हाथरस की हकीकत

 

अनुभवहीन अफसरों और पुलिस की लापरवाही से नहीं आ पाए सही तथ्य सामने
पत्रकारिता का धर्म है कि वह कोई फैसला न दे। वह तथ्य रखे और वे सारे सबूत भी जिन पर जांच और फैसला दोनों बाकी है। सबसे निचले स्तर तक अपनी विश्वसनीयता खो चुके और दर्द को भी इवेंट बनाने में माहिर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया द्वारा दिखाए जा रहे घटनाक्रम के बीच ‘प्रजातंत्र’ की विशेष रिपोर्ट…।

नई दिल्ली से विष्णु शर्मा


अलीगढ़ मुस्लिम युनिवर्सिटी (एएमयू) के जवाहर लाल नेहरू मेडिकल कॉलेज में उस वक्त हंगामा मच जाता है, जब 14 सितम्बर से भर्ती हाथरस की दलित लड़की के परिजन कहते हैं कि उसके साथ गैंगरेप हुआ है। उस दिन तारीख थी 22 सितम्बर। जाहिर है पुलिस और प्रशासन की नीदें उड़ना भी स्वाभाविक था। फौरन एक पुलिस टीम पहुंचती है, लड़की के और उसके परिजनों के बयान होते हैं, तीन आरोपियों के नाम और सामने आते हैं और अगले चार दिन के अंदर उन तीनों की भी गिरफ्तारी हो जाती है। नेशनल मीडिया फिर भी खामोश था, हर कोई सुशांत में मसरूफ़ था।

लेकिन जितना एएमयू के मेडिकल कॉलेज के डॉक्टर्स हैरान थे, उससे ज्यादा यूपी पुलिस और हाथरस के उस गांव बूलगढ़ी के लोग हैरान थे। सबसे ज्यादा हैरान थे रामकुमार उर्फ रामू के परिजन और सहकर्मी, जो एक आइसक्रीम फैक्ट्री में काम करता है और उस पूरे दिन वो सुबह से ही फैक्ट्री में था। आखिर उनकी हैरानगी की वजह क्या थी? इसके लिए आपको वारदात के दिन की घटनाएं जाननी पड़ेंगी।

 

वायरल वीडियो में क्या…
हाथरस शहर से आगरा की तरफ है थाना चंदपा। उसके बाहर पड़ी हुई पीड़िता का वो वीडियो अब तक शायद आपने देख ही लिया होगा। इस वीडियो में वो कह रही है कि ‘संदीप ने मेरी टेंटिया (गला) दबा दओ’ तो कोई पूछता है कि ‘गला क्यों दबाया?’, पीड़िता जवाब देती है कि, ‘जबरदस्ती ना करन दई तासू’। तासू का मतलब होता है इस वजह से। उसी दिन के दो और वीडियो लड़की की मां के हैं, जो वायरल हो रहे हैं, उसमें वो बोल रही हैं कि ‘हम घास काट रहे थे, गुड्डू के लड़के संदीप ने मेरी लड़की बाजरा के खेत में खींच लई और गला दबाने की कोशिश की’, वो ये भी कहती हैं कि पुरानी रंजिश है। आप इन दोनों बयानों से साफ समझ सकते हैं कि एक ही लड़के का नाम लिया गया और वो था संदीप। दूसरे मां ने कहीं भी रेप की बात नहीं की, केवल गला दबाने की बात की, तीसरे पीड़िता ने कहा कि संदीप ने गला इसलिए दबाया क्योंकि उसे जबरदस्ती नहीं करने दी। जबरदस्ती जो रेप करने की कोशिश भी हो सकती है, को संदीप ने करने की कोशिश की, जो पीड़िता ने सफल नहीं होने दी।

 

परिवार की तहरीर
इस दिन यानी वारदात के दिन सबसे अहम है परिवार की तरफ से दी गई तहरीर, जो उसके भाई ने अपने हस्ताक्षर के साथ दी है। ये तहरीर ही बाद में जांच के बाद एफआईआर में तब्दील हो गई। इसमें पीड़िता के भाई ने लिखा कि सुबह साढ़े नौ बजे जब मेरी मां और बहन घास काटने गई थीं, तो थोड़ी दूरी पर घास काट रही मेरी बहन को संदीप पुत्र गुड्डू जान से मारने की नीयत से बाजरे के खेत में गला दबा दिया और मां को जब चिल्लाने की आवाज आई तो वो बोली, मैं आ रही हूं तो वो भाग गया।

 

पुलिस की पहली लापरवाही
अब यहां पुलिस की पहली लापरवाही सामने आती है, लड़की ने वीडियो में उसी दिन थाने के सामने बताया कि उसके साथ जबरदस्ती करने की कोशिश कर रहा था संदीप, लेकिन आम तौर पर पुलिस ऐसे मामले टालने की कोशिश करती है। उसने छेड़खानी की धारा 354 नहीं लगाई, लेकिन जो धाराएं लगाईं, वो काफी अहम थीं। पहली जान से मारने की कोशिश करने पर लगने वाली धारा 307, दूसरी एससीएसटी एक्ट की धारा 3(2)5, यानी अब उसकी जमानत नहीं हो सकती थी, और जेल भी होती तो रेप की सजा से कम नहीं होती।

 

एमएलसी में रेप का जिक्र नहीं
चंदपा थाने के इंचार्ज ने दो पुलिस वालों को लड़की और परिजनों के साथ शहर के बागला कॉलेज हॉस्पिटल भेजा, जहां से फौरन उसे अलीगढ़ के मेडिकल कॉलेज में रेफर कर दिया गया, पीड़िता को सरकारी एम्बुलेंस में ही भेजा गया। उसी दिन एडमिट भी कर लिया गया। वहां पर पहला एमएलसी हुआ, जिसमें लड़की या परिजनों ने कोई भी रेप आदि की शिकायत नहीं दी और न ही डॉक्टर्स ने ऐसा कुछ अपनी रिपोर्ट में बताया। वाल्मीकि जाति की है पीड़िता और उसी जाति के हैं भाजपा सांसद राजवीर दलेर। वो भी आए और बाकी पार्टियों के नेता भी गांव में आए, हॉस्पिटल में परिजनों से मिले। लड़की की हालत गम्भीर होने लगी, दबाव पड़ा तो पुलिस ने छेड़खानी की धारा 354 भी जोड़ ली। जिला प्रशासन ने एससीएसटी एक्ट के तहत दिए जाने वाले मुआवजे की पहली किश्त 4,12,500 रुपए भी जारी कर दिए।

 

प्रशासन की दूसरी चूक
इस पूरे प्रकरण में छेड़खानी की धारा को देर से लगाना जिला प्रशासन को भारी पड़ने लगा था, लेकिन एक और चूक प्रशासन से ये हुई कि जब पीड़िता को दूसरे जिले में, चूंकि अब हाथरस अलग से जिला बन चुका है, अलीगढ़ का हिस्सा नहीं है, शिफ्ट कर दिया गया तो किसी न किसी आला अधिकारी को पीड़िता को देखने तो एक बार जाना ही चाहिए था, परिवार को भरोसे में रखना ही चाहिए था। लेकिन ऐसा न करना ही उनके लिए मुसीबत बन गया। दरअसल हाथरस के डीएम प्रवीण लक्षकार पहली बार डीएम का चार्ज मार्च में ही लेकर हाथरस आए थे, ऐसे में कोरोना से कामयाबी से निपटने और योगी के लिए पट्टे की जमीनों पर वापस सरकारी कब्जा दिलाने की मुहिम के चलते वो योगी की गुड लिस्ट में हैं, लेकिन पंचायती राज मंत्रालय में स्पेशल सेक्रेट्री जैसे जॉब के चलते पब्लिक डीलिंग का अनुभव उनके पास कम है।

 

दलित नेताओं ने लपका मौका
इसी वजह से वो लगातार परिवार से मिल रहे दलित नेताओं के उन पर प्रभाव को भांप नहीं पाए। उन्होंने शायद जातिगत समीकरणों को भी ध्यान से नहीं समझा। योगी की जाति यानी ठाकुर जाति को लेकर विपक्षी पहले ही योगी को निशाना बनाते रहे हैं, कभी ब्राह्मणों को भड़काते रहे हैं, अब दलितों की बारी थी। यहीं तीसरी गलती प्रशासन से और हो चुकी थी, जिससे दलित संगठन और नाराज हो रहे थे, 5 दिन बीत चुके थे, लेकिन संदीप को भी गिरफ्तार नहीं किया गया था। 19 सितम्बर को संदीप को गिरफ्तार किया जाता है, तब तक प्रशासन को लगने लगा था कि मामला हाथ से निकलता जा रहा है।

 

दूसरी एमएलसी रिपोर्ट में बलप्रयोग का जिक्र
अगले दिन यानी 20 सितम्बर को हाथरस जिले की सादाबाद तहसील के सीओ, जिन्हें इस केस का चार्ज दिया गया था, एएमयू मेडिकल कॉलेज जाते हैं, लेकिन बताया जाता है कि लड़की बोलने की हालत में नहीं है। फिर उनको 22 को बुलाया जाता है, उस दिन पीड़िता और उसके परिजन गैंगरेप का आरोप लगाते हैं। सीओ उसके आधार पर गैंगरेप की धारा 376 डी और जोड़ देते हैं। अलीगढ़ मेडिकल कॉलेज भी एमएलसी की कार्रवाई फिर से करता है, सैक्सुअल असॉल्ट फॉर्म भरवाया जाता है, लड़की की जांच की जाती है और निष्कर्ष में डॉक्टर ने लिखा कि ‘बल प्रयोग करने के निशान मिले हैं, लेकिन रेप (पेनीट्रेशन इंटरकोर्स) की पुष्टि के लिए एफएसएल की रिपोर्ट का इंतजार करना होगा। यानी इस रिपोर्ट में रेप की पुष्टि नहीं हुई थी, एफएसएल की रिपोर्ट पर छोड़ा गया था और बल प्रयोग की बात तो शुरू से ही थी। पहली एमएलसी में ही पीड़िता ने जवाब दिया था कि गले में दुपट्टे का फंदा बनाकर संदीप ने घसीटा था, और डॉक्टर्स ने उसी को गर्दन टूटने और रीढ़ की हड्डी में चोट की वजह माना था।

 

स्थानीय लोगों को भी पता है सच
अगले ही दिन पुलिस ने गैंगरेप के आरोपी लवकुश पुत्र रामवीर को भी गिरफ्तार कर लिया। गांव में चर्चा है कि वो मां को लेकर मामले को रफा-दफा करने पीड़िता के परिवार के पास आया होगा, क्योंकि वह संदीप का दोस्त था। 2 दिन और लगे रवि को गिरफ्तार करने में, रवि संदीप का चाचा था, चौथे अभियुक्त रामू पुत्र राकेश को 26 सितम्बर को गिरफ्तार किया गया। दिलचस्प बात थी कि पुलिस ने चारों के जो फोटोज जारी किए, उनमें से चेहरा केवल संदीप का ही चेहरा बिना मास्क या कपड़े के था, बाकी सबके चेहरे कपड़े के पीछे छुपे हुए थे। लोग कहते हैं कि पुलिस को पता था कि ये झूठे फंसाए जा रहे हैं, इसलिए पुलिस ने उनके कपड़े बंधे चेहरों के ही फोटो जारी किए थे, सच्चाई बेहतर पुलिस को ही पता होगी।

 

भाजपा विरोधी एएमयू का पहलू
एक और सबसे खास बात ये है कि ये अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का हॉस्पिटल था, जहां सीधे योगी सरकार की सत्ता नहीं चलती और दूसरे तमाम लोग वहां ऐसे भी हैं जो वैचारिक तौर पर भाजपा सरकारों के विरोधी हैं, सो मिलीभगत की गुंजाइश नहीं थी। दूसरी बड़ी बात ये कि एएमयू ने उसे 13 दिन अपने पास रखा, लड़की की तबियत लगातार खराब होती रही लेकिन उसे ना आगरा रेफर किया और न ही दिल्ली।

 

न ही रेप हुआ, न ही जीभ काटी गई
दिल्ली की इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने तय कर लिया था कि अब पीड़ित परिवार जो कहेगा वही चलाएंगे, और किसी की सुननी ही नहीं है। न इस बात की कि रेप की पुष्टि नहीं हुई है और न ही इस बात की कि जीभ नहीं काटी गई है, न ही पीड़िता और पीड़िता की मां के पुराने वीडियोज चलाने थे, जिसमें वो केवल एक आरोपी की बात कर रही हैं और रेप की बात कर ही नहीं रहीं। यहां तक कि रामू की आइसफैक्ट्री के लोग तक सामने आ गए कि ये तो उस दिन सुबह से यहीं था, लेकिन कोई भी चैनल उनकी बात चलाने के लिए तैयार नहीं था।

 

14 सितंबर… थाने में पीड़िता के भाई ने रिपोर्ट लिखवाई, इसमें सिर्फ गला दबाकर जान से मारने की कोशिश का जिक्र है।

30 सितंबर… पुलिस अफसरों ने आधी रात को पीड़िता के परिजनों के बिना ही अंतिम संस्कार कर दिया।

03अक्टूबर… अलीगढ मेडिकल कॉलेज की एसएफएल रिपोर्ट से ये साफ हुआ कि युवती के साथ दुष्कर्म नहीं हुआ।

 

इसलिए गरमाई राजनीति
माहौल तो भीम आर्मी के चंद्रशेखर की अलीगढ़ यात्रा से ही गरमाने लगा था, 28 सितंबर को दिल्ली आने पर धीरे-धीरे दिल्ली की मीडिया में हलचल होने लगी थी। कांग्रेस के नेता भी अभी तक किसान बिल पर ही अटके पड़े थे, लेकिन यूपी कांग्रेस के नेता लगातार केन्द्रीय नेतृत्व पर दबाव बना रहे थे कि इस केस को संज्ञान में लिया जाए। वैसे भी अलीगढ़ कांग्रेस की केन्द्रीय टोली के दिग्गज नेता और राहुल के करीबी विवेक बंसल का इलाका है, लेकिन चूंकि मामला दलितों से जुड़ा था, खासतौर पर वाल्मीकि जाति से तो कांग्रेस नेता श्यौराज जीवन भी सक्रिय हो गए।

अंतिम संस्कार का तरीका बना गले की फांस
आमतौर पर कोई भी एक्सीडेंट का केस होता है या किसी की मौत पर बवाल होने की आशंका होती है, तो सारे बड़े अधिकारी पोस्टमार्टम आदि के बाद घर जाकर तभी चैन से सोते हैं, जब उस लाश का अंतिम संस्कार हो जाए। यहीं बड़ी गलती प्रशासन से हुई, दिल्ली में तो भीम आर्मी से उन्होंने लाश बचा ली, लेकिन जिस तरह से आनन-फानन में अंतिम संस्कार किया गया और लिखित में या वीडियो पर घरवालों से सहमति नहीं ली गई, वो गले की फांस बन गई। उस पर वहां कोई बड़ा अधिकारी मौजूद नहीं था, जो मीडिया को हैंडल कर पाता।

(यह रिपोर्ट अब तक सामने आए तथ्यों और सबूतों पर आधारित है। हम किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच रहे क्योंकि सीबीआई जांच जारी है। हमने उन तथ्यों को भी लाने का प्रयास किया है जिन्हें मीडिया के एक बड़े वर्ग ने नज़रअंदाज कर दिया था।)

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