यह सिर्फ 90 सैनिकों का अभ्यास नहीं !

– डॉ. प्रभात ओझा

हमारे देश के सीमावर्ती राज्य उत्तराखंड के रानीखेत में एक छोटी-सी गतिविधि पड़ोसी चीन के लिए चिंता का सबब हो सकती है। इस जिले के चौबटिया क्षेत्र में इसे छोटी गतिविधि इसलिए कहा जाना चाहिए कि वहां भारत और उज्बेकिस्तान की सेनाएं नियमित सैन्य अभ्यास कर रही हैं। दोनों ओर से सिर्फ 45-45 सैनिकों की हिस्सेदारी से पहली नजर में अभ्यास को सामान्य ही कहा जा सकता है। इसके विपरीत इसपर चीन की नजर इस ऐतिहासिक तथ्य के कारण हो सकती है कि अभ्यास में भारत की ओर से वह कुमांऊ रेजीमेंट हिस्सा ले रही है, जिसने विपरीत परिस्थितियों के बावजूद 1962 की लड़ाई में चीन के सैनिकों को दिन में तारे दिखा दिए थे।

पिछली 10 तारीख को शुरू और 19 मार्च तक चलने वाला अभ्यास आतंकवाद के खिलाफ साझा लड़ाई के गुर सीखने के लिए है। हाल के दिनों में म्यांमार के अंदर राजनीतिक अस्थिरता उत्पन्न होने के बाद से इस अभ्यास का महत्व और अधिक बढ़ जाता है। म्यांमार ऐसा देश है, जो भारत और चीन के बीच स्थित है और एक समझौते के तहत हमारी सेनाएं आतंकियों के खिलाफ एक खास दूरी तक जाकर म्यांमार में भी कार्रवाई कर सकती हैं। गत एक फरवरी को वहां तख्ता पलट के बाद हिंसा में म्यांमार में लोगों का आरोप है कि सेना, चीन के अधिकारियों के इशारे पर चल रही है। बहरहाल, म्यांमार में भारत के मुकाबले अपना हित बढ़ाने की चिंता करने वाले चीन के लिए भारत और उज्बेकिस्तान का संयुक्त सैन्य अभ्यास खटकने वाला मसला है।

सैन्य अभ्यास का नाम दुस्तलिक अथवा डस्टलिक रखा गया है। उज्बेकी भाषा में इसका अर्थ ‘दोस्ती’ है। यह दोस्ती भला चीन को क्यों सुहाएगी। भारत मध्य एशिया में चीन के बढ़ते असर को रोकना चाहता है और इस काम में उज्बेकिस्तान से दोस्ती बहुत काम की है। खासकर पूर्वी लद्दाख में चीन के साथ हाल के तनाव के ठीक बाद दोनों देशों के सैन्य अभ्यास पर चीन नजर लगाए बैठा है। सैन्य अभ्यास के दौरान दोनों देशों की सेनाओं का अमेरिका से हाल ही में मिली सिग सोर राइफल का इस्तेमाल भी खास है। यह चीन के मुकाबले मध्य एशिया में अमेरिकी सहयोग का प्रतीक है। निश्चित ही इस अभ्यास से भारत और उज्बेकिस्तान के रिश्ते और अधिक मजबूत होंगे।

उज्बेकिस्तान एशिया के केंद्र भाग में स्थित है। सोवियत संघ के विघटन के बाद अस्तित्व में आए इस देश से भारत के सम्बंध पहले से मजबूत हुए हैं। मध्य एशिया के अन्य देशों की तरह पुराने सोवियत संघ के इस हिस्से से भारत के सांस्कृतिक सम्बंध अत्यंत प्राचीन होने के प्रमाण मिलते ही हैं। अब वाणिज्यिक और रणनीतिक समझौते भी किए गए हैं। अभी 2019 में भारत के रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने उज्बेकिस्तान की यात्रा की थी, तो वहां के आंतरिक मामलों के मंत्री पुलत बोबोनोव ने भी भारत का दौरा किया था। राजनाथ सिंह की यात्रा के दौरान दोनों देशों ने सैन्य अभ्यास की शुरुआत की तो सैन्य चिकित्सा और सैन्य शिक्षा में सहयोग बढ़ाने के समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर भी किए। भारत ने उज्बेकिस्तान को संसाधनों की खरीद के लिए 40 मिलियन अमेरिकी डॉलर वाले रियायती ऋण देने की घोषणा की थी।

इसी तरह उज्बेकी मंत्री की नयी दिल्ली यात्रा के दौरान आतंकवाद-रोधी, संगठित अपराध और मानव तस्करी के विरुद्ध सहयोग बढ़ाने पर समझौते हुए। दोनों देशों के प्रतिनिधियों ने तब सीमा सुरक्षा और आपदा प्रबंधन पर भी विचार किया था। उसी समय भारत ने अपने संस्थानों में उज्बेक सुरक्षाकर्मियों के प्रशिक्षण पर भी हामी भरी। तब से दोनों देशों के बीच सैन्य और रणनीतिक रिश्ते आगे ही बढ़े हैं।

फिर उज्बेकिस्तान ने अपने प्राकृतिक संसाधन, विशेष रूप से तेल, प्राकृतिक गैस, यूरेनियम आदि के मामलों में भारत के लिए अपने द्वार खोलने के सकारात्मक संदेश दिए थे। ऐसे में भारत से दुश्मनी की हद तक जाने को आतुर चीन के दिल में भारत-उज्बेकिस्तान का मजबूत होता रिश्ता किसी भी तरह से अनुकूल नहीं होगा। यही कारण है कि दोनों देशों के मात्र 45-45 सैनिकों के संयुक्त अभ्यास को भी चीन में बड़ा मसला माना जा रहा है।

(लेखक, हिन्दुस्थान समाचार की पाक्षिक पत्रिका ‘यथावत’ के समन्वय सम्पादक हैं।)

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