कोरोना से पहले ही डरे दर्शक क्यूँ डरें ‘रूही’ से

बातें फिल्मों की |

सिनेमाघरों के सन्नाटे को तोड़ने के लिए महाशिवरात्रि के दिन रिलीज़ हुई दिनेश विजान की रूही से उम्मीद बंधी थी। मगर निर्माता निर्देशक पर स्त्री की सफलता को दुबारा भुनाने का भूत इस कदर सवार था कि कोरोना से डरे लोगों को उनकी यह हॉरर कॉमेडी डराने में नाकाम रही।

– विनोद नागर (फिल्म समीक्षक व स्तंभकार)

कोरोना काल में करीब साल भर से पसरे सिनेमाघरों के सन्नाटे को तोड़ने के लिए महाशिवरात्रि के दिन रिलीज़ हुई दिनेश विजान की रूही से उम्मीद बंधी थी। मगर निर्माता निर्देशक पर स्त्री की सफलता को दुबारा भुनाने का भूत इस कदर सवार था कि कोरोना से डरे लोगों को उनकी यह हॉरर कॉमेडी डराने में नाकाम रही। अलबता देशभर में एक साथ ढेर सारे सिनेमाघरों में रिलीज़ होने का साहस सितारों से जड़ी इस फिल्म ने अवश्य दिखाया है। अगर फिल्म में दम होता तो देर सबेर रूही सिनेमाघरों की बिछड़ी रौनक लौटाने में मददगार साबित हो सकती थी।

यह फिल्म रूही-अफ्ज़ा के नाम से बनना शुरू हुई थी, जिसका टाइटल बाद में बदलकर रूही कर दिया गया। वर्षों पहले मनमोहन देसाई की एक फिल्म में अमिताभ बच्चन का ‘मर्द को दर्द नहीं होता’ जैसा डायलॉग बड़ा मशहूर हुआ था। सालों बाद दिनेश विजान ने अपनी बहुचर्चित फिल्म स्त्री में ‘मर्द को दर्द होगा’ जैसी पंच लाइन दी। इस बार वे एक कदम और आगे बढ़े यह सोचकर कि स्त्री की तुलना में रूही से मर्द को और ज्यादा दर्द होगा, लेकिन हुआ बिलकुल इसका उल्टा। बल्कि दर्शक खीझते हुए बाहर निकले।

फिल्मों पर कोरोना संक्रमण काल में लगे ग्रहण का खग्रास अभी दूर नहीं हुआ है। इस बीच ओटीटी प्लेटफार्म से लेकर सिनेमाघरों के खुलने तक छोटे बजट की कई फिल्मों की रिलीज़ की कुर्बानी दी जा चुकी है।

फिल्म के निर्देशक हार्दिक मेहता रूही में अमर कौशिक का स्त्री वाला डर रचने में विफल रहे हैं। फिल्म की कहानी रूही और उसकी आत्मा अफ्ज़ा नामक डरावने किरदारों के बीच फंसे दो दोस्तों भंवरा पाण्डेय और कट्टानी कुरैशी के इर्द गिर्द घूमती है। फिल्म की ज्यादातर शूटिंग आगरा में की गई है। लेकिन आजकल फिल्मों में सितारों एवं लोकेशंस से ज्यादा महत्त्व कहानी, कंटेंट और ट्रीटमेंट का होने लगा है। ऐसे में गीत संगीत सहित फिल्म के अन्य तकनीकी पक्ष गौण होने लगे हैं। जबकि समग्र योगदान में उनकी अहमियत अपनी जगह कायम है। कथा, पटकथा, संवाद सहित रूही के गीत संगीत में भी कोई दम नहीं है।

फिल्म में राजकुमार राव का मूंछों वाला गेटअप अपील नहीं करता। हालांकि भंवरा के चरित्र को स्वाभाविक ढंग से उभारने में उन्होंने काफी मेहनत की है। पर संभावनाओं से भरे इस कलाकार की प्रतिभा का दोहन न्यूटन और शादी में जरुर आना के बाद कहाँ हो पाया है..? रमेश सिप्पी की शिमला मिर्च, अनुराग बासु की लूडो और हंसल मेहता की छलांग में भी वे अभिनय की ऊँची छलांग नहीं लगा पाये। यही हाल वरुण शर्मा का भी रहा है। लगातार हास्य भूमिकाएँ करते हुए वे टाइप्ड हो चले हैं। आने वाले वर्षों में दर्शक शायद ही उन्हें बदली हुई भूमिकाओं में देख पायें।

रूही में जाह्नवी कपूर ने परोक्ष रूप से श्रद्धा कपूर से मुकाबले का प्रयास किया है, पर रूही और आफ्ज़ा के दोहरे किरदारों में वे ज्यादा असर नहीं छोड़तीं। पहली फिल्म धड़क से जो उम्मीदें जगी थीं, वे रूही तक आते आते दम तोड़ने लगी हैं। करण जौहर, अनुराग कश्यप, दिबाकर बनर्जी और जोया अख्तर जैसे चार-चार नामचीन निर्देशकों वाली घोस्ट स्टोरीज तथा कारगिल गर्ल गुंजन सक्सेना की बायोपिक से उनके कैरियर में कोई उठाव नहीं आया है। फिल्मों और किरदारों के चयन में जरा सी असावधानी उन्हें ट्विंकल खन्ना और ईशा देओल की कतार में पहुंचा देगी।

कुल मिलाकर फिल्मों पर कोरोना संक्रमण काल में लगे ग्रहण का खग्रास अभी दूर नहीं हुआ है। इस बीच ओटीटी प्लेटफार्म से लेकर सिनेमाघरों के खुलने तक छोटे बजट की कई फिल्मों की रिलीज़ की कुर्बानी दी जा चुकी है। मगर बॉक्स ऑफिस के गुलज़ार होने का इंतजार बरकरार है। लगता है कोई बड़े बजट और बड़े सितारों की फिल्म ही बॉलीवुड को इन विषम परिस्थितियों से उबार पाएगी। आने वाला समय ही बताएगा कि इस मुश्किल दौर में यह चुनौती स्वीकारने वाला असली सूरमा कौन होगा..?

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