भूजल में गिरावट से खेती में 68 फीसदी तक आ सकती है कमी

भारत में भूजल को छोड़कर यदि सिंचाई के लिए अन्य स्रोतों से पानी की व्यवस्था नहीं की जाती है तो सर्दियों में उगने वाली फसल का उत्पादन कम हो सकता है। भूजल के घटते स्तर को देखते हुए भारत सरकार ने सुझाव दिया है कि सिंचाई नहरों द्वारा की जाए।

– दयानिधि, स्वतंत्र लेखक

भारत गेहूं और चावल उत्पादन करने वाला दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश है और यहां 60 करोड़ से अधिक किसान खेती करते हैं। सिंचाई के लिए भूजल पर बढ़ती निर्भरता के कारण 1960 के दशक के बाद से देश ने प्रभावशाली तरीके से खाद्य-उत्पादन किया है, जिससे भारतीय किसानों को ज्यादातर शुष्क सर्दियों और गर्मियों के मौसम में उत्पादन को बढ़ाने में मदद मिली।

लेकिन उत्पादन में हुई इस वृद्धि के लिए एक कीमत भी चुकाई हैं, दुनिया की 10 फीसदी फसलों का उत्पादन करने वाला देश अब दुनिया भर में सबसे अधिक भूजल का उपयोग करता है, इसलिए भारत के अधिकांश हिस्सों से भूजल तेजी से समाप्त हो रहा है। भूजल के घटते स्तर को देखते हुए भारत सरकार के अधिकारियों ने सुझाव दिया है कि सिंचाई नहरों द्वारा की जाए, नहरों के माध्यम से झीलों और नदियों से सतह के पानी को खेतों तक लाया जाता है, यह दोनों तरह की बाधाओं को दूर करने का एक तरीका है।

लेकिन एक अध्ययन के माध्यम से मिशिगन विश्वविद्यालय के शोधकर्ता और उनके सहयोगियों ने निष्कर्ष निकाला है कि भारतीय कृषि में भूजल के नुकसान को कम करने के लिए नहर से सिंचाई करना पूरी तरह से इस नुकसान की भरपाई नहीं करेगा। यह अध्ययन जर्नल साइंस एडवांस में प्रकाशित हुआ है। अध्ययनकर्ताओं का अनुमान है कि अगर भारतीय किसानों को जिन क्षेत्रों में बहुत अधिक भूजल निकाला गया है, अब उन्हें इसके उपयोग करने से रोक देते हैं, यदि सिंचाई के लिए अन्य स्रोतों से पानी की व्यवस्था नहीं की जाती है तो सर्दियों में उगने वाली फसल का क्षेत्रफल 20 फीसदी तक कम हो सकता है।

इस बात की अधिक संभावना है कि भविष्य में भूजल की कमी, नहर से सिंचाई में वृद्धि से आंशिक रूप में पूरी हो सकती है। शोधकर्ताओं के अनुसार, भले ही सभी भारतीय खेती वाले क्षेत्र वर्तमान में नहर से सिंचाई के लिए कम भूजल का उपयोग कर रहे हैं, लेकिन सबसे गंभीर रूप से प्रभावित स्थानों में सर्दियों में उगने वाली फसल का क्षेत्र 24 फीसदी तक कम हो सकता है। मिशिगन विश्वविद्यालय के प्रमुख अध्ययनकर्ता मेहा जैन ने कहा हमारे परिणाम भारतीय कृषि और ग्रामीण आजीविका के लिए भूजल के महत्व पर प्रकाश डालते हैं। हम यह दिखाने में सक्षम थे कि एक वैकल्पिक सिंचाई स्रोत के रूप में बस नहर से सिंचाई प्रदान करना संभवतः भूजल की कमी के कारण वर्तमान उत्पादन स्तर को बनाए रखने के लिए पर्याप्त नहीं होगा। अध्ययन में उच्च-रिज़ॉल्यूशन उपग्रह इमेजरी और ग्राम-स्तरीय आंकड़ों का विश्लेषण किया गया और सर्दियों में उगने वाली फसल के क्षेत्रफल पर ध्यान केंद्रित किया गया। लगभग सभी भारतीय किसान मौसमी बारिश का लाभ उठाने के लिए मानसून के दौरान फसल लगाते हैं, सर्दियों में की जाने वाली खेती मुख्य रूप से भूजल से की जाने वाली सिंचाई पर निर्भर है जोकि वार्षिक खाद्यान्न का 44 फीसदी है।

यू-एम स्कूल फॉर एनवायरमेंट एंड सस्टेनेबिलिटी के एक सहायक प्रोफेसर जैन ने कहा इन निष्कर्षों से पता चलता है कि नहरों के विस्तार के अलावा अन्य अनुकूलन रणनीतियां अपनाना भी आवश्यक है जिससे भूजल के नुकसान को रोका जा सके। संभावनाओं में सर्दियों के चावल को हटाकर कम पानी वाले अनाज की ओर जाना, स्प्रिंकलर को अपनाना और खेतों में पानी के संरक्षण के लिए ड्रिप इरिगेशन और सिंचाई नहरों की दक्षता बढ़ाने के लिए नीतियां इसमें शामिल हैं। भूजल की कमी खाद्य सुरक्षा के लिए एक वैश्विक खतरा बन रही है, वर्तमान और अनुमानित भूजल की कमी को अच्छी तरह से दस्तावेजीकरण किया गया है, खाद्य उत्पादन पर काफी बुरे प्रभाव पड़ने के आसार हैं।

अध्ययन के अनुसार सबसे खराब स्थिति में सर्दियों की फसल वाले क्षेत्र में 20 फीसदी तक और सबसे गंभीर रूप से प्रभावित क्षेत्रों में 68 फीसदी तक की कमी हो सकती है, यह स्थिति तब आएगी जब किसानों को भूजल के उपयोग करने से रोक दिया जाता है और यदि सिंचाई के पानी को दूसरे स्रोत से नहीं बदला जाता है। अध्ययन के अनुसार, उत्तर पश्चिम और मध्य भारत में सबसे अधिक नुकसान होने के आसार हैं। शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि मौजूदा सिंचाई नहरों की दूरी ने भी सर्दियों की फसल बुवाई क्षेत्र को कम किया है। भविष्य में, नहरों पर अधिक निर्भरता सिंचाई के उपयोग से संबंधित असमानताओं को बढ़ा सकती है।

इसके अलावा, सिंचाई की नहरों इनको पानी देने वाली झीलें और नदियां गहरे भूजल कुओं के विपरीत, वर्षा में होने वाले बदलाव के कारण यह बढ़ती और कम होते रहती हैं। इसलिए भविष्य में नहर से सिंचाई पर अधिक निर्भरता से साल-दर-साल वर्षा में उतार-चढ़ाव के साथ-साथ मानवजनित जलवायु परिवर्तन के कारण लंबे समय तक इसमें बदलाव होने के आसार हैं। (डाउन टू अर्थ)

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