आत्मनिर्भर भारत और चीन की चुनौतियां

– विक्रम उपाध्याय

लद्दाख में चीन ने हमारी सीमाओं को लांघने की जो हिमाकत की और उसके प्रत्युत्तर में भारत ने जो चीन को जवाब दिया उसकी चर्चा सदियों तक होती रहेगी। सामरिक दृष्टिकोण से हमने चीन को इसबार पटखनी दे दी है। लेकिन भारत और चीन के बीच इस द्वंद्व की कोख से पैदा हुआ है एक अभियान जिसे प्रधानमंत्री मोदी ने आत्मनिर्भर भारत का नाम दिया है। 20 मई 2020 को प्रधानमंत्री ने आत्मनिर्भर भारत अभियान की घोषणा करते हुए कहा कि था कि इस संकल्प को सिद्ध करने के लिए, जमीन, श्रम पैसा और कानून सभी पर बल दिया गया है। आर्थिक रूप से किसी देश को समृद्ध बनाने के लिए आत्मनिर्भरता से ज्यादा और किस चीज की दरकार भला हो सकती है।

भारत इस आत्मनिर्भरता को प्राप्त करने की दिशा में चल निकला है लेकिन उसकी इस राह में सबसे बड़ी चुनौती चीन ही पेश कर रहा है। इससे पार पाने का कोई अल्पकालीन नीति नहीं अपनाई जा सकती है। चीन ने भारत को चुनौती परोक्ष रूप में नहीं दी है, बल्कि सीधे और खम ठोककर कहा है कि भारत विकास की कोई भी योजना चीन को दरकिनार कर नहीं बना सकता। 7 मार्च 2021 को चीन के समाचार पत्र ग्लोबल टाइम्स ने एक लेख प्रकाशित किया है जिसका शीर्षक है- हार्ड रियालिटी डैट इंडिया कैन नॉट डॉज व्हेन मेकिंग डेवलपमेंट पॉलिसी। यानी चीन का साफ कहना है कि बिना उसे साथ लिए भारत विकास कर ही नहीं सकता। हालांकि चीन के किसी भी समाचार के प्रकाशन का लक्ष्य चीनी सरकार का प्रोपोगेंडा करना होता है, क्योंकि चीन में कोई आजाद मीडिया तो है नहीं, फिर भी इस लेख में जो दलील और आकड़े दिए गए हैं उसे नजरंदाज नहीं किया जा सकता।

चीन का कहना है कि आत्मनिर्भर भारत जैसे अभियान का संकल्प देशभक्ति की भावनाओं से किया गया है, जबकि वास्तविकता कुछ और है। चीन इसे पुख्ता करने के लिए कुछ आकड़े प्रस्तुत कर रहा है। मसलन भारत सरकार ने चीन के साथ सीमा संघर्ष बढ़ने के दौरान चीनी कंपनियों पर कई तरह की पाबंदियां लगा दी। चीनी ऐप बंद कर दिए, कई ठेके निरस्त कर दिए, इसके बावजूद दोनों देशों के बीच इस दौरान भी जबर्दस्त बिजनेस हुआ। अप्रैल से दिसंबर 2020 के दौरान चीन भारत का सबसे बड़ा बिजनेस पार्टनर बनकर उभरा। यहां तक कि चीन ने भारत से व्यापार करने के मामले में अमेरिका को पीछे छोड़ दिया। इस अवधि में भारत ने चीन को 15.3 अरब डॉलर का निर्यात किया तो 45.4 अरब डॉलर का आयात किया। यानी भारत प्रतिबंध के दौरान भी चीन से माल खरीदता रहा। चीन अब इसी आकड़े को आधार बनाकर आत्मनिर्भर भारत अभियान पर कटाक्ष कर रहा है और ज्ञान दे रहा है कि केवल देशभक्ति के नारे से विकास नहीं हो सकता है।

क्या आयात-निर्यात के इन आकड़ों तक सीमित है आत्मनिर्भर भारत अभियान? नहीं। आत्मनिर्भर भारत के अभियान का आयाम बहुत बड़ा है। एक साल में कोई देश इतनी तरक्की नहीं कर सकता कि उसकी परनिर्भरता समाप्त हो जाए। खुद चीन ने अपनी विकास की यात्रा 40 सालों में पूरी की है। 1978 में माओ की मृत्यु के बाद चीन ने सोशलिस्ट इकोनॉमी मॉडल को छोड़कर मिश्रित अर्थव्यवस्था की राह पकड़ी थी। यह अलग बात है कि 1980 से लेकर 2005 तक लगातार चीन 10 प्रतिशत से अधिक की दर से विकास करता रहा। लोग कहते हैं कि चीन ने इस विकास यात्रा में दुनिया के तमाम नियम कानून, बिजनेस इथिक्स और मानवाधिकार आदि को ताक पर रख दिया था लेकिन आज की पीढ़ी तो चीन के विकास मॉडल को ही जानती है।

भारत के सामने चीन की चुनौतियां हैं, इससे कोई इनकार नहीं किया जा सकता। सबसे बड़ी चुनौती चीन की बढ़ती आर्थिक ताकत ही है। चीन आज भी पूरी दुनिया का सबसे चहेता इनवेस्टमेंट डेस्टीनेशन बना हुआ है। यही नहीं चीन अपनी आर्थिक ताकत का इस्तेमाल कर कई देशों की अर्थव्यवस्था में पैठ बना चुका है। पिछले 15 साल के चीनी निवेश के पैटर्न पर नजर डालें तो पाएंगे कि 2005 से 2019 के दौरान चीन ने अमेरिका में 183.2 अरब डॉलर का निवेश किया है तो यूनाइटेड किंग्डम में 83 अरब डॉलर का। कनाडा में लगभग 60 अरब डॉलर का चीनी निवेश हुआ है तो जर्मनी में 47 अरब डॉलर का। चाइना ग्लोबल इनवेस्टमेंट ट्रैकर के अनुसार चीन का ग्लोबल निवेश 2 खरब डॉलर से ज्यादा का है। जबकि एक अन्य अमेरिकी एजेंसी के अनुसार चीन का ग्लोबल निवेश 5.7 खरब डॉलर का है। यानी भारत के कुल बजट से भी अधिक का निवेश चीन दुनिया के अन्य देशों में कर चुका है। चीन अपने इस निवेश का इस्तेमाल अपने अनुकूल फैसले कराने में करता है। भारत इस मामले में अभी चीन की चुनौती कबूल नहीं कर सकता।

टेक्नोलॉजी ऐसा क्षेत्र है जहां भारत, चीन का न सिर्फ मुकाबला कर सकता है, बल्कि कई सेक्टर में उससे आगे भी है। रिसर्च एंड डेवलपमेंट के मामले में भारत को ज्यादा विश्वसनीय माना जाता है बनिस्पत चीन के। हालांकि टेक्नोलॉजी से संबंधित कंपनियां और पेटेंट्स आदि अभी भी चीन में ज्यादा हैं लेकिन भारत इस मामले में चीन को हमेशा टक्कर दे सकता है। भारत को चीन के मामले में कई सेक्टर में इसलिए बढ़त हासिल है कि भारत की अधिकतर जनसंख्या अंग्रेजी भाषा में काम करना जानती है। यही कारण है कि दुनिया की तमाम टेक्नोलॉजी कंपनी जैसे एप्पल, गूगल, माइक्रोसॉफ्ट और फेसबुक जैसी कंपनियां भारत में हैं और इनके ग्लोबल ऑपरेशन में भी भारतीयों का बोलबाला है। अंतरिक्ष विज्ञान में भी भारत के इसरो का नाम दुनिया के बेहतरीन स्पेश साइंस ऑर्गेनाइजेशन के रूप में आता है। संभवतः हम दुनिया में सबसे सस्ता और विश्वसनीय अंतरिक्ष कार्यक्रम चलाने वाले देश हैं। हाल ही में इसरो ने अकेले रॉकेट से 109 सैटेलाइट को लांच किया।

कोरोना के बाद भारत का जिस तरह से वर्ल्ड मेडिसिन सुपर पावर के रूप में प्रादुर्भाव हुआ है वह न सिर्फ गर्व की बात है, बल्कि फार्मास्यूटिकल के क्षेत्र में हमारा दबदबा भी सिद्ध हुआ है। चीन इस मामले में बुरी तरह पिट चुका है और वह भारत के खिलाफ सिर्फ प्रोपोगेंडा करने में लगा है।

आत्मनिर्भर भारत के अभियान में भारत को सबसे बड़ी चुनौती चीन के मैन्यूफैक्चिरिंग क्षेत्र से मिलने वाली है। लेकिन कोविड ने भारत को एक बड़ा अवसर दिया है। क्योंकि कोविड के कारण चीन की वैश्विक स्थिति कमजोर हुई है जो भारत के लिए वरदान हो सकता है। भारत के कई राज्य जिनमें उत्तर प्रदेश सबसे प्रमुख है, अपने यहां मैन्युफैक्चिरिंग हब बनाने में जुटे हैं। पहले से ही चीन से दूरी बनाने का मन बना चुकी विदेशी कंपनियां को आकर्षित करने के लिए आर्थिक कार्यबल का गठन किया जा चुका है। इन्वेस्ट इंडिया का अभियान इस दिशा में जोरों से चल रहा है।

भले चीन ने घुड़की दी है कि बिना उसके भारत का काम नहीं चल सकता, लेकिन चीन यह बताना भूल गया कि विकास के पैमाने पर भारत में बहुत सारे संरचनात्मक परिवर्तन किए जा चुके हैं। आने वाले दशक में भारत की वृद्धि जारी रहेगी और बढ़ेगी। सॉफ्टवेयर निर्यात पिछले दो वर्षों में दोगुना हो गया है। भारत की विशाल जनसंख्या इस विकास को बनाए रखने में बहुत मदद करेगी।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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