गद्दारों के कारण फांसी के फंदे तक पहुंचे महाराज

महाराज तुकोजीराव होलकर का एक पत्र अमझेरा महाराज को पहुंचाया गया। जब उसको उन्होंने पढ़ा तो उसमें लिखा था कि हचिन्सन उनकी पत्नी, उनकी पुत्री, डॉ. चिसोलम को अमझेरा मे रोके रखा गया है। मेरे रेजिडेंट से बहुत अच्छे संबंध हैं। मेहरबानी करके इन अंग्रेजों, उनकी पत्नियों, बालकों को भेज दें, उन्हें लाने के लिए बक्षी खुमान सिंह को भेज रहा हूं।

महाराज ने खत पढ़ने के बाद अपने प्रमुख अधिकारियों की मिटिंग ली और कहा- क्या समझते हैं होलकर महाराज अपने आप को? उन्होंने कायर समझा है क्या, क्या वो नहीं जानते कि हम क्षत्रिय हैं। हम भले ही छोटे राज्य के महाराज हों पर हम उन्हें बता देंगे कि वीरता कोई बड़े राजा महाराजाओं की बपौती नहीं है।

महाराज ने सेनापति से कहा ‘‘सेनापति शीघ्र युद्ध की तैयारी करो इन होलकरों से बदला लेने का समय आ गया है। महाराज बख्तावर सिंह की अपेक्षा के अनुकूल क्रांति के परिणाम नहीं मिले। अपना कौन और पराया कौन – अनिश्चय की स्थिति में थे। परदे के पीछे से चालें चली जा रही थीं।

होलकर सेनापति खुमान सिंह : होलकर सेना के कमाण्डर बक्षी खुमान सिंह की अगुवाई में डरा हुआ कैप्टन हचिन्सन अपने साथियों के साथ 11 जुलाई को वापस भोपावर आया। भोपावर को उजड़ा हुआ देखकर महू के कमाण्डर हंगर फोर्ड ने खुमान सिंह को राजा बख्तावर सिंह से स्पष्टीकरण मांगने और लुटी गई भोपावर की सामग्री लौटाने हेतु भेजा। बक्षी ने यह पत्र अमझेरा भेजा, महाराज ने उसका उत्तर ना में भेज दिया।

हचिन्सन ने अमझेरा के दीवान गुलाब राय, सहसेनापति भवानी सिंह, वकील चिमनराय, मोहनदास कामदार और पटवारी सलूक राय को समर्पण कर उसे सौंपने की मांग की।
हचिन्सन की फौज का मुस्लिमों द्वारा कत्लेआम : हचिन्सन की मांग पर अमझेरा के मुस्लिमों ने नाराज होकर, होलकर सेना के अधिकारी नवाब दिलशे खां को भोपावर के अंग्रेजों को मौत के घाट उतारने का लिख कर, उनके साथ पहुंचने का लिखा। सेनापति, आचार्य और महाराज में इस विषय पर चर्चा हुई। आचार्य ने कहा कि आज जिस तरह राजनैतिक लाभ की संभावना में केवल अवसर की ताक में हैं वही हमें करना चाहिए। महाराज ने पूछा कि तुम्हारा मतलब क्या है? हमें हचिन्सन की मांग पूरी करना चाहिए। दीवान जी ने कहा, समय का तकाजा तो यही है महाराज। महाराज ने तीखे स्वर में कहा, जानते हुए वह तुम लोगों को तोप के मुंह से बांधकर उड़ा देगा। दीवान जी ने कहा हमारे पास कोई चारा नहीं है।

आचार्य जी ने कहा कि आप सुरक्षित होंगे तो अनेकों हचिन्सनों को यमपुरी पहुंचा देंगे। फिर महाराज ने आचार्य से कहा कि हमें अपना निवास बदलना चाहिए। दीवान जी ने कहा कि आप निसंकोच हचिन्सन को हमे सौंप दे महाराज। इस पर महाराज ने कहा कि फिर हम स्वयं तुम्हें बक्षी के हाथों सौपेंगे।

22 जुलाई को गुलाब राय, भवानी सिंह, चिमन राय वकील, मोहनलाल और सलुक राय को बक्षी खुमान सिंह कैद करके इन्दौर लाए।
महाराज लालगढ़ के किले में : जुलाई में ही महाराज परिवार सहित अमझेरा से 6 मील दूर लालगढ़ के किले में स्थानांतरित हो गए। 17 जुलाई को राघोगढ़ के ठाकुर दौलत सिंह ने क्रांतिकारी गतिविधियां शुरू की।
अगस्त माह में क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों के बंगलों के ताले तोड़कर आग लगा दी।

अंतिम सप्ताह में सिहोर का खजाना लूटा, खाचरोद में मुगल सल्तनत के शहजादा फिरोज शाह ने क्रांति का उद्घोष किया और मंदसौर की गद्दी पर आसीन हो गए। महाराज ने फिरोज शाह से सम्पर्क किया और अफगानी और मकरानी विद्रोहियों का संगठन बनाने में सक्रिय हो गए।
7 अक्टूबर, को महाराज के संबंधी राघौगढ़ के ठाकुर दौलत सिंह ने सतवास में बादशाही झंडा गाड़कर बादशाह बहादुर शाह जफर के शासन की स्थापना की घोषणा की। 10 अक्टूबर, महाराज की सेना ने भोपावर छावनी के सैनिकों पर हमला कर दिया और अंग्रेजी सैनिकों को चुन-चुन कर मार डाला।

क्रांति सेना ने अंग्रेज सेना को तितर-बितर कर दिया। दोनो पक्षों की खूब क्षति हुई, प्रमुख योद्धाओं में से क्रांति सेना अमझेरा के नायक शाह रसूल खां युद्ध में शहीद हो गए।
महाराज बख्तावर सिंह के नेतृत्व में 11 जुलाई को धार से 3 मील दूर ज्ञानपुरा गांव में धार के नाबालिग राजा आनंदराव पंवार के मामा भीमराव भोंसले ने विजय वाहिनी की आगवानी करके स्वागत किया। भोंसले ने महाराज को गले लगा लिया।

महाराज ने अपनी सेना में नए लड़ाकू, अफगानी, अरबी और मकरानी सैनिकों की भर्ती की। 16 अक्टूबर को महाराज की सेना ने दो ओर से मानपुर छावनी पर भयंकर आक्रमण कर दिया।
मानपुर छावनी के लड़ाई में गोली के प्रहार से एक सैनिक पेड़ से भूमि पर गिरकर मूर्छित हो गया। जब उसका रिवॉल्वर निकालकर उसके वस्त्रो को टटोला तो वह स्त्री मालूम हुई। उसे सीधा करके होश में लाया गया, देखा तो वह चंदा गुजरी थी। गोली उसके दाहिने पैर में लगी थी। उसने पास में पड़े हुए रिवॉल्वर से अंग्रेज फौजी क्लार्क को मारने की कोशिश की, तभी क्लार्क ने दो फायर कर, चंदा को मार डाला।

30 अक्टूबर को धार किले के आधिपत्य के लिए अंग्रेज सेना और क्रांति सेना में भीषण युद्ध हुआ, किन्तु अंग्रेज सेना ने धार के किले को ध्वस्त कर दिया और धार किले पर कब्जा कर लिया। धार के किले पर डुरेन्ट के नैतृत्व में अधिकार हो जाने के पश्चात् महाराज ने 200 सैनिक अमझेरा किले में तैनात किए और बाकी 40 सैनिक लालगढ़ किले में। 8 नवम्बर को हचिन्सन विशाल सेना लेकर अमझेरा आ गया।
हचिन्सन ने प्रातः ही पश्चिमी भाग से किले पर हमला किया और किले में घुस गया। राजमहल में प्रवेश करते ही हचिन्सन ने महाराज और लुटे हुए खजाने की खोज की, लेकिन उसे कुछ नहीं मिला।

गद्दार देवी प्रसाद ने लालगढ़ का पता बताया : हचिन्सन ने अमझेरा के सभ्रांत व धनिक लोगों को पकड़कर बुलवाया और उन्हें सब तरह का लालच दिया। लालच के पाश में जकड़कर अमझेरावासी देवी प्रसाद नामक सम्पन्न व्यक्ति हचिन्सन के पास आया और उसने कहा ‘‘राजा बख्तावर सिंह कहां छिपे हैं, मुझे मालूम है। मैं आपको बताता हूं’’ और धीरे स्वर में बोला ‘‘महाराज लालगढ़ के किले में हैं और उनका परिवार भी साथ में है।’’
हचिन्सन एक बड़ी सेना लेकर लालगढ़ के किले में पहुंचा। महाराज को यह आभास हो गया था कि हचिन्सन लालगढ़ किले में आकर उनको पकड़ लेता, इसलिए महाराज अपने परिवार के साथ घने जंगलों में चले गए।

महाराज एक शाम एक पेड़ के तने से टिक कर चिंतन कर रहे थे। महाराज युवराज रघुनाथ सिंह को महारानी द्वारा लाड़ बताते देख राजमाता ने टोक कर कहा ‘‘बच्चों को घर में रखे गमले के पौधे नहीं बनाना चाहिए जिन्हें लू का एक झोंका ही मुरझा कर चला जाए। इन्हें तो जंगल के एक ऐसे पेड़ की तरह बनाना चाहिए, जो धूप वर्षा, शीत, ओले, तूफान की भी परवाह न करके गर्व से अपना मस्तक ऊंचा रखें। महाराज अपने कर्तव्य को पूरा करने के लिए जंगल में इधर उधर भटक रहे थे।

महाराज को गिरफ्तार करवाया : नारायण राव अमझेरा का एक सम्पन्न किसान था और उसकी कृषि भूमि अनेकों स्थानों में स्थित थी किन्तु नारायण राव को एक बात खटकती थी कि अमझेरा महाराज ने उसे राजदरबार का सभासद नहीं बनाया। नारायण राव का अहंकार जाग उठा और वो हचिन्सन के पास पहुंचा। नारायण राव ने कहा कि वह महाराज का पता निश्चित रूप से लगा लेगा। नारायण राव ने अपने श्रमिकों और बटांईदारों को ये काम सौंपा।
महाराज की दिनचर्या की जानकारी नारायण राव ने निकाली और हचिन्सन को बताई। उसने अपने बढ़िया और विश्वसनीय चुनिंदा सैनिकों को महाराज को कैद करने के लिए भेजा।

13 नवंबर को प्रातः महाराज लालगढ़ किले के पीछे स्थित तालाब में स्नान करने पहुंचे। उन्होंने घोड़े को बांधा अपने वस्त्र और शस्त्र पेड़ के नीचे रख दिए। भेदियों ने महाराज की दिनचर्या पर नजर रखी हुई थी। सूचना मिलते ही हचिन्सन के सैनिक तालाब के किनारे पहुंचे और महाराज के शस्त्र व अस्त्र अपने कब्जे में ले लिए।

सैनिकों की इस टुकड़ी ने बंदूक और तलवार निकालकर महाराज को घेर लिया। उन्होंने कहा, आप वस्त्र पहनिए और हमारे साथ चलिए। संगीनों की नोंक पर सैनिकों ने महाराज के हाथ रस्सियों से पीछे कसकर बांध दिए। एक सैनिक महाराज का अश्व लेकर आया और दो सैनिको ने मिलकर महाराज को घोड़े पर बैठा दिया। महाराज को गिरफ्तार करने वाले 5 सैनिक महू में उपस्थित हचिन्सन के पास उनको ले गए। अंग्रेज सैनिक दल रात्रि के प्रथम पहर में महू पहुंचा और महाराज को घोड़े से उतारकर हचिन्सन के आदेश पर हवालात में बंद कर दिया।

महाराज बख्तावर सिंह के संबंधी राघोगढ़ के ठाकुर दौलत सिंह ने अपने पड़ोसी राजपूत सरदारों, भील-भलालों और मुस्लिम सैनिकों के साथ महू छावनी पर महाराज को कैद से मुक्त करवाने के लिए आक्रमण किया, लेकिन वर्षा के कारण ठाकुर दौलत सिंह को सफलता नहीं मिली। 19 दिसम्बर 1857 को इन्दौर के ए.जी.जी सर राबर्ट हेमिल्टन के निर्देश पर महाराज को संगीनधारी सैनिकों के पहरे में इन्दौर लाया गया।
महाराज को सार्वजनिक फांसी : 21 दिसम्बर 1857 को इन्दौर रेसीडेंसी में कम्पनी सरकार का दरबार बुलाया गया, न्याय का नाटक किया गया और 9 फरवरी 1858 को सार्वजनिक फांसी का आदेश सुनाया गया। इस आदेश के पहले न्याय का नाटक करते हुए दीवान गुलाब राय, भवानी सिंह, मोहनलाल कामदार और सलूक राय पटवारी को लूट, हत्या और डकैती के जुर्म में फांसी की सजा सुनाई गई और वकील चिमन राय को काले पानी की।

झांसी की रानी महारानी लक्ष्मी बाई का अमर शहीदों में उल्लेख तो हर जगह मिल जाएगा लेकिन महाराज बख्तावर सिंह राजा अमझेरा का बहुम कम जगह। सुभद्रा सिंह चौहान ने उन पर कविता लिखी ‘‘खूब लड़ी मर्दानी वो तो झांसी वाली रानी थी।’’ क्योंकि झांसी दिल्ली से पास थी और झांसी की रानी के लिए दिल्ली, आगरा, ग्वालियर तीनों जगह से मुहिम चलाई गई थी लेकिन अमझेरा का आदिवासी क्षेत्र दिल्ली से सैंकड़ों मील दूर। राजा बख्तावर सिंह मध्य भारत के राजा महाराजाओं में से एक ही शहीद शिरोमणी थे। जिन्हें अंग्रेजो के खिलाफ 1857 के विद्रोह में सार्वजनिक फांसी की सजा सुनाई गई थी। अंग्रेज उनसे इतने भयभीत थे कि उनका शव सुबह 8 बजे से शाम 7 बजे तक लटकाया रखा गया और शाम को ही उनका अंतिम संस्कार उनके सेवकों द्वारा करवा दिया गया। परिवार के एक भी शख्श को उनके पास नहीं जाने दिया गया और न उनके अंतिम यात्रा में भाग लेने दिया गया। महाराज के शव को देखने के लिए पूरा इन्दौर उमड़ पड़ा था और सभी की आंखें नम थीं। सीना ताने हुए, हाथी की मस्त चाल चलते हुए फांसी के फंदे को चूम कर अपने हाथ से अपने गले में फंदा डाल लेना और स्वयं फांसी पर चढ़ जाना। यह एक ऐसी मिसाल है जो दुनिया के किसी भी देश के लिए गर्व और सम्मान की बात है। अफसोस की बात है कि इस महान सपूत की मूर्ति वर्तमान एम.वाय. हॉस्पिटल के ऐसे कोने में लगाई गई है जहां किसी का ध्यान नहीं जाता है। दुख की बात है न सरकार और न इन्दौर की जनता अथवा मध्यप्रदेश की जनता इस अमर शहीद को उचित सम्मान देने पर लज्जित क्यों नहीं होती? हमारा सर शर्म से झुक क्यों नहीं जाता। इस देश में लाखों बख्तावर सिंह जब पैदा होंगे और ईमानदारी से देश की सेवा और अपना कर्तव्य निभाएंगे, तब ही इस देश का कल्याण होगा।

गद्दारी किसी कौम, मजहब और भाषा पर निर्भर नहीं करती है। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की फौज में रिसालदार कालेखां, तहसीलदार मोहम्मद हुसैन, तोपची गुलाम गोस खां एवं कुंवर खुदा बक्ष थे। इन्होंने झांसी की रानी के साथ वफादारी से 1857 के विद्रोह में कंधे से कंधा मिलाकर युद्ध किया था। झांसी की रानी के शव का संस्कार उनके सेवक पठान ने किया और जिसने कहा था ‘‘खलक खुदा का, मुल्क बादशाह का और राज झांसी की रानी का।’’ अगर इसी प्रकार राणा बख्तावर सिंह का जीवन देखें तो उनका नाम बख्तावर सिंह मौलाना ओबेदुल्ला ने रखा था। शिक्षा में उन्हें हिन्दी, उर्दू और अंग्रेजी पढ़ाई गई थी। अगर हम राव बख्तावर सिंह का देखें तो उनके मुख्य सचिव बशीरउल्ला खां, गुप्तचर प्रमुख शेख सफीउद्दीन, उनके वकील हैदर खां, उनके विश्वस्थ यौद्धा शाह रसूल खां, बशीर उल्ला खां, जमादार अता मोहम्मद, गुलखां तोप जी और मुंशी नसरउल्ला खां थे लेकिन जिन गद्दारों ने महाराज को अंग्रेजों के हाथों पकड़वाया उनका नाम था-देवी प्रसाद और नारायण राव। इन महान शहीदों का जीवन यह कहता है कि धर्म के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाए। चाहे वो प्रधानमंत्री का पद हो या चपरासी का। देशभक्ति और गद्दारी यह आदमी के मन और विचारों से आती है। इसका कोई ताल्लुक धर्म से नहीं होता। महाराज बख्तावर सिंह का बलिदान इस देश के युवाओं के लिए एक आदर्श है।

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