मास्क को नकारने वाली राजनीति मुखौटों में ढूंढ रही जीत का टीका

रविचार |

मास्क से अच्छे तो मुखौटे हैं। पूरा ढकते हैं । भ्रम बढ़ाते हैं। सच छुपाते हैं। नया झूठ गढ़ते हैं। फिर उसे सच बताते हैं। सच बनाते हैं। इसीलिए मास्क को नकारने वाली राजनीति मुखोटों में खूब रमी हुई है। सबके अपने अपने मुखौटे हैं। पांच राज्यों के चुनाव के इस दौर में बड़ी-बड़ी रैलियों के बीच यह मुखौटे एक-एक करके सामने आ रहे हैं।

– अनिल कर्मा, संपादक, प्रजातंत्र

कहते हैं राजनीति कभी सीधी चाल नहीं चलती। न सुखारी में। न दुखारी में। महामारी में भी नहीं। दरअसल राजनीति का अपना ‘वायरस’ है। कोरोना से भी ज्यादा ‘किलर।’ यूके स्ट्रेन से भी ज्यादा ‘फास्ट।’ यहां कोई वैक्सीन कारगर नहीं है। जरूरत भी नहीं है। चाह भी नहीं। यहां टीका केवल जीत का चाहिए। किसी भी कीमत पर। चुनाव का कोई ‘प्रोटोकोल’ नहीं होता। यह तो ‘फोटो काल’ है। भीड़ इसका अनिवार्य अंग है। डिस्टेंस अपराध। मास्क इसमें अड़चन है। चेहरा पूरा नहीं दिखता। न पूरा ढकता। अधूरापन है। कौन नेता, प्रजा कौन, कौन अपना, उनका कौन, कैसे पहचानें? अजीब सा समाजवाद है। अस्वीकार्य। सांस घुटती है। आस टूटती है। मास्क से अच्छे तो मुखौटे हैं। पूरा ढकते हैं। भ्रम बढ़ाते हैं। सच छुपाते हैं। नया झूठ गढ़ते हैं। फिर उसे सच बताते हैं। इसीलिए मास्क को नकारने वाली राजनीति मुखौटों में खूब रमी हुई है। सबके अपने अपने मुखौटे हैं। पांच राज्यों के चुनाव के इस दौर में बड़ी-बड़ी रैलियों के बीच यह मुखौटे एक-एक करके सामने आ रहे हैं। खुद को बयां कर रहे हैं। कुछ मुखौटे बदल रहे हैं।

दरअसल पिछले कुछ समय में राजनीति की नई धारा ने कुछ समीकरण बदल कर रख दिए हैं। आडवाणी और फिर उनके बाद मोदी-शाह की भाजपा ने जो एक काम बड़े पुख्ता तरीके से किया, वह हिंदू वोटों को गोलबंद करने का है। कट्टर हिंदुत्व के मुखौटे ने धीरे-धीरे ही सही, मगर इस बात को स्थापित कर दिया है कि बाकी पार्टियों के मुकाबले भाजपा हिंदुओं के पक्ष में अधिक खड़ी है। इसी के सहारे भाजपा अन्य पार्टियों को हिंदू विरोधी या मुस्लिम परस्त बताकर प्रचारित करती है। ‘जय श्रीराम’ के नारे को अपना विजय उद्घोष बनाने वाली इस पार्टी ने अभी-अभी ‘दूरदर्शनिक राम’ अरुण गोविल को अपने खेमे में शामिल कर मुखौटे को संपूर्ण स्वीकार्य चेहरे में बदलने की ‘ट्रंप चाल’ चली है। ‘सीता मैया’ यानी दीपिका चिखलिया पहले से ही भाजपा में है। इस तरह ‘जय-जय सियाराम’ अब भाजपा में साकार है। इसे किसी भी रूप में भाजपा का ‘गुण’ या ‘दोष’ नहीं कहा जा सकता। राजनीति के मैदान में इसे रणनीति कहते हैं। ऐसी ही रणनीति कांग्रेस बरसों से तथाकथित रूप से मुस्लिमों की हितैषी बनकर अपनाती रही है। अब बदले दौर में उसकी वही रणनीति उसके गले की हड्डी बनी हुई है। पुराना मुखौटा उतार नहीं सकते। नया चढ़ाना भी जरूरी है। इसी कशमकश में राहुल गांधी मंदिर-मंदिर घूम रहे हैं और प्रियंका गंगा में डुबकियां लगा रहीं हैं।

पश्चिम बंगाल में देख लीजिए। तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ममता बनर्जी के साथ भी यही द्वंद्व है। हालांकि उन्होंने मुखौटे बदलने या एकाधिक मुखौटे रखने में कोई संकोच नहीं दिखाया है। 30 फ़ीसदी मुसलमान वोटों को साधने के लिए ममता ने भाजपा के ‘जय श्रीराम’ पर अपनी तकलीफ तो जाहिर कर दी, मगर 70 फ़ीसदी हिंदू वोट नाराज ना हो जाएं, इस डर से मंच पर चंडीपाठ कर एक साथ दो निशाने साधे । एक आस्थावान हिंदू होने का मुखौटा धारण करना, दूसरा 49 फ़ीसदी महिलाओं की मसीहा बनकर उभरना ( यह भी जरूरी था क्योंकि उज्जवला योजना और जन-धन योजना के मार्फत भाजपा ने महिलाओं में पैठ बना ली है।) एक और मुखौटा उन्होंने अपने पैरों पर प्लास्टर के रूप में चढ़ा रखा है। पीड़ित का। आहत का। यह उनका आजमाया हुआ नुस्खा है।

आइए, अब ‘आम आदमी’ की भी खबर लेते हैं। ‘खास’ बनने की चाह में उसे भी मुखौटे की तलाश है। जी हां, अरविंद केजरीवाल को भी समझ में आने लगा है कि अगर दिल्ली से बाहर निकलना है तो हिंदुत्व और राष्ट्रीयता के दो मुखौटे अब अपरिहार्य हैं। पिछले दिनों दिल्ली सरकार का बजट “देशभक्ति बजट” के नाम से पेश किया गया। पूरी दिल्ली में पाँच सौ विशाल राष्ट्रीय ध्वज फहराए जाने की भी तैयारी है। केजरीवाल खुद को भगवान हनुमान और भगवान राम का भक्त बता चुके हैं। इस बात को भी बार-बार कहा जा रहा है कि उनकी सरकार रामराज्य से प्रेरित 10 सिद्धांतों का पालन करती है। यानी मुखौटे की मजबूत मार्केटिंग।

मुखौटे असल नहीं होते। असल हो नहीं सकते। मगर मतदाता की मुश्किल यह है कि मास्क लगाना उसकी मजबूरी है और मुखौटों में से खोटों को पहचानकर अलग करना उसकी जिम्मेदारी। काम मुश्किल है। मगर जरूरी भी। आप क्या सोचते हैं?

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सच है कि भारत का लोकतंत्र बहुत मजबूत है। लोक के लिए बना यह तंत्र अगर कहीं कमजोर नजर आता है तो वह है इसमें समाहित घटिया राजनीति के वह स्रोत जिसने इसकी जड़ें कमजोर की हैं। सुखद यह है कि हमारे लोकतंत्र की ताकत को तोलना आसान नहीं।
प्रीतम लखवाल, इंदौर

भारतीय लोकतंत्र विश्व में सर्व श्रेष्ठ है। पता नहीं राहुल गांधी की आंख पर कौन-सा चश्मा चढ़ा है, जिससे उन्हें अपने ही देश का लोकतंत्र दिखाई नहीं दे रहा है।
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