संविधान के अनुसार जनता को अधिकार मिले तो ही प्रजातंत्र

नजरिया |

प्रजातंत्र का मूल उद्देश्य जनता है और प्रजातंत्र में वही राज करती है। यह राज वह अपने द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों के माध्यम से करती है। प्रजातंत्र पटरी से न उतर जाए इसलिए पंचायत से लेकर केन्द्र सरकार तक सामूहिक रूप से सलाह करके निर्णय लेने के प्रावधान संविधान में हैं।

– आनंद मोहन माथुर, प्रसिद्ध समाजसेवी

बात कोई 50 वर्ष पुरानी है जब भारत के शिक्षा मंत्री डॉ. अब्दुल कलाम आजाद एक दिन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के निवास पर गए, तो देखा दरवाजे के पास नेहरू का निजी नौकर नत्थू मोजे रफू कर रहा था। उन्होंने पूछा नत्थू ये किसके मोजे हैं? तो उसने जवाब दिया नेहरू जी के। आजाद बोले क्या प्रधानमंत्री के पास नए मोजे खरीदने के पैसे नहीं हैं। इसी बीच नेहरू आ गए तो आजाद ने उनसे कहा मियां आपके पास नये मोजे खरीदने के पैसे भी नहीं हैं क्या? नेहरू ने जवाब दिया कि अभी तो ये मोजे कुछ दिन चल सकते हैं, बिना वजह फिजूलखर्ची क्यों करना।

प्रजातंत्र में हर सरकारी पैसे का इस्तेमाल संभाल कर करना चाहिए। जब मुखिया ही फिजूलखर्च होगा तो सरकार का मंत्री और कर्मचारी क्यों फिजूलखर्ची नहीं करेगा। मोहनदास गांधी इसलिए महात्मा थे कि जब उन्हें लंदन में बकिंघम पैलेस में महारानी ने निमंत्रित किया और उनसे कहा गया कि वो धोती में नहीं जा सकते हैं तो उन्होंने निमंत्रण ठुकरा दिया और जब उन्हें उसी धोती में जाने की अनुमति दी तभी वे पैलेस के अंदर गए। महानता, विद्वता और ज्ञान का ताल्लुक कपड़ों से नहीं होता है बल्कि बल्कि आपके आम व्यवहार से होता है।

जार्ज बर्नार्ड शॉ विश्व के महानतम लेखकों में शुमार किए जाते हैं। एक समय की बात है कि उनके एक मित्र ने उनको फोन कर कहा कि आपको शाम को दावत में आना है। शाम को शॉ जैसे बैठे थे वैसे ही मित्र के घर चले गए। जब वो वहां पहुंचे तो मित्र ने कहा कि मैंने कई लाडर्स को खाने पर बुलाया है, अच्छा होता कि आप डिनर ड्रेस में आते, शॉ ने कहा रूकिए मैं अभी आया, दावत के समय पहुंच जाऊॅंगा, शॉ अपने घर गए और डिनर सूट पहनकर आ गए।

26 जनवरी 1950 को जनता ने भारत को प्रजातंत्र घोषित किया और सन् 1952 में पहला चुनाव हुआ। इस चुनाव में न धन का बल था और न बल का बल था। ये इसलिए हुआ कि गांधी के आदर्शों की आखिरी खेप हम लोगों के पास थी, दिल मैले नहीं थे, घृणा देखने को नहीं मिलती थी।

जब दावत शुरू हुई और लोगों ने खाना शुरू किया तो शॉ ने खाने के बर्तन में से एक चम्मच सब्जी ली और अपने कोट पर डाल ली, दूसरा चम्मच उठाया और दाल अपने वेसकोट पर डाल ली। उनके मित्र ने कहा शॉ ये क्या कर रहे हैं आप? तो शॉ ने जवाब दिया कि आपने मेरे कपड़ों को खाना खाने के लिए आमंत्रित किया था, मुझे नहीं, उनके मित्र शर्मा गए। इस छोटी कहानी का सार ये है कि व्यक्ति और उसकी महानता कपड़ों से नहीं पहचानी जाती बल्कि उसके व्यक्तित्व से पहचानी जाती है।

ये सब प्रजातंत्र के अस्तित्व के लिए बहुत जरूरी है। अगर शासक जवाहरलाल नेहरू, औरंगजेब और जार्ज बर्नार्ड शॉ की तरह होते तो कभी भी इस देश में नोटबंदी नहीं होती।

सन् 1215 ई. में किंग जॉन इंग्लैंड के राजा थे, उनका और वहां के जो छोटे-मोटे राजा रजवाड़े थे, उनके बीच में एक करार हुआ, जिसे मेगनाकार्टा कहते हैं। इन राजे रजवाड़ों ने किंग ऊॅंची दरों पर कर लगाने और वसूली के अन्यायपूर्ण तरीकों से दुखी होकर किंग जॉन के खिलाफ विद्रोह किया और बदले में मेगनाकार्टा हासिल किया।

मेगनाकार्टा क्यों महत्वपूर्ण है- इसने सारे आजाद लोगो को इंसाफ का हक दिया और उस हक को प्राप्त करने के लिए एक निष्पक्ष मुकदमा आवश्यक था और आखिरी में जो शब्द है वह है:- ‘‘अधिकार और न्याय हम किसी को नहीं बेचेंगे, ना हम किसी को अधिकार और न्याय से इंकार करेंगे और ना उसमें कोई देरी करेंगे।’’

यह प्रजातंत्र की नींव थी जो बारहवीं शताब्दी से इक्कीसवीं शताब्दी तक इंग्लैंड में चली आ रही है। आजादी राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक प्रजातंत्र की नींव है। प्रजातंत्र को आम लोग इस तरह से परिभाषित करते हैं- जनता की सरकार जनता के द्वारा और जनता के लिए।

ये परिभाषा केवल संविधान या किताबों में लिखने के लिए नहीं है बल्कि किस तरह से देश के हुक्मरानों द्वारा अमल में लाई जाती है। अगर ये सिर्फ कागजों का पुलिन्दा है तो इस देश की व्यवस्था को प्रजातांत्रिक कहना एक हिमालयी भूल है, अपने आपको समझाने का एक जरिया है।

प्रजातंत्र जनता की सरकार होती है और उसका तरीका होता है कि वो चुने हुए प्रतिनिधियों के द्वारा चलाई जाती है, तो फिर चुनाव ही प्रजातंत्र का आधार है। इस देश के संविधान में वोटर से शुरूआत की गई है जो 18 वर्ष से ज्यादा की उम्र का होता है। उसको ऐसे लोग चुनना पड़ते हैं जो कि सरकार में परिपक्व, ईमानदार, सेवाभावी प्रतिनिधियों द्वारा बनाई जाती है और देश के हर नागरिक को शांति, सुख-सुरक्षा और माहौल जीने के लिए दे, बिना किसी भेदभाव के सरकारें प्रत्येक नागरिक को भाई-भाई समझकर सर्वकल्याण के लिए काम करें।

26 जनवरी 1950 को भारत की जनता ने भारत को प्रजातंत्र घोषित किया और सन् 1952 में पहला चुनाव हुआ। सन् 1947 के बंटवारे की त्रासदी दुनिया के बहुत कम लोगों ने देखी होगी, जब हिन्दू और मुस्लिम, पुरूष, महिलाएं, बूढ़े और बच्चे कत्लेआम से गुजर रहे थे और कत्लेआम मचा हुआ था। इस वातावरण में संविधान घोषित हुआ और सन् 1952 में पहला चुनाव हुए।

इतनी बड़ी त्रासदी झेलने के बाद भी इस देश में शांतिपूर्वक बिना धार्मिक नारों, बिना मजहबी भाषणों, बिना कोई अवैध हथकण्डे अपनाए कुछ सौ रूपये में चुनाव लड़े गए थे। इस चुनाव में न धन का बल था और न बल का बल था। ये इसलिए हुआ कि गांधी के आदर्शों की आखिरी खेप हम लोगों के पास थी, दिल मैले नहीं थे, घृणा देखने को नहीं मिलती थी। तभी ये संभव था कि कांग्रेस के अजीत प्रसाद जो यूपी के रहने वाले थे आंध्रप्रदेश से चुनाव जीत गए। आंध्रप्रदेश में किसी ने अजीत प्रसाद को नहीं पूछा कि आपके देवी देवता कौन है, आपका धर्म कौन है, आपकी मातृभाषा कौन है, आपकी जाति कौन है।

चुनाव में जो उम्मीदवार खड़े होते हैं वह उनसे अपेक्षा भ्रष्टाचार से मुक्त, सदाचारी, हर देशवासी को अपना भाई समझने वाले और जिनका उद्देश्य पूरे भारत के लोगों की सेवा करना है। इसमें न परिवार, न जाति, न भाषा, न धर्म कोई भी आड़े नहीं आता है। चुनाव उसूलों का खेल है।

1857 से 1942 तक आजादी की लड़ाई चली जब द्वितीय महायुद्ध 1945 में खत्म हुआ और अंग्रेज इस देश को गुलाम न रख सके तो उन्होंने भारत को आजादी दे दी। शुरू के 20 सालों में इस देश का निर्माण हुआ और फिर उसके बाद धीरे-धीरे करके भारतीय लालच और भ्रष्टाचार में फंस गए। चुनाव के लिए चुनाव आयोग बनाया गया और लोक प्रतिनिधित्व कानून बनाया गया, लेकिन हम तो बड़े चालक लोग हैं। हम उन सबको पी गए।

पहली शुरूआत हमने ये की, चुनाव में धन डाल दिया और लाखों रुपए चुनाव में खर्च होने लगे। सांसद के लिए 5 करोड़ खर्च होने लगे, विधानसभा के लिए 1 करोड़ खर्च होने लगे। उसके बाद हमने बलशाली भ्रष्ट लोगों को प्रवेश दिया। गुण्डे, वसूली करने वाले जो लोग धनी व्यक्ति थे, चुनाव में उनकी आवश्यकता पड़ने लगी और फिर आखिरी में जाकर। जय श्री राम, अल्लाह हू अकबर, जय माता दी, धर्म के जितने भी रूप हो सकते हैं और जातियों के भी सबको हमने चुनाव में उच्च स्थान दे दिया। अगर क्षेत्र में मुसलमानों का बहुमत है, अगर बनिए का है तो बनिए को टिकट, ब्राह्मण का है तो ब्राह्मण को टिकट, जैन हुआ तो जैन को टिकट। बरहाल प्रत्येक भारतीय ने अपना दिमाग बंद कर दिया और हिन्दू, मुस्लिम, बनिया, ब्राह्मण, ईसाई, सिख यही उम्मीदवार की गुणवत्ता और विशेषता थी। इस देश का एक मजाक है कि बहुत बड़े साहित्यकार वृंदावनलाल वर्मा चुनाव हार गए, मीना कुमार चुनाव हार गई। योग्यता, गुणवत्ता, मिट्टी में मिल गई। सब राजनैतिक पार्टियों ने मिलकर वोटर की जगह एक हिन्दू, मुसलमान, अग्रवाल, शर्मा, रामभक्त, कृष्णभक्त खड़े कर दिए।

सरकारें आती हैं और जाती हैं लेकिन वह कभी देश का ताना बाना नहीं उखेड़ती हैं, परस्पर विश्वास को नहीं तोड़ती हैं। इस देश के संविधान के जो मूल तत्व है, उसमें एक है सेक्युलरिज्म (पंथनिरपेक्षता) इसलिए चुनाव के कानून में ये प्रावधान किया गया कि चुनाव के फार्म के साथ ये शपथपत्र देना होगा कि उम्मीदवार पंथनिरपेक्षता में पूरा भरोसा करता है।

हिन्दुस्तान में अफसरों की रीढ़ की हड्डी झुकी हुई है, अच्छे पोस्टिंग के लिए, मलाईदार जगह के लिए, सुविधाजनक स्थान के लिए मिले तो वो सिर के बल खड़ा हो सकता है, देशवासियों की कोई परवाह नहीं।

राजनैतिक हुक्मरानों की इच्छा पूरा करना यह जमात अपना कर्तव्य समझती है। कानून व्यवस्था भी शासकीय पार्टी की इच्छाओं पर चलती है और कभी कभी न्याय व्यवस्था भी ऐसा करने लगती है। देश के सारे विश्वविद्यालयों के कुलपति बदल दिए जाते हैं। सारे शिक्षा संस्थानों में शासक पार्टी के लोग भर दिए जाते हैं। अतः शासकीय मत रखने वाले उच्च वर्ग और असहमति रखने वाले निम्न वर्ग समझे जाने लगे। यह विचार प्रजातंत्र विरोधी है।

प्रजातंत्र का मूल देश की जनता है और प्रजातंत्र में वही राज करती है और यह राज चुने हुए प्रतिनिधियों द्वारा करती है। प्रजातंत्र पटरी से न उतर जाए इसलिए पंचायत से लेकर केन्द्र सरकार तक सामूहिक रूप से सलाह करके निर्णय लिए के प्रावधान संविधान में है।

प्रजातंत्र का मूल है – लिखने, पढ़ने, अखबार निकालने या अन्य माध्यमों से अपने विचार प्रकट करने, बेखौफ अपना मत रखना है, लेकिन जब प्रधानमंत्री पर हमले के बहाने या उनकी हत्या करने के बहाने लोगों को महीनों तक जेल में डाल दिया जाये तो क्या ये प्रजातंत्र है? विश्वविद्यालयों के प्रोफेसर, वैज्ञानिक, समाजसेवी, इन पर अगर हत्या और दंगों के मामले चलाये जायें और बरसों तक चलते रहें तो क्या ये प्रजातंत्र है? प्रजातंत्र का मुखिया, जनता की बात सुने, उससे मिले यह उसका दायित्व है। प्रजातंत्र में हर नागरिक का अधिकार है कि वो देश के मुखिया से मिल सके लेकिन ऐसा हो नहीं पाता।

अगर इस देश से भ्रष्टाचार न हो, ईमानदारी हो, धर्म जाति व्यवहार में न लाई जाए, चुनाव धर्म जाति पर न हों बल्कि मुद्दों पर हों। देश में प्रेम सद्भाव, शांति रहे तभी हमारी 1857 से लेकर 1942 तक की लड़ाई सार्थक होगी।

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