राजनीति में ‘सपेरों’ के दिन फिर लौट रहे हैं!

तरकश |

कोलकाता के ब्रिगेड परेड ग्राउंड में प्रधानमंत्री की चुनावी रैली में फिल्म अभिनेता मिथुन चक्रवर्ती का कोबरे वाला संवाद इन दिनों चर्चा में है। उन्होंने बंगाली में अपनी फिल्म का एक संवाद बोला है जिसका अर्थ है कि मुझे एक हानिरहित सांप समझने की गलती न करें, मैं एक कोबरा हूं लोगों को एक बार में डंसकर मार भी सकता हूं।

– राजीव खण्डेलवाल, वरिष्ठ कर सलाहकार

भारत संस्कृतियों का देश है। एक समय देश के विभिन्न भागों में खासकर ग्रामीण अंचलों में शेरों (सर्कसों में),बंदरों, सांपों, तोता, कबूतर, पक्षियों, सांडों, बैलों इत्यादि का सार्वजनिक प्रदर्शन कर जनता का मनोरंजन कर उनसे लगे लोग अपनी रोजी-रोटी कमाते रहे हैं। वन जीव अत्याचार अधिनियम आने के बाद इन सब के सार्वजनिक प्रदर्शन पर लगभग रोक लग जाने से इनसे जुड़े लोग बेरोजगार हो गए हैं। लेकिन कहते हैं ना कि ‘‘राजनीति जो ना कराए वह थोड़ा है।’’ और आज की राजनीति में खासकर चुनावी राजनीति में आदर्श चुनाव आचार संहिता लागू होने के बावजूद,‘‘सब कुछ जायज‘‘ है। इसलिए कि आज अधिकतर गैर जायज लोग ही राजनीति चला रहे हैं।

राजनीति में अब कोबरा की आवश्यकता महसूस होने लगी है। इससे एक फायदा यह होगा कि ‘सपेरे’ को भी रोजगार मिल जायेगा क्योंकि बिना सपेरों के ‘‘नागों’’ को सार्वजनिक प्रदर्शन अलक्षित लक्ष्य को भी नुकसान पहुंचा सकता है। इसलिये अब प्रत्येक चुनाव की घोषणा होते ही सपेरों की मांग के विज्ञापन भी निकाले जा सकते हैं।

बात कोलकाता के ब्रिगेड परेड ग्राउंड में प्रधानमंत्री की चुनावी रैली के मंच पर उपस्थित फिल्म ‘‘मृगया’’ के लिये राष्ट्रीय पुरूस्कार प्राप्त पूर्व टीएमसी (तृणमूल) सांसद प्रसिद्ध फिल्मी कलाकार मिथुन चक्रवर्ती के कथन की है। उन्होंने बंगाली में एक अपनी फिल्म का एक संवाद बोला है जिसका अर्थ है ‘‘मुझे एक हानिररहित सांप समझने की गलती न करें, मैं एक कोबरा हूं लोगों को एक बार में डंसकर मार भी सकता हूं। पानी के सांप नहीं हैं, बल्कि कोबरा हूं ‘‘डसूंगा तो तुम फोटो बन जाओगे।’’ भाजपा के किसी भी प्रवक्ता द्वारा उक्त बयान से अपने से अलग करने का कोई बयान फिलहाल अभी तक नहीं आया है। मिथुन चक्रवर्ती ने भी अपने उक्त कथन के अवसर की नाजुकता को देखते हुये खेद प्रकट नहीं किया है। इससे यह बात स्पष्ट हो जाती है कि आज की राजनीति क्या इतनी ‘‘जहरीली‘‘ हो गई है कि उसके जहर की काट के लिए के लिए एक ‘‘जहरीले नाग‘‘ की आवश्यकता हो गई है? क्योंकि कहा यही जाता है कि एक ‘‘जहर‘‘ ही दूसरे ‘‘जहर‘‘ को काट सकता है। जब एक ‘‘जहरीला नाग‘‘ राजनीति में अपने विपक्ष के जहर को समाप्त कर ‘‘निष्प्रभावी‘‘ बनाएगा तो उस जहरीले नाग को चलाने वाला ‘‘सपेरा‘‘ का व्यक्तित्व कैसा होना चाहिए, इसकी कल्पना आप स्वयं कर सकते हैं। फिर जब यह कोबरा तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के साथ थे और उनके कोटे से राज्यसभा में गए थे, तब उनकी ‘‘मारण शक्ति‘‘ का प्रभाव विपक्षियों पर क्यों नहीं दिखाई दिया? तब तो संसद में लगातार अनुपस्थिति के कारण उन्हें सांसद की सदस्यता से इस्तीफा तक देना पड़ गया। अभी तक तो भाजपा को राजनीति में ऐसा ‘‘पारस पत्थर‘‘ माना जाता रहा कि उनके संपर्क में आने पर ‘‘पीतल‘‘ भी ‘‘सोना‘‘ बन जाता है। परंतु अब तो ‘‘संपर्क‘‘ से ‘‘अमृत‘‘ भी ‘‘जहर‘‘ में बदल जाएगा।

खैर राजनीति में अब कोबरा की आवश्यकता महसूस होने लगी है। इससे एक फायदा यह होगा कि ‘सपेरे’ को भी रोजगार मिल जायेगा क्योंकि बिना सपेरों के ‘‘नागों’’ को सार्वजनिक प्रदर्शन अलक्षित लक्ष्य को भी नुकसान पहुंचा सकता है। इसलिये अब देश के लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए प्रत्येक चुनाव की घोषणा होते ही सपेरों की जो मांग के विज्ञापन निकालने और बहुत से बेरोजगार के कुछ समय के लिये ही सही रोजगार अवश्य मिल जायेगा।

एक टीवी इंटरव्यू में उन्होंने पूरे पश्चिम बंगाल की जनता को ही कोबरा कहा है शायद उनको एहसास हो गया है कि एक कोबरा पूरी (टीएमसी) तृणमूल कांग्रेस को नहीं डंस सकती है, उन्हें कई कोबरा की आवश्यकता होगी और आगे उन्होंने यह कहा कि मैं कॉम्प्रोमाइज पॉलिटिक्स नहीं करता हूं चौथी बार दल बदल कर भाजपा में शामिल होकर कॉम्प्रोमाइज पॉलिटिक्स कि वे कौन से सिद्धांत वाली राजनीति कर रहे हैं।

आगे वे कहते हैं कि बंगाली होने पर गर्व करता हूं ‘‘मारूंगा यहां पर लाश गिरेगी श्मशान में’’ तृणमूल कांग्रेस हिंसावादी राजनीति करते आ रही है जहां भाजपा के सैकड़ों कार्यकर्ता मारे गये हैं उसके जवाब में शायद मिथुन ‘दा’ भी मरने मारने व डंसने की बात कह रहे हैं भले ही वे फिल्मी डॉयलाग उनके कहे गये समय कि प्रसिद्ध फिल्म को दिखाने व देखने आवश्यकता है। राजनीति में आखिर यह गिरावट कहां जाकर रुकेगी, इस पर आज शायद कोई बुद्धिजीवी वर्ग सोचने को तैयार भी नहीं है?

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