श्रद्धा और विश्वास प्रबल तो पाषाण से भी परमात्मा प्रकट

गुनो भई साधो |

महर्षि मार्कण्डेय की गणना धर्मग्रंथों में अष्ट चिरंजीवी के रूप में हुई है अर्थात् वे सदैव जीवित हैं। यह चिर जीवन उन्हें तप या सिद्धि से नहीं बल्कि भक्ति और विश्वास से अर्जित हुआ है। इसी कारण उनकी दिव्य उपस्थिति सतयुग, त्रेता और द्वापर तीनों की त्रिवेणी के सभी तटों पर सुलभ है।

– डॉ.विवेक चौरसिया, पौराणिक साहित्य के अध्येता

ध र्मग्रंथों के प्रकाशित पृष्ठों से जिज्ञासु पथिक बन गुजरते हुए भारत की महान ऋषि परम्परा के एक से बढ़कर एक ऋषियों के दर्शन होते हैं। कहीं आज तक आकाश में सितारे बन दमकते आलोकित सप्तऋषि हैं तो कहीं सृष्टि के कर्ता महर्षि कश्यप की कीर्ति। कहीं देवताओं के मार्गदर्शक बृहस्पति हैं तो कहीं मृत संजीवनी विद्या के प्रणेता दैत्यगुरु शुक्राचार्य। कहीं भगवान श्रीराम के गुरु ब्रह्मर्षि वशिष्ठ तो कहीं भगवान श्रीकृष्ण के गुरु महर्षि सांदीपनि। जीते जी त्रिशंकु को स्वर्ग के द्वार तक पहुँचाने में समर्थ महापराक्रमी राजर्षि विश्वामित्र भी और अपने तप बल से महान विंध्याचल पर्वत की वृद्धि को रोक देने वाले तेजस्वी अगस्त्य भी। अपने परशु के बूते अनेक बार पृथ्वी को निरंकुश क्षत्रियों से रिक्त कर देने वाले परशुराम भी और नारायण के नित्य गायक देवर्षि नारद भी। आदिकाव्य रामायण के रचयिता महाकवि वाल्मीकि भी तो पंचम वेद महाभारत के रचनाकार वेदव्यास भी।

महाकाल के आँगन में लोग महामृत्युंजय का सशुल्क जाप कराते हैं मगर सभी के मनोरथ सिद्ध नहीं होते। कारण कलयुग में मंत्र की शक्ति का क्षीण होना नहीं है बल्कि भक्ति में विश्वास की न्यूनता है।

अनगिनत नाम हैं और असंख्य कथाएँ। सबके दिव्य व्यक्तित्व और अलौकिक कृतित्व। सभी प्रेरणा के पुंज हैं और सबके जीवन सन्देशदायी हैं मगर इन सबमें महर्षि मार्कण्डेय सबसे अलग और अद्भुत है। शेष ऋषियों के असाधारण कृतित्व का अनुकरण साधारण जन के लिए असम्भव है किन्तु असाधारण कर्म कर मृत्यु तक पर विजय पा लेने वाले मार्कण्डेय का अनुकरण सम्भव ही नहीं अपितु मुक्ति के लिए आवश्यक भी है।

महर्षि मार्कण्डेय की गणना धर्मग्रंथों में अष्ट चिरंजीवी के रूप में हुई है अर्थात् वे सदैव जीवित है। यह चिर जीवन उन्हें तप या सिद्धि से नहीं बल्कि भक्ति और विश्वास से अर्जित हुआ है। इसी कारण उनकी दिव्य उपस्थिति सतयुग, त्रेता और द्वापर तीनों की त्रिवेणी के सभी तटों पर सुलभ है। महाभारत में उन्हें अनेक प्रलयों का दृष्टा कहा गया है तो रामकथा में मार्कण्डेय बालकाण्ड में रामविवाह में बाराती है तो उत्तरकाण्ड में सीताजी के भूमि में प्रवेश की घटना के भी साक्षी है। महाभारत के वनपर्व में वनवासी पाण्डवों को जीवन सूत्रों का उपदेश देने के लिए उपस्थित है और साक्षात श्रीकृष्ण के कर कमलों से पूजे गए हैं। वनपर्व के अंत में जयद्रथ द्वारा द्रौपदी हरण से दुःखी युधिष्ठिर को मार्कण्डेय ने ही रामोपाख्यान सुनाकर राज्य निष्कासित राजा के ह्रदय में आशा का संचार किया है। उनकी कीर्ति गाथा इतनी विस्तृत है कि प्रायः हर पुराण में वे कहीं न कहीं अपनी प्रभा प्रसारित करते हुए प्रस्तुत हो जाते हैं। यहाँ तक कि स्वयं उनके नाम से एक मार्कण्डेय पुराण है जिसका एक भाग ‘दुर्गा सप्तशती’ के रूप में शाक्त भक्तों का कण्ठहार है।

मार्कण्डेय ब्रह्मा, शिव, शक्ति और विष्णु सभी के प्रिय हैं लेकिन उनकी प्रसिद्धि शिवजी की उस अनन्य भक्ति के कारण है जिसने उन्हें शिव के समान ही मृत्युंजय बना दिया। यह कथा अनेकत्र उपलब्ध है लेकिन सबसे सुंदर ढंग से पद्म पुराण के उत्तरखण्ड में कही गई है। इसके अनुसार इनके पिता मृकण्डु ने शिवजी की तपस्या कर उनके वरदान से मार्कण्डेय को पुत्र रूप में पाया था। मगर विधाता ने मार्कण्डेय की आयु 16 वर्ष ही लिखी थी। जब मार्कण्डेय के जीवन का समापन निकट आया तो वे दक्षिण सागर के तट पर गए और शिवभक्ति में लीन हो गए। उन्होंने ‘महामृत्युंजय मंत्र’ का निरंतर जाप किया, फलत: जब काल उनके प्राण हरण को निश्चित घड़ी में पहुँचा तब कथानुसार शिवलिंग से स्वयं शिवजी प्रकट हो गए और न केवल मार्कण्डेय की प्राणरक्षा की अपितु चिरजीवन प्रदान कर अनन्य भक्ति पर अपनी असीम कृपा की मुहर लगा दी।

यही कारण है कि ऋग्वेद के सातवें मण्डल के 59 वें सूक्त का 12 वाँ मंत्र ‘ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिम् पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्।।’ मार्कण्डेय के साथ इस तरह जुड़ा कि अपने मूल में वशिष्ठ कृत होने के बावजूद लोक में मार्कण्डेय का रचा मान लिया गया। गायत्री मंत्र के समतुल्य महामृत्युंजय मंत्र न केवल वेद की चैतन्य निधि है बल्कि आज भी मरणासन्न व्यक्ति की प्राणरक्षा के लिए अचूक शब्द-संजीवनी है। प्रबल लोक विश्वास है कि इसके जाप से किसी की आसन्न मृत्यु उसी प्रकार टाली जा सकती है जैसे मार्कण्डेय ने अपनी मृत्यु को टालकर अपने माता-पिता को हर्षित किया था। हालांकि पद्म पुराण के अनुसार मार्कण्डेय ने 16 श्लोकों का एक स्वरचित स्तोत्र जपा था लेकिन लोक में वेदोक्त महामृत्युंजय मंत्र ही मार्कण्डेय से अभिन्न होकर मुक्ति का प्रमाण बना हुआ है।

साधो! मेरी जन्मभूमि भूतभावन महाकाल की नगरी उज्जयिनी है जो पुराणों में कालों के काल मृत्युंजय महादेव के रूप में वंदित हैं। प्रतिवर्ष देश-दुनिया के असंख्य लोग अपने परिजनों की आसन्न मृत्यु टालने के लिए महाकाल के आँगन में महामृत्युंजय का सशुल्क जाप कराते हैं मगर सभी के मनोरथ सिद्ध नहीं होते। कारण कलयुग में मंत्र की शक्ति का क्षीण होना नहीं है बल्कि भक्ति में विश्वास की न्यूनता है। मंत्र तो हर देश और काल में अचूक है मगर उसकी सफलता के लिए मार्कण्डेय सरीखी अनन्यता और अडिगता अपेक्षित है। यदि श्रद्धा और विश्वास प्रबल हो तो पाषाण से भी परमेश्वर प्रकट होकर भक्त की रक्षा कर लेता है, अन्यथा जाप केवल यांत्रिक, आर्थिक और औपचारिक हो तो परमात्मा पाषाण ही बना रह जाता है। मार्कण्डेय की कथा सदियों से इसी की सीख दे रही है। जो इसका मर्म समझते हैं उनके ही मनोरथ सिद्ध होते हैं और जो चूक जाते हैं वे मरते तो हैं ही, मुक्त भी नहीं हो पाते हैं!

Next Post

इस बार 12 नहीं, 11 साल बाद हो रहा हरिद्वार में महाकुंभ, यह है वजह

Tue Mar 9 , 2021
भोपाल । इस साल महाशिवरात्रि का पर्व 11 मार्च को मनाया जाएगा। इस दिन हरिद्वार में कुम्भ का शाही स्नान होगा और एक अप्रैल से महाकुंभ की शुरुआत होगी। आमतौर पर हर 12 साल के बाद महाकुंभ होता है लेकिन इस बार बृहस्पति की आकाशीय स्थिति के कारण 11 साल […]