तैयार किया है।

प्रति एक हजार लोगों पर 0.7 बेड की सुविधा उपलब्ध है

भारत में प्रति एक हजार लोगों पर 0.7 बेड की सुविधा है। मेजिकैब जैसी नई तकनीक भारत में स्वास्थ्य सेवा के ढांचे को मजबूत करने में मददगार बनेगी।

मॉड्युलस दोहरे डिजाइन पर काम करता है। जहां इसे तेजी से कोविड-19 आइसोलेशन वार्ड में तब्दील किया जा सकता है वहीं ग्रामीण इलाके जहां स्वास्थ्य की जरूरत अधिक है, इसे माइक्रो अस्पताल या क्लिनिक में बदल सकते हैं। मोडुलस हाउसिंग ने चेन्नई के पास चेंगलपेट में इसकी उत्पादन इकाई स्थापित की है।

यह गांवों में बेहद ही सफल हो सकता है

मॉड्यूलस हाउसिंग के मुख्य कार्यकारी अधिकारी श्रीराम रविचंद्रन ने बताया कि केरल में इस पायलट प्रोजेक्ट के नतीजों से मौजूदा समय में छोटे अस्पातालों की जरूरतों को समझा जा सकता है। उन्होंने बताया कि यह गांवों में बेहद ही सफल हो सकता है।

क्योंकि कोराना के दौर में शहरों में इंफ्रास्ट्रक्चर मौजूद थे, जिन्हें तुरंत कोरोना के अस्पतालों में बदल दिया गया, लेकिन गांवों में ऐसा करना संभव नहीं है। ऐसे जगहों पर इस मेडिकैब के जरिए कोरोना जैसी महामारी से लड़ने में मदद मिल सकती है।

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