हिन्दू विरोध में दफन हो रहे वामदल

सियासत |

कम्युनिस्ट स्वीकार करें या नहीं करें, अपनी कमजोरियो को लेकर जनमानस की भावनाओं का खूब अनादर करें पर हर कोई यह जानता है कि कम्युनिस्ट पार्टियों की सांप्रदायिकता का अर्थ क्या है? वास्तव में कम्युनिस्ट पार्टियों की सांप्रदायिकता की समझ एकाकी है।

– विष्णुगुप्त, वरिष्ठ पत्रकार

नकारखाने में तूती की आवाज क्यों बन गयी कम्युनिस्ट पार्टियां? लगातार अपना जनाधार क्यों खो रही हैं कम्युनिस्ट पार्टियां? क्षेत्रीय पार्टियों की भी पिछलग्गू क्यों बन रही हैं कम्युनिस्ट पार्टियां? अब तो कम्युनिस्ट पार्टियां अपना वजूद भी खो रही हैं। रस्सी जल गयी पर ऐंठन गयी नहीं। इसी कहावत को कम्युनिस्ट पार्टियां सच कर रही हैं। इनका राष्ट्रद्रोह की करतूत कभी रूकती नहीं। एकाकी सांप्रदायिकता की इनकी सोच आत्मघाती है। कथित हिन्दू सांप्रदायिकता का विरोध करना, मुस्लिम सांप्रदायिकता को गले लगाना, कश्मीरी पंडितों के संहार पर चुप्पी साधना, आतंकवादियों का पक्षधर होना, भाजपा का अति विरोध करना पर जिहादी मुस्लिम पार्टियों, कांग्रेस और लालू, मुलायम जैसे जातिवादी लोगों को गले लगाने जैसे इनके दोहरे चरित्र हैं। आम जनता इन्हें अब स्वीकार करने के लिए तैयार भी होगी तो क्यों और कैसे? कम्युनिस्ट पार्टियों के क्षरण के पीछे कहानी यही है।

कथित हिन्दू सांप्रदायिकता का विरोध करना, मुस्लिम सांप्रदायिकता को गले लगाना, कश्मीरी पंडितों के संहार पर चुप्पी साधना, आतंकवादियों का पक्षधर होना, भाजपा का अति विरोध करना पर जिहादी मुस्लिम पार्टियों, कांग्रेस और लालू, मुलायम जैसे जातिवादी लोगों को गले लगाना वाम दलों के दोहरे चरित्र हैं। आम जनता इन्हें अब स्वीकार करने के लिए तैयार भी होगी तो क्यों और कैसे? कम्युनिस्ट पार्टियों के क्षरण के पीछे कहानी यही है।

इसका उदाहरण बिहार में भी देखने को मिला था, अब पश्चिम बंगाल में देखने को मिल रहा है, तमिलनाडु में देखने को मिल रहा है, केरल में देखने को मिल रहा है। कथित हिन्दू सांप्रदायिकता का विरोध करते-करते कम्युनिस्ट पार्टियां जिहादी मानसिकता से ग्रसित मुस्लिम राजनीतिक दलों से गठबंधन करने से भी परहेज नहीं कर रही हैं। केरल और पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्ट पार्टियों ने जिहादी मानसिकता से ग्रसित और सिर्फ मुस्लिम हित की बात करने वाली मुस्लिम पार्टियों की गोद में जा बैंठी है यानी कि उनसे गठबंधन करने में हिचकी नहीं।

पिछले बिहार चुनाव में कम्युनिस्ट पार्टियां अपनी वजूद की कीमत पर जातीवादी राजद यानी लालू प्रसाद यादव की गोद में जा बैठी थीं। कम्युनिस्ट पार्टियों को कथित सांप्रदायिकता के नाम पर लालू परिवार और कांग्रेस के साथ अपमानजनक समझौता करने के लिए मजबूर होना पड़ा था। बिहार विधान सभा के चुनाव में राजद और कांग्रेस ने सीधा फरमान दिया कि जो सीटें दी जा रही हैं उसे कम्युनिस्ट पार्टियां सीधे तौर पर स्वीकार कर लें, अन्यथा महागठबंधन से अलग होकर चुनाव लड़ें। राजद और कांग्रेस के गठबंधन में कम्युनिस्ट राष्ट्रीय पार्टियों को मात्र दस सीटें मिली थीं। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को छह सीटें मिली हैं जबकि मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी को मात्र चार सीटें मिली हैं।

ये दोनों कम्युनिस्ट पार्टियां कहने के लिए राष्ट्रीय पार्टी हैं पर इन्हें राजद और द्रमुक तथा जिहादी मुस्लिम मानसिकता से ग्रसित मुस्लिम पार्टियों जैसी क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टी के सामने झुकना पडता है और अपमानजनक समझौते के लिए उन्हें बाध्य होना पड़ता है। पांच राज्यों के विधान सभा चुनावों में भाजपा, कांग्रेस, द्रमुक और तृणमूल कांग्रेस के बीच कठिन मुकाबला है, संघर्ष तेज है। मीडिया में भाजपा और अन्य के बीच चुनावी मुकाबला विचार विमर्श के केन्द्र में है। मीडिया में कम्युनिस्ट पार्टियों की कोई खास चर्चा तक नहीं है। पश्चिम बंगाल में जहां एक समय कम्युनिस्ट पार्टियों की तूती बोलती थी, अपराजित राजनीतिक नियंत्रण होता था, तीस साल से अधिक समय तक सत्ता थी इनके पास, पर आज की स्थिति क्या है। आज की चुनावी स्थिति में पश्चिम बंगाल के अंदर कम्युनिस्ट पार्टियां गायब हैं। मुख्य मुकाबला भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के बीच में ही है।

इन प्रसंगों पर कम्युनिस्ट पार्टियों के पास रटा-रटाया जवाब है, लिखी हुई स्क्रिप्ट है जिसे वे बडी वीरता के साथ सुना देंगे? वे कहेंगे कि हम हिन्दू सांप्रदायिकता को रोकने के लिए वचनबद्ध हैं। हमारी ववनबद्धता के सामने अपना हित भी गंवाना स्वीकार है। हम सांप्रदायिक ताकतों को रोकने के लिए महागठबंधन के निर्णय को स्वीकार किये हैं। हमारे लिए कम सीट का प्रश्न नहीं है, हमारे सामने कम सीटों पर लड़ कर भी सांप्रदायिक ताकतों पर अंकुश लगाने का एक अवसर है? जब कम्युनिस्ट पार्टियां कथित सांप्रदायिकता की बात करती हैं तो फिर उसकी ध्वनि सिर्फ और सिर्फ हिन्दू सांप्रदायिकता की निकलती है। हिन्दू सांप्रदायिकता का विरोध करते-करते कम्युनिस्ट पार्टियां खुद ही कमजोर हो गयी, खुद ही लकवा ग्रस्त हो गयी, खुद ही बेदम हो गयी, खुद ही अविश्वसीय हो गयी, खुद ही हिन्दू शक्तियों के आक्रोश के शिकार हो गयीं, खुद ही अपने जनाधार खो दी हैं।

यह सच है कि तथाकथित हिन्दू सांप्रदायिकता के विरोध में कम्युनिस्ट पार्टियां खुद दफन हो गयी। अगर आप इस उदाहरण या तथ्य को अस्वीकार करते हैं तो फिर आपको त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल का उदाहरण और हश्र देखना होगा। त्रिपुरा कभी कम्युनिस्ट पार्टियों का अपराजयगढ़ था, त्रिपुरा पर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी लगभग तीस सालों तक शासन की थी। एक ही झटके में हिन्दुवादी शक्तियों ने त्रिपुरा में कम्युनिस्ट पार्टियों को दफन कर दिया। कुछ सालों पहले तक त्रिपुरा में कोई खास वजूद नहीं रखने वाली भाजपा सत्तासीन हो गयीं। त्रिपुरा से कम्युनिस्ट पार्टियों की सरकार से विदाई हो गयी। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने कम्युनिस्ट पार्टियों की कब्र खोदी। फिर सांप्रदायिकता के नाम पर कम्युनिस्ट पार्टियों ने ममता बनर्जी के खिलाफ कांग्रेस के साथ गठबंधन कर आत्मघाती मोर्चा बनाया था। ममता बनर्जी पुन सता में लौट गयी, कम्युनिस्ट पार्टियों का ममता बनर्जी को सत्ताहीन करने का सपना पूरा नहीं हो पाया। पर खुद कम्युनिस्ट पाटियां ने पश्चिम बंगाल में अपनी कब्र खोद ली। पिछले विधान सभा चुनाव में पश्चिम बंगाल में कांग्रेस दूसरे नबर में आ गयी पर कम्युनिस्ट पार्टियां तीसरे नंबर पर पहुंच गयी थी। पश्चिम बंगाल में पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा सत्ता के दावेदार के तौर पर मजबूत हुई तो फिर कम्युनिस्ट पार्टियां हाशिये पर चली गयी। पश्चिम बंगाल में आज की राजनीतिक समीकरण ममता बनर्जी बनाम भाजपा है। पश्चिम बंगाल मे कम्युनिस्ट पार्टियों ने फिर उस कांग्रेस से हाथ मिला लिया जिस कांग्रेस के खिलाफ पश्चिम बंगाल में वर्षों से लड़ी थी। पश्चिम बंगाल की जनता कम्युनिस्ट पार्टियों पर दया करने वाली नहीं है। पश्चिम बंगाल में भाजपा का परचम लहहलाने वाला है।

कथित हिन्दू सांप्रदायिकता का विरोध कम्युनिस्ट पार्टियों के लिए राजनीतिक शक्ति हासिल करने का माध्यम क्यों नहीं बन रहा है? कम्युनिस्ट पार्टियां की कथित हिन्दू सांप्रदायिकता के विरोध से जनाधार क्यों नहीं बन रहा है? अपने समर्थक वर्ग को एकजुट कर रखने में समर्थ क्यों नहीं हो रही हैं? इस महत्वपूर्ण प्रश्न पर कम्युनिस्ट पार्टियां जरूर बंद कमरे मे बहस कर रही होंगी पर जनमानस के सामने अभी तक इस कमजोरी पर कम्युनिस्ट पार्टियां खुलासा नहीं कर पाई हैं या यह कहना गलत नहीं होगा कि इस प्रश्न पर कोई विचार रखने में कम्युनिस्ट पार्टियां परहेज ही करती हैं। हमें यह जानना भी चाहिए कि कम्युनिस्ट पार्टियों की राजनीतिक बहसें आम नहीं होती हैं, राजनीतिक बहसों से निकली बातें आम नहीं होती हैं। सिर्फ कथित हिन्दू सांप्रदायिकता के विरोध के दुष्परिणामों पर ही नहीं बल्कि चीन के साथ निकटता और राष्ट्रवाद के प्रेरक बातों पर निकले दुष्परिणामों पर कम्युनिस्टों की चर्चा सामने नहीं आती है।

कम्युनिस्ट स्वीकार करें या नहीं करें, अपनी कमजोरियो को लेकर जनमानस की भावनाओं का खूब अनादर करें पर हर कोई यह जानता है कि कम्युनिस्ट पार्टियों की सांप्रदायिकता का अर्थ क्या है? वास्तव में कम्युनिस्ट पार्टियों की सांप्रदायिकता की समझ एकाकी है। कोई एकाकी सोच किसी की तस्वीर नहीं बना सकती है, कोई एकाकी सोच खोये हुए जनाधार की वापसी नहीं करा सकती है, कोई एकाकी सोच आपकी सत्ता में वापसी नहीं करा सकती है। सांप्रदायिकता के विरोध का अर्थ सिर्फ हिन्दू विरोध नहीं होता है। मुस्लिम सांप्रदायिकता के सामने घुटनाटेक नीति नुकसानदायक होता है। सोशल मीडिया में कम्युनिस्ट पार्टियों से लोग पूछते हैं कि पूजा करना या मंदिर जाना अंध विश्वास है तो फिर नमाज पढ़ना या फिर गिरजाघर जाना कौन सा विश्वास होता है? अगर हिन्दू धर्म को अपमानित करने वाले लेखको, चित्रकारों को अभियक्ति की स्वतंत्रा है तो फिर सलमान रूशदी, तस्लीमा नसरीन पर चुप्पी क्यों रहती है?

महावीर अकेला को पार्टी से क्यों निकाला गया। महावीर अकेला ने ‘ बोया पेड़ बबूल का ‘ नाम की पुस्तक लिखी थी। महावीर अकेला को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने इसलिए बाहर कर दिया था कि उसमें गैर हिन्दू धर्म वालों पर छोटी सी टिप्पणी थी। भारत परमाणु विस्फोट करे तो हिंसक और चीन-कोरिया परमाणु विस्फोट करे तो अहिंसक? कश्मीर के विस्थापित पंडितों के लिए एक शब्द नहीं बोलना और कश्मीर के मुस्लिम आतंकवादियों और पाकिस्तान परस्तों के पक्ष में बोलने और समर्थन देने की नीति को आज के युवा कैसे और क्यों स्वीकार करेंगे? अफजल को फांसी कोई हिन्दू समर्थक सत्ता ने नहीं पर बल्कि आपकी समर्थक कांग्रेस ने ही चढ़ायी थी पर टुकड़े-टुकड़े मानसिकता आपने क्यों पाली? सांप्रदायिकता की एकांकी विरोध से भी बढ कर देश विरोध की आत्मघाती नीति अपना खेल दिखायेगी ही, इससे इनकार कैसे किया जा सकता है?

कथित सांप्रायिकता के एकाकी विरोध के कुचक्र में जातिवाद को गले लगा लेना, भ्रष्टाचार को गले लगा लेना, क्षेत्रीयता को गले लगा लेना, जिहादी मानसिकता से ग्रसित मुस्लिम पार्टियों को गले लगा लेना, कहां तक उचित है और राजनीतिक नैतिकता की बात है। लालू घोर जातिवाद की उपज रहे हैं, कांग्रेस भ्रष्टाचार और वंशवाद की उपज हैं। देश के अंदर में लालू, मुलायम जैसे लोगों ने राजनीति में जातिवाद का जहर घोला है, सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि वंशवाद का जहर भी घोला है। राजनीति को जातिवाद और वंशवाद की रखैल बना छोड़ा है। जातिवादी दलों और कांग्रेस जैसी वंशवादी परिवार में परिवार से आगे कोई बढ़ सकता है क्या, क्या सोनिया के बेटा-बेटी के सामने और आगे कोई बढ़ सकता है? ऐसे दलों में विरोध करने वाले लोग दूध की मक्खी की तरह निकाल कर बाहर फेंक दिये जायेंगे। लालू, मूलायम, सोनिया गांधी के बेटे और बेटियां ही राजनीति के शिखर पर बैठेंगे? इनमें मजदूर और आम किसान की कोई संभावना ही नहीं होगी?

कम्युनिस्ट पार्टियां तो मजदूर-किसान और आम आदमी की बात करती हैं फिर मजदूर, किसान और आम आदमी जब लालू, मुलायम या फिर कांग्रेस की राजनीति में शिखर पर पहुंच ही नहीं सकते हैं तो फिर कम्युनिस्ट पार्टियों का ऐसे दलों के प्रति सहानुभूति क्यों रखती हैं? लालू चारा घोटाले में जेल में बंद है, कांग्रेस के काल में कितने घोटाले हुए, यह कौन नही जानता है? कम्युनिस्ट पार्टियों का यह दोहरा चरित्र जागरूक जन को स्वीकार नहीं हो सकता है। यही कारण है कि कम्युनिस्ट पार्टियों को इस दोहरे चरित्र के कारण आम जनता ने स्वीकार करना बंद कर दिया है।

जातिवाद, वंशवाद और भ्रष्टचार आधारित राजनीतिक दलों से गठबंधन कर कथित हिन्दू सांप्रदायिकता को रोकना, जनता के विश्वास को मांगना या फिर सत्ता के लायक जनादेश हासिल करना टेढी खीर है। फिर जातिवादी, वंशवादी, भ्रष्ट्राचारवादी जब सत्ता में आते हैं तो फिर कम्युनिस्ट पार्टियों के विचार को आगे तो बढ़ाते नहीं, कम्युनिस्ट पार्टियां उन सरकारों को जनाकांक्षी बनाने की वीरता दिखा तो पाती नहीं? जातिवाद, वंशवाद, भ्रष्ट्राचारवाद पर सत्ता हासिल करने वाली पार्टियां और भी जातिवादी हो जाती हैं, भ्रष्ट्राचारवादी हो जाती हैं, वंशवादी हो जाती हैं। जनाकांक्षी राजनीति प्रश्न गौण ही हो जाता है। कम्युनिस्ट पार्टियों को अब एकाकी संप्रदायिकता के जिहाद पर फिर से विचार करना चाहिए, राष्ट्र के प्रेरक तत्वों पर आत्मघाती प्रहार से बचना होगा, देश के गौरव चिन्हों पर गर्व करना होगा। सांप्रदायिकता के सभी कोणों पर प्रहार करना होगा, अगर आतंकवादियों के अधिकार हैं तो फिर कश्मीरी पंडितों के भी अधिकार हैं, यह सोचना होगा। गठबंधन की राजनीति, वह भी जातिवादी और वंशवादी राजनीति से परहेज करना ही बेहतर होगा। कम्युनिस्ट पार्टियो को खुद के बल पर खड़ा होना है, स्वावलंबी बनना और अपने जनाधार के विकास करना सीखना होगा। पर कम्युनिस्ट पार्टियां अभी भी अपनी एकाकी सोच से बाहर निकलने के लिए तैयार कहां हैं?

देश के कोई प्रेरक महापुरूष इनके आईकॉन तो होते नहीं। इनके आईकॉन तो सिर्फ लेनिन. स्तालिन और माओ है। लेनिन, स्तालिन और माओ जैसे कम्युनिस्ट शासक घोर तानाशाह थे। इनके हाथ खून से रंगे हुए थे। कम्युनिस्ट तानाशाही में पूरे विश्व में बीस करोड़ से अधिक लोगों को गरीबी, भूख और हिंसा की आग में जला दिया गया था।

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