आखिर किस तरह के लोकतंत्र में जीना चाहते हैं राहुल गांधी?

सियासत |

राहुल गांधी ने हाल ही में कहा है कि देश में लोकतंत्र कहां है? यदि राहुल गांधी का मतलब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से है, व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की समाप्ति से है तो, उन्हें लोकतंत्र, अभिव्यक्ति व व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच अंतर करना सीखना होगा।

– राजीव खण्डेलवाल, वरिष्ठ कर सलाहकार

वैसे तो राहुल गांधी के बयानों ने अपनी सत्यता, विश्वसनीयता, तार्किता, बुद्धिमतता, स्वीकारिता व प्रासिंगकता की लय लगभग पूरी तरह से खोकर नाटकीयता, भ्रामकता व माखौल उड़ाने का एक “अस्त्र“ बन चुकी है। इसलिये उनके ‘‘थोथा चना बाजे धना’’ वाला बयानों या ट्वीट्स पर कोई टिप्पणी करना या लेख लिखना महत्वपूर्ण समय की सिर्फ बर्बादी ही है। फिर भी चूंकि उन्होंने अबकी बार विश्व के ऐसे सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश अर्थात भारत वर्ष जिसके कि वे एक गणमान्य नागरिक है, स्वयं ने ही देश से लोकतंत्र को खत्म मान लिया है, तब उसका विश्लेषण कर उन्हे आईना दिखाना अत्यंत जरूरी हो गया है।

विश्व के देशों के लोकतंत्र को नापने वाली दो विदेशी एजेंसीयां अमेरिकी एनजीओ फ्रीडम हॉउस एवं स्वीडन की शोध संस्था वी-डेम (वेरायटीज ऑफ डेमोक्रेसी) की रिपोर्ट के आधार पर ट्वीट करते हुये राहुल गांधी ने कहा कि भारत “अब लोकतांत्रिक देश नहीं रहा“। यही नहीं काउंटर प्रश्न करते हुए पूछा कि भारत में लोकतंत्र है कहां? यह सिर्फ आपकी कल्पना में हो सकता है, वास्तव में लोकतंत्र नहीं है। जहां तक दोनों विदेशी संस्थाओं की प्रामाणिकता विश्वसनीयता व साख का प्रश्न है, इसके लिए एक उदाहरण ही काफी है कि वी-डेमोक्रेसी ने पाकिस्तान के साथ भारत को रखकर दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के दर्जे से हटाकर चुनावी लोकतंत्र की बजाए तानाशाही वाला देश बतलाया है। यहां तक कि बंगला देश की लोकतंत्र की स्थिति को भी भारत से बेहतर बताया है। इन विदेशी संस्थाओं के सलाहकार भी पाकिस्तानी व चाइनीज हैं।

राहुल गांधी के पास न तो ‘जन’ और न ही ‘तंत्र’ रह गया है। इसलिए बिना “जनतंत्र“ के “लोकतंत्र“ की कल्पना करना ही सभंव नहीं है। राहुल गांधी को समझना होगा, समझाना होगा, एहसास करना होगा, कि यदि भारत में लोकतंत्र नहीं है, तो क्या है? कोई भी देश बिना तंत्र के नहीं चल नहीं सकता है।

वी-डेमोक्रेसी ने वर्ष 2017 की रिपोर्ट में 1 में से 0.57 स्कोर भारत के लोकतंत्र के लिए दिया था जो वर्ष 2020 में यह घट कर 0.34 हो गया है। इसी प्रकार अमेरिकी एजेंसी फ्रीडम हॉउस ने नागरिक स्वतंत्रता के लिये 100 में से 67 अंक दिये हैं, जबकि वह अमेरिका को 100 में 84 अंक देता है। वह अमेरिका जहां पर हाल ही में हुए चुनाव के पूर्व कैपिटल हिल में हुई राजनैतिक हिंसा जिसकी पूरे विश्व में आलोचना हुई थी, के बावजूद 210 देशों में भारत को स्वतंत्र देश से आंशिक रूप से स्वतंत्र बताने वाला फीडम हॉउस अमेरिका को पूरी आजादी वाला देश बता रहा है। इससे इन संगठनों के विश्वसनीयता का आंकलन किया जा सकता है।

भारत में निश्चित रूप से जीवित व जीवट लोकतंत्र है। लेकिन जब हम स्वयं को लोकतंत्र का जनक कहलाना पसंद करते हैं, जैसा की प्रधानमंत्री ने स्वयं कहा है। तब विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक व लोकतंत्र का जनक देश होने के नाते हमारा यह कर्तव्य हो जाता है कि सिर्फ देश के भीतर ही नहीं लोकतंत्र को सुरक्षित रखा जाए, बल्कि विश्व में कहीं भी लोकतंत्र की हत्या होने पर हम वहां उसका पुरजोर तरीके से विरोध करें। परंतु भारत सरकार ने प्रतिक्रिया स्वरूप (चीन को छोड़कर) विश्व के प्रमुख देशों की तुलना में मात्र गहरी चिंता ही व्यक्त की।

राहुल गांधी को लोकतंत्र के मुद्दे पर ही यदि मोदी को घेरना ही था तो, पड़ोसी देश म्यांमार जो वर्ष 1930 तक भारत का ही हिस्सा था (पूर्व में इसे बर्मा या ब्रह्म देश कहा जाता था) में चुनी गई लोकतांत्रिक सरकार का सेना द्वारा तख्ता पलट कर एक साल के लिए आपातकाल घोषित किए जाने पर भारत की आई सधी हुई प्रतिक्रिया को देखते हुए राहुल गांधी मोदी को घेर सकते थे। राहुल गांधी को यदि लोकतंत्र से इतना ही प्यार है, तो उन्हें भारत सरकार से यह जरूर पूछना चाहिए था कि, भारत ने म्यांमार में लोकतंत्र समाप्ति पर स्वयं के स्तर पर और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर क्या प्रभावी कार्रवाई की? लेकिन वे तो अर्शफियां छोड़ कोयलों पर मुहर लगाने लगते हैं।

राहुल गांधी को इस बात के लिए धन्यवाद तो देना ही चाहिए कि उन्होंने संवाददाता के प्रश्न के उतर में कम से कम संवाददाता की ‘‘कल्पना’’ में ही लोकतंत्र के अस्तित्व को स्वीकारा तो। राहुल गांधी की कल्पना से तो लोकतंत्र इतना दूर भाग चुका है कि, वे इसकी कल्पना भी नहीं कर सकते हैं। इसका एक बहुत ही प्राकृतिक कारण यह है कि स्वाधीनता के बाद इस देश में सबसे गंभीर और घातक चोट लोकतंत्र को पहली और आखरी बार वर्ष 1975 में मनहूस आपातकाल लगाकर की गई थी, तब राहुल गांधी की दादी इंदिरा गांधी का ही शासन था। उनकी स्वयं की कांग्रेस पार्टी में इंदिरा गांधी से लेकर आज तक आंतरिक लोकतंत्र के कितने निशान हैं? शायद इसलिए भी राहुल गांधी लोकतंत्र के अस्तित्व को नहीं देख पा रहे हैं।

राहुल गांधी के पास न तो ‘जन’ और न ही ‘तंत्र’ रह गया है। इसलिए बिना “जनतंत्र“ के “लोकतंत्र“ की कल्पना करना ही सभंव नहीं है। राहुल गांधी को समझना होगा, समझाना होगा, एहसास करना होगा, कि यदि भारत में लोकतंत्र नहीं है, तो क्या है? कोई भी देश बिना तंत्र के नहीं चल नहीं सकता है। तो फिर देश में कौन सा तंत्र, एकतंत्र, राजतंत्र, निरकुंश, तानाशाही, सैनिक शासन या अन्य कोई नये तंत्र अथवा राहुल तंत्र तो नहीं है? क्योंकि यदि देश में लोकतंत्र नहीं रह गया है, दूर-दूर तक उसका अस्तित्व नहीं दिख रहा है तो, राहुल गांधी का बयान कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक, अमीर से गरीब तक, बुद्धिजीवियों से अनपढ़ तक, राइट से लेफ्ट तक, भाषाई जातिवाद व धार्मिक दीवारों को तोड़ता हुआ सबको सुनाई कैसे दे रहा है? क्या यह राहुल तंत्र का कमाल है? भारतीय लोकतंत्र के अस्तित्व का जीता जागता उदाहरण व सबूत राहुल गांधी के लिये इतना ही काफी है। क्योंकि साँच को आँच नहीं होती। राहुल गांधी से यह भी पूछा जाना चाहिए कि राष्ट्र के 75 साल के जीवन में यदि लोकतंत्र समाप्त हो गया है तो, देश में मात्र लगभग 18 वर्ष विभिन्न समयों में गैर कांग्रेसी सरकारें रही हैं। तब फिर क्या लोकतंत्र तभी अर्श से फर्श पर पहुंच गया, जब गैर कांग्रेसी सरकारें सत्ता व पुनः सत्ता पर रहीं।

राहुल गांधी का बयान ऐसे समय आया है, जब न केवल देश के पांच राज्यों में चुनाव हो रहे हैं, जो लोकतंत्र को जीवित व मजबूत रखने की प्रक्रिया का ही एक हिस्सा है, जिसमें कांग्रेस पाटी भी भाग ले रही है। बल्कि देश में आजादी की 75 वीं वर्षगांठ का ‘‘अमृत महोत्सव’’ भी शुरू हो गया है, जिसमें भी कांग्रेस पाटी शामिल है। यदि राहुल गांधी का मतलब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से है, व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की समाप्ति से है तो, उन्हें लोकतंत्र और अभिव्यक्ति व व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच अंतर करना सीखना होगा। उन्हें यह भी जानना होगा कि ‘‘बहुनषिण न श्रृद्धधाति लोक’’ अर्थात ‘अभिव्यक्ति’ का अधिक प्रयोग श्रद्धा को घटाना है। स्वस्थ, स्वतंत्र व विकसित लोकतंत्र का यह एक महत्वपूर्ण भाग जरूर है, लेकिन लोकतंत्र की पहचान सिर्फ इन्हीं अधिकारों से नहीं होती है। इस बात पर विवाद जरूर हो सकता है कि भारत में प्रेस की स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता व व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकारों पर कुछ कुठाराघात हुआ है अथवा नही। लेकिन इन सबको लोकतंत्र से जोड़कर यह कहना कि भारत अब लोकतांत्रिक देश नहीं रहा, राष्ट्र हित में है नहीं है।

भारत में लोकतंत्र जीवित ही नहीं है, बल्कि वह वृक्ष समान फलफूल भी रहा है। यद्यपि यह बात जरूर है कि इसमें और गुणवक्ता व सुधार किये जाने की आवश्यकता है। इसका सबसे बड़ा सबूत इस अलोकतांत्रिक व देश विरोधी बयान के बावजूद भारत सरकार द्वारा राहुल गांधी के विरूद्ध देशद्रोह का मुकदमा दर्ज नहीं किया गया। जो देशद्रोह के मुकदमें के दुरूपयोग के आरोप राहुल गांधी व कांग्रेस पार्टी भाजपा सरकार पर पिछले कुछ समय से लगातार लगाते चली आ रही है। यह कहना अब ज्यादा उचित है कि, भाजपा को अपने पूर्व बयान से पीछे हट जाना चाहिए, कि यह देश कांग्रेस विहीन हो जायेगा। क्योंकि भाजपा से इतर, एक कदम आगे जाकर राहुल गांधी ने शायद यही संकल्प बिना विकल्प के ले लिया है।

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