किसानों की बुनियादी समस्याओं को लेकर गंभीर नहीं आंदोलनकारी किसान नेता

– सुरेंद्र किशोर

ट्रैक्टर रैली के बहाने गणतंत्र दिवस पर दिल्ली में जिस तरह अराजकता फैलाई गई, उसकी जितनी निंदा की जाए, कम है। पिछले दो महीने से पंजाब, हरियाणा और पश्चिम उत्तर प्रदेश के कुछ किसान संगठन दिल्ली के आसपास की सड़कों को जामकर धरने पर बैठे हैं। इससे वहां के आसपास के उद्योग-धंधे चौपट हो रहे हैं। यातायात बुरी तरह प्रभावित है। विकास कार्य भी इससे ठप पड़े है। सवाल है कि किसान नेता ऐसा क्यों कर रहे है? अपने मुनाफे के लिए दूसरों को नुकसान क्यों पहुंचा रहे है? देखा जाए तो आंदोलनरत किसान देश या फिर खुद पंजाब, हरियाणा और पश्चिम उत्तर प्रदेश की मूल समस्याओं को लेकर गंभीर नहीं है। यदि वे संवेदनशील होते तो तीनों कृषि कानून रद करने की मांग करने के बदले खुद गंभीर बुनियादी समस्याओं के हल के लिए आंदोलन-प्रदर्शन करते।

पंजाब से राजस्थान के बीकानेर के लिए (भटिंडा-बीकानेर) एक ट्रेन चलती है। इसे कैंसर ट्रेन के नाम से भी जानते है। बीकानेर स्थित आचार्य तुलसी रीजनल कैंसर अस्पताल एवं रिसर्च सेंटर में कैंसर का मुफ्त इलाज होता है। पंजाब के कैंसर पीडि़त वहां अपना इलाज कराने जाते हैं। कैंसर अस्पताल में पंजाब में भी है, पर सामान्यतया वहां इलाज मुफ्त नहीं होता। राज्य की संपन्नता के बावजूद अब भी पंजाब के सारे किसान वैसे ही अमीर नहीं हैं, जैसे किसान अपनी महंगी कारों को लेकर दिल्ली की सीमा पर जमे हुए हैं। वे मुफ्त इलाज के लिए अन्य राज्य में जाने को मजबूर हैं। दिल्ली की सीमा पर धरनारत किसानों की संपन्नता देखकर उनके आढ़तिया-बिचैलिया होने की ही धारणा बनती है। 2000 से 2019 तक पंजाब के 3300 किसानों को आत्महत्या करनी पड़ी। वहां लाखों किसान कर्ज में डूबे हैं, क्योंकि खेती मुनाफे का सौदा नहीं है। ध्यान रहे कि यह स्थिति तब भी थी, जब ये तीनों कृषि कानून नहीं थे। सवाल उठता है कि क्यों आमतौर पर देश भर के किसान तो गरीब हो रहे हैं, पर बिचैलिए-आढ़तिए अमीर बन रहे है? मंडी के व्यापारियों ने किसानों की अलग-अलग जमात से मजबूत गठबंधन बना लिया है। व्यापारी खेती तथा अन्य जरूरतों को पूरा करने के लिए किसानों को कर्ज भी देते हैं।

पंजाब- हरियाणा के खेतों में रासायनिक खादों और कीटनाशक दवाओं का अंधाधुंध इस्तेमाल क्यों हो रहा है? यह इस्तेमाल आमजन के हक में है या मुनाफाखोर बिचैलियों के लाभ के लिए है। मुनाफाखोर चाहते हैं कि चाहे जमीन-पानी का जितना भी दोहन क्यों न हो, पर अच्छी-खासी मात्रा में उपज होनी चाहिए। इससे न सिर्फ पेयजल जहरीला हो रहा है, बल्कि खेतों की उर्वरा शक्ति भी कम होती जा रही है। भूजल के बड़े पैमाने पर सिंचाई के लिए इस्तेमाल के कारण भीतर का लवण बाहर आकर खेती योग्य जमीन को लवणीय बना रहा है। क्या किसान आंदोलनकारियों को सिर्फ मुनाफा चाहिए, भले कैंसरग्रस्त लोगों की संख्या बढ़ती जाए? पंजाब में कैंसर मरीजों की संख्या राष्ट्रीय औसत से अधिक है। कैंसर का एक बड़ा कारण खेतों में कीटनाशक दवाओं का अंधाधुंध इस्तेमाल है। पंजाब में किसान अपने खेतों में प्रति हेक्टेयर औसतन 923 ग्राम कीटनाशक देते हैं, जबकि राष्ट्रीय औसत 570 ग्राम प्रति हेक्टेयर है। ये समस्याएं हरित क्रांति की देन है।

अनाज की कमी को ध्यान में रखते हुए 1970 के दशक में खेतों में उन्नत बीज, रासायनिक खाद-कीटनाशक दवाओं और भूजल के अधिक इस्तेमाल पर जोर दिया गया। नतीजा सामने है। पंजाब में मुख्यमंत्री कैंसर राहत कोष योजना का प्रविधान करना पड़ गया, किंतु रासायनिक खाद और कीटनाशकों के अतिशय इस्तेमाल और अंधाधुंध भूजल दोहन का क्या असर हो रहा है, उस पर सरकार की नजर न के बराबर है। किसान आंदोलनकारियों के लिए तो यह विषय ही नहीं। उनके सामने यह भी विषय नहीं कि पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में धान और गन्ना जैसी अधिक पानी वाली फसलें क्यों उगाई जा रही है। इसका कोई मतलब नहीं कि जल संकट सामने देखते हुए भी पानी की अधिकता वाली फसलें उगाई जाएं।

काश! किसान नेता अपनी ही अगली पीढिय़ों के भविष्य के बारे में भी जरा सोच लेते। चिंताजनक स्थिति यह है कि कम महत्वपूर्ण या फिर देश के अन्य हिस्सों के लिए महत्वहीन मुद्दे पर दिल्ली में उपद्रव की स्थिति पैदा कर दी गई। किसानों और खासकर पंजाब के किसानों को क्या जैविक खेती की जरूरत को रेखांकित करते हुए आंदोलन नहीं करना चाहिए था? लेकिन वे नहीं कर रहे हैं। कोई भी विवेकशील व्यक्ति कहेगा कि कीटनाशक की बुराइयों एवं अत्यधिक भूजल दोहन के खिलाफ किसानों का आंदोलन होना चाहिए था, न कि बिचैलियों और आढ़तियों के मुनाफे के लिए। मौजूदा कृषि कानून विरोधी आंदोलन वैसे लोगों का अधिक लगता है जिन्हें अपने मुनाफे में कमी आने की आशंका सता रही है। इस आंदोलन को उकसाने और उसे जारी रखकर सरकार को परेशान करने के लिए कैसी-कैसी शक्तियां लगी हुई हैं, यह सब अब जगजाहिर हो चुका है। ये शक्तियां क्यों चाहेंगी कि ड्रग्स एवं कीटनाशक का इस्तेमाल कम हो जाए? ध्यान रहे कि ड्रग्स के बढ़ते चलन के कारण सेना में भर्ती के लिए पहले जैसे दमखम वाले जवान पंजाब में नहीं मिल रहे हैं। नेशनल डिफेंस अकादमी के प्रधान ने इस बात पर चिंता भी प्रकट की है।

आर्सेनिक युक्त जल और कैंसर जनित अनाज की समस्या देश के अन्य हिस्सों में भी कमोबेश है, पर पंजाब की समस्या अधिक गंभीर है। पंजाब सरकार ने जल शोधन संयंत्र जरूर लगाए हैं, पर उन संयंत्रों से पूरा पानी साफ नहीं हो पा रहा है। देश के विभिन्न हिस्सों में निजी एवं सरकारी प्रयासों से जैविक खेती का विस्तार किया जा रहा है। क्या पंजाब में भी जरूरत के अनुपात में कभी पर्याप्त जैविक खेती की जा सकेगी?

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं वरिष्ठ स्तंभकार है)

Next Post

आई लाईनर का ऐसे करें इस्‍तेंमाल, दिखेंगी आकर्षक

Sat Jan 30 , 2021
आई मेकअप करने का शौक हर एक लड़की को होता है। आईलाइनर, मस्कारा, आईब्रो पेंसिल, आई शैडो हर लड़कियां खरीदती है फिर भला चाहे कितने ही पैसे क्यों न खर्च करने पड़े। ब्रांडेड प्रोडक्ट्स भले ही मेहेंगे आते हैं पर वह स्किन को आंखों को बिलकुल भी नुकसान नहीं पहुचांते। […]