हर साल फेंक रहे दो लाख टन अनाज

मुद्दा |
एक तरफ पूरी दुनिया में करोड़ों लोग भूखे पेट सोने को लाचार हैं, वहीं भारत समेत दुनिया के कई देशों में उचित ढंग से अनाज का भंडारण नहीं होने से करोड़ों टन अनाज खुले में पड़ा रहकर बरसात में बर्बाद हो जाता है।

 – प्रमोद भार्गव, वरिष्ठ पत्रकार

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के खाद्य अपशिष्ट सूचकांक-2021 ने दुनिया में किए जा रहे भोजन की बर्बादी का जो खुलासा किया है, वह अत्यंत चिंताजनक है। एक तरफ पूरी दुनिया में करोड़ों लोग भूखे पेट सोने को लाचार हैं, वहीं भारत समेत दुनिया के कई देशों में उचित ढंग से अनाज का भंडारण नहीं होने से करोड़ों टन अनाज खुले में पड़ा रहकर बरसात में बर्बाद हो जाता है। भारतीय परंपरा में अनाज के आदर एवं बचत की सीख बचपन से ही दी जाती है, बावजूद भारतीय घरों में हर साल प्रतिव्यक्ति करीब पचास किलोग्राम खाना कचरे के हवाले कर दिया जाता है। इस रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में प्रति वर्ष करीब 93.10 करोड़ टन भोजन कचरे में फेंक दिया जाता है। यह दुनिया के कुल खाने का करीब 17 फीसदी है। घरों के अलावा यह भोजन संस्थानों, भोजनालयों, होटलों और रेस्टोरेंट्स में रोजाना बर्बाद होता है। जिन घरों में आर्थिक संपन्नता बढ़ी है, उन घरों में सबसे ज्यादा भोजन फेंका जाता है। दक्षिण एशिया में भारत में सबसे ज्यादा अनाज की बर्बादी होती है। यदि दुनिया में बर्बाद होने वाले भोजन को बचा लिया जाए तो भूख से पीड़ित 69 करोड़ लोगों का पेट भरा जा सकता है। यूएनईपी के कार्यकारी निदेशक इनगर एंडरसन ने कहा है कि खाद्य अपशिष्ट कम करने से गैस उत्सर्जन में कमी आएगी, नतीजतन जिस प्रदूषण से प्रगति का विनाश हो रहा है, उस पर अंकुश लगेगा। साथ ही भोजन की उपलब्धता बढ़ेगी और धन की बचत होगी, इसलिए इस बर्बादी पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।

भण्डारण की ठीक व्यवस्था न होने के कारण कई साल से डेढ़ से दो लाख टन अनाज खराब हो रहा है। यह एफसीआई के कुल भण्डारण का एक तिहाई हिस्सा है। इस अनाज से एक साल तक दो करोड़ से भी ज्यादा लोगों का भोजन कराया जा सकता है। अनाज गोदामों की कमी की बजाय भण्डारण में बरती जाने वाली लापरवाहियों के चलते भी होता है।

भारत में साठ के दशक में हरित क्रांति की शुरूआत के साथ ही अनाज भण्डारण की समस्या भी सुरसा मुख बनती रही है। एक स्थान पर बड़ी मात्रा में भंडारण और फिर उसका संरक्षण अपने आप में एक चुनौती भरा और बड़ी धनराशि से हासिल होने वाले लक्ष्य है। इस बार पूरे देश में 29.19 करोड़ टन अनाज का उत्पादन हुआ है। यह आबादी की जरूरत से 7 करोड़ टन ज्यादा है। इसमें से कई करोड़ टन अनाज एफसीआई के परिसरों में खुले में पड़ा है। रिपोर्ट में बताया है कि भारत में एक करोड़ 93 लाख 59 हजार 951 किलोग्राम अनाज या भोजन प्रतिवर्ष बर्बाद होता है। इस बर्बादी पर प्रतिबंध लगा दिया जाए तो भारत की वैश्विक भूखमरी सूचकांक में जो स्थिति है, उसमें सुधार आ सकता है। 2020 के सूचकांक में भारत का स्थान 94वें पर है। हालांकि 2019 में यह सूचकांक 102वें और 2028 में 103वें स्थान पर था। इस लिहाज से 2020 में भंडारण की स्थिति सुधरी है।

दरअसल देश में किसानों की मेहनत और जैविक व पारंपरिक खेती को बढ़ावा देने के उपायों के चलते कृषि पैदावार लगातार बढ़ रही है। अब तक हरियाणा और पंजाब ही गेहूं उत्पादन में अग्रणी प्रदेश माने जाते थे, लेकिन अब मध्यप्रदेश, बिहार, उत्तर-प्रदेश और राजस्थान में भी गेहूं की रिकार्ड पैदावार हो रही है। इसमें धान, गेहूं, मक्का, ज्वार, दालें और मोटे अनाज व तिलहन शामिल हैं। इस पैदावार को 2020-21 तक 28 करोड़ टन तक पहुंचाने का सरकारी लक्ष्य था, जो 29.19 करोड़ टन अनाज पैदा करके पूरा कर लिया गया है। लेकिन मध्य-प्रदेश के साथ साथ पूरा देश बारदाना और इसके भंडारण के संकट से जूझ रहा है। लाखों टन खुले में पड़ा गेहूं बारिश से भीगकर सड़ गया है। बारदाना उपलब्ध कराने की जवाबदारी केंद्र सरकार की है, लेकिन यह कोई बाध्यकारी नहीं है। राज्य सरकारें चाहें तो वे भी बारदाना खरीदने के लिए स्वतंत्र हैं। किंतु लालफीताशाही के चलते हरेक साल इस समस्या से दो-चार होना पड़ता है। जबकि यह कोई प्राकृतिक आपदा नहीं है, जो अचानक टूट पड़ती हो? न्यूनतम समर्थन मूल्य पर आनाज की पूरे देश में एक साथ खरीद, भंडारण और फिर राज्यवार मांग के अनुसार वितरण का दायित्व भारतीय खाद्य निगम के पास है। जबकि भंडारों के निर्माण का काम केंद्रीय भण्डार निगम संभालता है। इसी तर्ज पर राज्य सरकारों के भी भण्डार निगम हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि आजादी के 73 साल बाद भी बढ़ते उत्पादन के अनुपात मे केंद्र और राज्य दोनों ही स्तर पर अनाज भण्डार के मुकम्मल इंतजाम नहीं हुए हैं।

एफसीआई की कुल भण्डारण क्षमता बमुश्किल 738 करोड़ टन है। इसमें किराए के भण्डार गृह भी शमिल हैं। यदि सीडब्लूसी और निजी गोदामों को भी जोड़ लिया जाए तो यह क्षमता 12.5 करोड़ टन अनाज-भण्डारण की है। किसानों के वोट के लालच में राज्य सरकारें जिस हिसाब से समर्थन मूल्य पर अनाज की खरीद कर रही हैं, उस कारण कई करोड़ टन अतिरिक्त अनाज खरीद लिया जाता है। नतीजतन समुचित भण्डारण नामुमकिन हो जाता है। केन्द्र सरकार यदि दूरदृष्टि से काम लेती तो गोदामों में पहले से भरे अतिरिक्त अनाज को निर्यात करने की छूट दे सकती थी? इससे जहां गोदाम खाली हो जाते, वहीं व्यापारियों को दो पैसे कमाने का अवसर मिलता? यदि इसी अनाज को पंचायत स्तर पर मध्यान्ह भोजन, बीपीएल एवं एपीएल कार्डधारियों को सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिए स्थानीय स्तर पर ही सस्ती दरों में उपलब्ध करा दिया जाता तो तब भी भंडारण की समस्या कम हो जाती? किंतु ऐसा लगता है सड़े अनाज से शराब बनाने वाली कंपनियों के लिए अनाज सड़ाने का इंतजाम नौकरशाही एक सोची-समझी मंशा से हर साल कर देती है। मांसाहार को बढ़ावा देकर भी अनाज की बर्बादी की जा रही है। सौ कैलोरी के बराबर मांस तैयार करने के लिए 700 कैलोरी के बराबर अनाज खर्च होता है। जिस तरह बकरे या मुर्गियों के पालन में जितना अनाज खर्च होता है, उतना अगर सीधे भोजन के रूप में प्रयोग में लाया जाए तो कहीं ज्यादा लोगों की भूख मिटा सकता है। भोजन में मांस का चलन बढ़ने का कारण भारत में 20 प्रतिशत से भी ज्यादा लोगों को भुखमरी का अभिशाप झेलना पड़ा रहा है। बावजूद नीतिगत रूप से मांसाहार को बढ़ावा दिया जा रहा है। जाहिर है, यदि देश को मांसाहारी बनाने की कोशिशें की जाती हैं तो भुखमरी की समस्या और भयावह रूप में सामने आएगी।

भण्डारण की ठीक व्यवस्था न होने के कारण कई साल से डेढ़ से दो लाख टन अनाज खराब हो रहा है। यह एफसीआई के कुल भण्डारण का एक तिहाई हिस्सा बैठता है। इस अनाज से एक साल तक दो करोड़ से भी ज्यादा लोगों का भोजन कराया जा सकता है। अनाज गोदामों की कमी की बजाय भण्डारण में बरती जाने वाली लापरवाहियों के चलते भी होता है। दरअसल कई मर्तबा एफसीआई अपने गोदाम बहुराष्ट्रीय कंपनियों को किराए पर उठा देती है। इन कारणों से कंपनियों का माल तो सुरक्षित हो जाता है, लेकिन गरीबों का भोजन सड़ने को खुले में छोड़ दिया जाता है। दरअसल कृषि एवं खाद्य आपूर्ति मंत्रालय की अनाज भण्डारण से लेकर वितरण तक की नीतियां परस्पर विरोधाभासी हैं। इनके चलते उत्पादक उपभोक्ता एवं व्यापारी तीनों लाचार हैं। जबाबदेही के लिए जिम्मेदार प्रशासक इन खामियों पर व्यवस्था की कमी जताकर पर्दा डालने का काम करते हैं। इन नीतियों को आमूलचूल बदलने की जरूरत है। यदि भारतीय खाद्य निगम विकेंद्रीकृत खाद्य नीति अपनाए तो ग्राम स्तर पर भी अनाज भण्डारण के श्रेष्ठ उपाय किए जा सकते हैं। स्थानीय स्तर पर भारतीय ज्ञान परंपरा में ऐसी अनूठी भण्डारण की तकनीकें प्रचलन में हैं, जिनमें रखा अनाज बारिश, बाढ़, चूहों व कीटाणुओं से बचा रहता है। बिहार, असम, मध्यप्रदेश, राजस्थान और उत्तर-प्रदेश में बाढ़ से अनाज को बचाने के लिए किसान इन्हीं तकनीकों का इस्तेमाल करते हैं। अनाज-भण्डारण की एक नई तकनीक भी कुछ साल पहले इजाद हुई है। इस तरकीब से वायुरहित ऐसे पीपे (सोलो बैग) तैयार किए गए हैं, जिनमें अनाज का भण्डारण करने से अनाज पानी व कीटों से शत-प्रतिशत् सुरक्षित रहता है।

गांव में अनाज खरीदकर एफसीआई उसके भण्डारण की जिम्मेदारी किसानों को सौंप सकती है। किसान के पास अनाज सुरक्षित बना रहे इसके लिए प्रति क्विंटल की दर से किसान को किराया दिया जाए। यदि ऐसे उपाय अमल में लाए जाते हैं तो सरकार ढुलाई, लदाई, उतराई के खर्च से बचेगी। साथ ही अनाज के यातायात में जो छीजन होता है, वह भी नहीं होगा। सरकार प्रति वर्ष करीब 584 रुपए प्रति क्विंटल खाद्यान्न, फल और सब्जियों के रखरखाव पर खर्च करती है। लेकिन भण्डारण में किसान की कोई भूमिका तय नहीं है। यदि सरकार किसान के पास ही सुरक्षित रखने के लिए आर्थिक मदद करे तो इस उपाय से न केवल उचित भण्डारण होगा, बल्कि अन्नदाता किसान, फसल की सुरक्षा अपनी संतान की तरह करेगा। क्योंकि उसके द्वारा उपजाये अनाज में खून-पसीने की मेहनत लगी होती है। बहरहाल, पंचायत स्तर पर भंडारण को नीतिगत मूर्त रूप दिया जाता है तो कालाबाजारी और भ्रष्टाचार की आशंकाएं भी नगण्य रह जाएंगी। लेकिन देश में फिलहाल ग्रामीण, किसान और मजदूर से जुड़ा विकेंद्रीकृत नीतिगत सुधार मुश्किल है? हालांकि नए कृषि कानूनों में जो सुधार किए गए हैं, उनमें भंडारण के समूचित उपाय किए गए हैं। लेकिन इन कानूनों का जिस स्तर पर विरोध हो रहा है, उससे लगता है कि इन पर अमल हो भी पाएगा अथवा नहीं?

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