सार्थक फिल्म पत्रकारिता के पुरोधा अरविन्द कुमार

बातें फिल्मों की |

उन दिनों फिल्म पत्रिकाओं में फिल्मों के मुहूर्त शॉट, क्लैप देने की रस्म, सांग रिकॉर्डिंग आदि के ढेर सारे फोटो, शूटिंग रिपोर्ट, फ़िल्मी गॉसिप, आने वाली फिल्मों का कथासार और फ़िल्मी सितारों के सतही इंटरव्यू आदि ही प्रमुखता से छपते थे। इसके अलावा फ़िल्मी सितारों के जन्मदिन और पार्टियों से जुड़ी चटखारेदार सामग्री भी परोसी जाती थी। ऐसे में अरविन्द कुमार ने इससे इतर फिल्म पत्रकारिता की नई ईबारत रचने की ठानी।

– विनोद नागर (फिल्म समीक्षक व स्तंभकार)

सौ साल से भी अधिक पुराने भारतीय फिल्मोद्योग को जब बॉलीवुड जैसा नाम नहीं मिला था और न ही करोड़ों रुपये कमाने वाली फिल्मों का कोई क्लब हुआ करता था, उस दौर में फिल्म पत्रकारिता भी अपने अनगढ़ दौर से गुजर रही थी। साठ और सत्तर के दशक में दिल्ली से निकलने वाली सुषमा, शमा और फ़िल्मी कलियाँ जैसी पत्रिकाओं की लोकप्रियता रेलवे स्टेशन और बस स्टैंड के बुक स्टाल से लेकर हेयर कटिंग सैलून तक सिमटी हुई थी। भद्र परिवारों के ड्राइंग रूम में धर्मयुग और साप्ताहिक हिन्दुस्तान जैसी सुरुचिपूर्ण पत्रिकाओं के बीच फिल्म पत्रिकाओं की कोई जगह नहीं थी। अंग्रेजी में फिल्म फेयर का जबरदस्त बोलबाला था। साप्त्ताहिक फ़िल्मी अखबार स्क्रीन (जिसके अधिकाँश पन्ने सिर्फ नई फिल्मों के पूरे पृष्ठ के विज्ञापनों से भरे होते थे) का वजूद अपनी जगह कायम था।

मेरठ में स्वतंत्रता सेनानी परिवार में जन्मे अरविन्द कुमार अपना पूरा जीवन जवाबदेह पत्रकारिता और शब्द साधना में खपाया है। दिल्ली हो या पुडुचेरी आज 91 वर्ष की पकी उम्र में भी वह हिन्दी भाषा के शब्द संधान के अपने जूनून को पूरा करने में लगे हैं।

ऐसे में साठ के दशक के मध्य ‘माधुरी’ ने फिल्म पत्रकारिता को नए से परिभाषित करने की सार्थक पहल की। यह बीड़ा उठाया पत्रिका के नए उर्जावान संपादक अरविन्द कुमार ने। ताज्जुब कि इस शख्स को फिल्म पत्रकारिता का रत्तीभर तजुर्बा नहीं था। सरिता, मुक्ता, कैरेवान जैसी पत्रिकाओं के सम्पादकीय विभाग की अच्छी खासी नौकरी छोड़कर मुंबई पहुंचे अरविन्द ने पत्रिका की कमान सम्हालते ही उसके कायाकल्प का खाका तैयार किया। प्रारंभ में पत्रिका का नाम ‘सुचित्रा’ था, जिसे बाद में बदलकर ‘माधुरी’ कर दिया गया।

उन दिनों फिल्म पत्रिकाओं में फिल्मों के मुहूर्त शॉट, क्लैप देने की रस्म, सांग रिकॉर्डिंग आदि के ढेर सारे फोटो, शूटिंग रिपोर्ट, फ़िल्मी गॉसिप, आने वाली फिल्मों का कथासार और फ़िल्मी सितारों के सतही इंटरव्यू आदि ही प्रमुखता से छपते थे। इसके अलावा फ़िल्मी सितारों के जन्मदिन और पार्टियों से जुड़ी चटखारेदार सामग्री भी परोसी जाती थी। अरविन्द ने इससे इतर फिल्म पत्रकारिता की नई ईबारत रचने की ठानी।

उन्होंने सुधि लेखकों और अपनी सम्पादकीय टीम के सहयोगियों के साथ मिलकर फिल्मों के सृजनात्मक पहलुओं को माधुरी के पन्नों में सुरुचिपूर्ण ढंग से सहेजने का सिलसिला प्रारंभ किया। पाठकों ने इस नवाचार को हाथों-हाथ लिया और देखते ही देखते माधुरी भारत में फिल्म जगत की सर्वाधिक लोकप्रिय और प्रतिष्ठित फिल्म पत्रिका बन गई। फिल्मों को महज सस्ते मनोरंजन का साधन मानने का मिथक तोड़ने में इस पत्रिका ने दो दशक से भी अधिक समय तक अहम् भूमिका निभाई।

करीब डेढ़ दशक तक माधुरी के संपादक रहे अरविन्द कुमार ने पत्रिका को लोकप्रियता की नई ऊँचाइयों पर पहुँचाने के बाद 1978 में उसके सम्पादकीय दायित्व से मुक्त होने का फैसला यूँ ही जल्दबाजी में नहीं ले लिया था। दरअसल कुछ और गंभीर काम करने की मंशा उनके दिल ओ दिमाग में घुमड़ रही थी। अर्धांगिनी कुसुमजी के सहयोग से समान्तर कोष (हिन्दी थिसॉरस) को पूरा करने में उन्हें करीब बीस साल का वक़्त लगा। इसका लोकार्पण देश की स्वाधीनता के पचासवें वर्ष में तत्कालीन राष्ट्रपति (स्व.) डॉ. शंकरदयाल शर्मा ने किया था। इस बीच अरविन्द रीडर्स डाइजेस्ट के हिन्दी संस्करण ‘सर्वोत्तम’ के संपादक भी रहे।

मेरठ में स्वतंत्रता सेनानी परिवार में जन्मे अरविन्द कुमार अपना पूरा जीवन जवाबदेह पत्रकारिता और शब्द साधनामें खपाया है। दिल्ली हो या पुडुचेरी आज 91 वर्ष की पकी उम्र में भी वह हिन्दी भाषा के शब्द संधान के अपने जूनून को पूरा करने में लगे हैं। फिल्मों पर लिखने वालों ने हाल में सार्थक फिल्म पत्रकारिता के पुरोधा अरविन्द कुमार को पद्म सम्मान से विभूषित करने की मांग उठाई है। देर आयद दुरुस्त आयद।

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