जहाँ तेरा नक्श-ए-क़दम देखते हैं

पुस्तक अंश | राजकुमार केसवानी की किताब-कशकोल

‘ कशकोल ‘ राजकुमार केसवानी का नया कारनामा है। इसमें उर्दू अदब के नुमाया किरदारों की जिंदगी के जाने-अंजाने सफ़हात को कहीं अक़ीदत भरे लफ़्ज़ों में तो कहीं मौसीक़ाराना हुनर वाली बंदिश की तरह इस खूबसूरती से बांधा गया है कि हर लफ़्ज़ एक गीत की तरह दिल में गूंज बनकर बस जाता है।

– राजकुमार केसवानी, लेखक

एक शहर है दिल्ली। कई नामों से मशहूर। किसी दौर में देहली तो किसी के लिए फकत दहली। अलग – अलग अकीदे के रहनुमाओं के लिए अलग – अलग जगहों पर आबाद सियासत की इबादतगाहें और दूसरी तरफ मजहब – ए – मुहब्बत के पैरोकारों की सजदागाहें।

ऐसी सजदागाहों से आबाद एक इलाका है बस्ती निजामुद्दीन। जो सड़क – सजक चले तो उसे हुमायूँ का मकबरा दिखाई दे जाये। और जो पीछे अन्दर की पेंचदार गली में जायें तो न जाने क्या – क्या पायें। ठेठ अन्दर तक जा पहुँचे तो दरगाह हजरत निजामुद्दीन में दाखिला हो जाये, हजरत के साथ ही इसी जगह अमीर खुसरो भी हासिल हो जायें। जरा कोशिश हो तो पास ही में शहजादी जहाँआरा का मकबरा भी मिल जाये, लेकिन याद रहे यहाँ तक पहुँचने से पहले और पहुँचकर लौटने के बीच एक और मजार है- मजार – ए – गालिब।

इस जगह पाँव यक ब – यक रुक जाते हैं। जहन में हलचल मच जाती है। हजारों शेर, सैकड़ों गजलें, अनगिनत किस्से, बेशुमार बातें और न जाने कितने आँसुओं और कहकहों के काफिले एक साथ इस जगह बने अपने घर को पहचान लेते हैं और बाहर आने को मचल जाते हैं।
‘हुई मुद्दत कि ग़ालिब मर गया , पर याद आता है,
वो हर इक बात पर कहना कि यूँ होता तो क्या होता।
जो होता तो क्या होता, यह तो खुदा जाने, उस घड़ी जो होता है तो वो यह होता है ‘ जी में आता है यहीं मर जाइये। और जो यूँ हो तो क्यों न हो? आखिर जब चचा गालिब थे तो मैं न था और अब जो हूँ तो नज़रों के सामने महज़ उनका मज़ार है। जिसकी इबादत में उम्र गुजरी, उसके क़दमों में जीते जी न सही, मरकर ही जगह मिल जाये तो क्या कहने।

जहाँ तेरा नक्श- ए – क़दम देखते हैं
ख़याबां ख़याबां इरम ‘ देखते हैं
चचा गालिब को ‘ तस्तुरे – जाना ‘ के लिए फुरसत की तलाश थी और मुझे चचा की बात करने के लिए हमेशा मौके की तलाश रहती है। कसमिया यह बात कह सकता हूँ कि अगर इतनी अक्ल होती, इतना हौसला होता तो उम्र भर एक ही बात करता- गालिब की बात। अगर फिके मआश नहीं बस मालिक की आस होती। बस बता ही रहता उनकी जिन्दगी को और इतराता रहता उसे होठों पर लिए – लिए।

अपने कुतुबखाने में लाल – पीले हो चुके पन्नों वाली किताबें खंगालता हूं तो लाखों मुश्किलों की हदें पार करके इस जगह सुकूनत इख्तियार करने वाले मिर्जा गालिब के बारे में न जाने किस – किस तरह की तहरीरें मिल जाती हैं। चचा गालिब के दीवान के एक-एक पन्ने पर जिन्दगी के न जाने कितने गुमशुदा सुराग मिलते हैं। उनका हुश्न यह कि जिसे भी मिलते हैं उसे अपने ही लगते हैं।

बकौल बशर नवाज-करोगे याद तो हर बात याद आएगी। अब इस जगह तो हर बात ही याद करनी है तो शुरूआत करता हूं मिर्जा गालिब के शुरुआत से।

शुरुआत होती है 27 दिसम्बर , 1797 से, जिस दिन मिर्जा अब्दुल्ला बेग के घर आगरा में एक बेटे की पैदाइश हुई । नाम रखा गया मिर्जा असद उल्ला। मिर्जा अब्दुल्ला बेग थे फौजी और आये दिन की जंग थी उस दौर का मूल। सो मिर्जा असद – उल्लाह जब महज़ चार बरस के ही थे कि उनके वालिद मुहतरम 1802 में अलवर की एक लड़ाई में गोली लगने से अल्लाह को प्यारे हो गये। यहाँ से उनकी परवरिश की ज़िम्मेदारी ले ली उनके चचा मिर्जा नसरुल्ला बेग ने। कुदरत के खेल कि महज़ चार बरस बाद ही चचा नसरुल्ला बेग भी हाथी से गिरकर फौत हुए।

बेदम शाह वारसी का शेर है : ” कश्तियाँ सबकी किनारे पे पहुँच जाती है / नाखुदा जिनका नहीं उनका खुदा होता है। सो बार – बार यतीम होते – होते भी मासूम मिर्जा असदउल्लाह खान की कश्ती भी खुदा के फ़ज़ल से चलती ही रही। चन्द शख्स – ख्वाहों ने ज़ोर लगाया तो उनके खानदान के लिए गुजर – बसर भर को अंग्रेजी सरकार से एक वज़ीफ़ा मंजूर हो गया। 1810 में मिर्जाजी जब 13 बरस के ही हुए थे कि उनकी शादी नवाब अहमद बख्श के छोटे भाई मिर्जा इलाही बख्श खान की बेटी उमराव बेगम से हो गयी।

शादी तेरी हो कि मेरी, जेब पर वज़न ज़रूर डालती है। फिर गालिब तो ठहरे ‘ खस्ताहाल, ‘ सो उनके लिए तो यह वज़न और भी भारी था। आगरा में उनके पास कोई रोजगार ही नहीं था। दिल्ली रोज़गार दे कि न दे कम अज़ – कम रोजगार की आस तो ज़रूर देती है। लिहाजा शादी के तीसरे साल ही, मतलब 1813 में गालिब आगरा छोड़ दिल्ली के हुए। कहावत है कि दिल्ली के लड्डू, जो खाये सो पछताये , जो न खाये सो पछताये। ‘ सो मिर्जा गालिब भी दिल्ली तो आ गये , लेकिन क्या मजाल कि मुश्किल आसां हो जाये। सो गालिब ने मुश्किलों के हल के लिए एक एक नई जुगत इजाद की- मुस्किलें मुख में पड़ीं इतनी कि आसां हो गयीं। पेंशन के झगड़े, पेंशन का मिलना और न मिलना, फिर मिलकर भी पूरा न पड़ना एक लम्बी कहानी है। कहीं आगे तो सुनानी है, पर फिलवक्त यहीं गुजर जानी है।

बहरहाल, एक छूट जाती बात जरूर इसी वक्त बतानी है। शेर कहने का सिलसिला तकरीबन दस बरस की उमर से ही छुट – पुट अन्दाज में आगरा से ही जारी हो चुका था। पहले तखल्लुस असद रखते थे, लेकिन बाद में जब एक दूसरे शाइर का तखल्लुस असद पता लगा तो उसे बदलकर गालिब को अपना लिया।

अन्दाजन 1811 में जब गालिब महज 14 बरस के मिर्जा असद उल्लाह ही थे कि किस्मत से उनकी मुलाकात एक ऐसी हस्ती से हो गयी कि जिसने मिर्जाजी की कुल शख्सियत को हमेशा – हमेशा के लिए बदल डाला । जनाब फिराक गोरखपुरी साहब की जबानी सुनिये।

जब मिर्जा नौशा ( गालिब ) चौदह बरस के थे, तो संयोग से उनकी मुलाकात एक ईरानी व्यक्ति से हुई। यह व्यक्ति पहले पारसी था और उसका नाम हरमुज्द था, लेकिन बाद में मुसलमान हो गया था और उसका नाम अब्दुस समद हो गया था। यह व्यक्ति पारसी धर्म – ग्रन्थों का प्रकाण्ड पण्डित था और काव्य – शास्त्र तथा फारसी भाषा का विद्वान था। ईरान से वह पर्यटन के लिए भारत आया था। मिर्जा ने उसे दो वर्ष अपने घर में आदरपूर्वक रखा और उससे फ़ारसी भाषा और उसके मुहावरे आदि की ऐसी पूर्ण शिक्षा प्राप्त की जो फारसी का कोई भारतीय विद्वान नहीं दे सकता था। चूंकि स्वयं ( गालिब ) भी वंश परम्परा की दृष्टि से ईरानी ही थे, इसलिए इस गुरु प्रभाव से वे पूर्णतः ईरानी रंग में रंग गये। भाषा और विचारों में नहीं, खान – पान, पहनने – ओढ़ने आदि में भी ईरानीपन की काफ़ी झलक मिलने लगी।

फारसी जबान का जादू गालिब पर यूं सवार हुआ कि वो किसी और जबान को उसके आगे गिनते ही नहीं थे। उनका पसन्दीदा शायर भी फारसी का उस्ताद शायर मिर्जा अब्दुल कादिर ‘ बेदिल ‘ ही था। फ़ारसी में लिखते हुए गालिब ने उन तक पहुँचने को बड़ा जोर मारा पर उस सारी कसरत का जोर जब नुमाया हुआ तो उर्दू में ही नुमाया हुआ। और जो यूँ हुआ तो चचा की अपनी जबान से ही यूं निकला कि :
हैं और भी दुनिया में सुखनवर बहुत अच्छे
कहते हैं कि गालिब का है अन्दाज़-ए-बयां और
मिर्जा गालिब की शराब – नोशी की कहानियाँ यूँ तो ज़माने में मशहूर हैं, लेकिन एक ज़रा यह भी सुन लीजिए। हाँ, तो किस्सा 19 वीं सदी की एक अज़ीम शख्सियत, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के संस्थापक सर सैयद अहमद खान और मिर्जा गालिब की मुलाक़ात का है। इस बेहद दिलचस्प मुलाक़ात और उससे निकली बात का शुरुआती बयान सर सैयद की ज़बानी :

जब मैं मुरादाबाद में था, उस वक़्त मिर्जा साहब, नवाब यूसुफ अली खान मरहूम से मिलने रामपुर गये थे। उनके जाने की तो मुझे खबर नहीं हुई मगर जब दिल्ली को वापस जाते थे, मैंने सुना कि वो मुरादाबाद में सराय में आकर ठहरे हैं। मैं फौरन सराय में पहुँचा और मिर्जा साहब को मय असबाब और तमाम हमराहियों के अपने मकान पर ले आया। अब जो मिर्जाजी आये तो क्या उनकी प्यारी शराब की बोतल न आती, जिसके बिना उन्हें कभी करार न था। तो साहब मिर्जा गालिब की सवारी पालकी में सर सैयद की रिहाइशगाह तक पहुँची । पालकी से उतरे तो वह बोतल भी उनके सीने से लगी लगी सी घर के अन्दर आ गयी। चूंकि शराब के मामले में किसी पर भरोसा करना गालिब को मंजूर नहीं था सो उस बोतल को उन्होंने घर में ऐसे मौके की जगह पर रख दिया कि हर वक्त उनकी नज़र के सामने बनी रहे। इस कोशिश का नतीजा यह भी हुआ कि वह बोतल उस जगह रख गयी जहाँ हर आते – जाते की निगाह भी पड़ जाती।

अब सर सैयद को यह बात ज़रा ठीक नहीं लगी सो मौक़ा मिलते ही पहला काम उन्होंने यह किया कि उसे उठाकर अन्दर बनी सामान रखने वाली एक कोठरी में महफूज कर लिया। गालिब की नज़र ने जब बोतल को अपनी जगह से नदारद पाया तो फ़िक्रमन्द हुए। सर सैयद को अपनी फिक्र से फौरन आगाह किया। वे मुस्कराये और बोतल के एकदम महफूज होने की इत्तिला दी।

आप खातिर जमा रखिए। मैंने उस बोतल को बहुत एहतियात से रख दिया है।
अब मामला बोतल का था तो गालिब किस तरह इक जुमले भर से मुमईन हो जाते। सो बोले-भई मुझे दिखा दो, तुमने कहां रखी है।

सर सैयद उन्हें कोठरी की तरफ ले गए और बोतल दिखा दी। मगर उस वक्त तो चचा की आँखों के अलावा हाथों में भी दम था। सो उन्होंने बोतल को हाथ में लेकर तसल्ली करना ही बेहतर समझा ।
उन्होंने जो बोतल उठाकर देखी तो मुस्कराकर यह भी कह दिया , भई इसने तो कुछ खयानत हुई है। सच बताओ, किसने पी है। शायद इसीलिए तुमने कोठरी में लाकर रखी थी।
दर हकीकत बोतल का माल जस का तस मौजूद था। लेकिन मंजर पर मिर्जा गालिब हों और कोई छेड न हो। जो यूँ होता तो क्यूँ होता? सो यह तो होना ही था। सो हुआ । रही बात सर सैयद की तो मेहमान की ऐड पर सिवाय मुस्कराने के और क्या जवाब होता। सो बस वो मुस्करा दिये।

 

फारसी जबान का जादू गालिब पर यूं सवार हुआ कि वो किसी और जबान को उसके आगे गिनते ही नहीं थे। उनका पसन्दीदा शायर भी फारसी का उस्ताद शायर मिर्जा अब्दुल कादिर ‘ बेदिल ‘ ही था। फ़ारसी में लिखते हुए गालिब ने उन तक पहुँचने को बड़ा जोर मारा। पर उस सारी कसरत का जोर जब नुमाया हुआ तो उर्दू में ही नुमाया हुआ।

दाग़ – ए – दिल गर नज़र नहीं आता …
अक्सर को यूँ होता है कि जब मिर्जा गालिब की बात निकलती है तो बस उन्हीं की बात बनकर रह जाती है। इसकी वजह भी है। उनकी शख्सियत और उनकी शायरी का सहर ‘ इस क़दर दिल – ओ – दिमाग पर तारी हो जाता है कि कुछ और दिखाई नहीं देता। और जो दिखता है तो बस उन्हीं के साए में दिखाई देता है।

सो हज़रात ! इससे पहले कि इस जादू की जद में आकर सब कुछ भूल जाऊँ, मैं बात करना चाहता हूँ इस जादूगर के पुश्त में खड़ी उस हस्ती की कि जिसने पसे – पर्दा रहकर हर कुर्बानी दी और उसकी ‘ उफ़ ‘ तक किसी को सुनाई नहीं दी। जिक्र है मिर्जा असद – उल्लाह खान की अहलिया, उनकी शरीक – ए – हयात यानी उनकी बीवी उमराव बेगम का।

उमराव बेगम , 1799 में दिल्ली के एक बड़े नामवर घराने में पैदा हुई। उनके वालिद मिर्जा इलाही बख्श ‘ मारूफ, लोहारू के नवाब अहमद बख्श के छोटे भाई थे। शायरी का शौक़ भी रखते थे और बाक़ायदा ‘ ज़ौक़ ‘ देहलवी के शागिर्द थे। बड़े ज़िन्दा – दिल इंसान और ज़िन्दगी को पुर – लुत्फ़ अन्दाज़ में जीने के अपने अन्दाज़ की वजह से शहर में ‘ शहज़ादा गुलफाम ‘ के नाम से ज्यादा जाने जाते थे। 9 अगस्त , 1810 को जब यह शादी हुई तो दूल्हा 13 बरस का और दुल्हन 11 बरस की थीं। दुल्हन की तो खुदा जाने दूल्हा मियाँ मतलब जनाब मिर्जा गालिब उर्फ मिर्ज़ा नौशा ने तो इस शादी को लेकर जो लिखा है, वह भी सुन लीजिए।

” 7 रजब 1225 हिजरी को मेरे वास्ते हुक्मे – हब्स ( उम्र कैद ) सादिर ( जारी ) हुआ। एक बेड़ी मेरे पाँव में डाल दी और दिल्ली शहर को जिन्दाना ( कैदखाना ) मुकर्रर किया और मुझे इस ज़िन्दाँ में डाल दिया । “

यह सच है कि मिर्जा गालिब की दिल्ली आमद की वजह यह शादी ही थी। क्योंकि अपनी पैदाइश के वक्त से ही वे आगरा में अपने ननिहाल में ही रहते आये थे कि वालिद साहब परदेस में नौकरी के बाइस साथ कम रह पाते थे। शादी के बाद बेहतर ज़िन्दगी की उम्मीद में दिल्ली आ बसे कि ससुर साशन बसे रसूखदार इंसान थे।

दिल्ली में गालिब की उम्र गुजरी , लेकिन खुशहाली की उम्मीद कभी बर नहीं आई। पैसे धेले से हाथ हरदम तंग रहा। कभी – कभी हालात यूं होते कि कुछ अच्छे दिनों में बने घर के सामान को बेचकर गुजारा करना पड़ता। दिन जद्दो – जहद , रात जद्दो – जहद।

इन हालात में एक खुशहाल घराने की बेटी उमराव बेगम ने खुशहाली का चोगा पहना रखा था। मजाल है कि मिर्जा साहब के दीवान में हर रोज लगने वाले दोस्तों और मुरीदों के मेले में शामिल होने वाले किसी शख्स की खातिर – तवजों में कोई कमी आयी हो ।

उमराव बेगम के किरदार की छोटी – छोटी झलकियाँ मिर्जा गालिब के आगरा में बचपन के एक बेहद करीबी दोस्त रहे बवेजा साहब के साहबजादे मालिक राम के जरिये मिलती है। पहली झलक देखिए।

इसके बाद वह (मिर्जा गालिब) मुझे अन्दर बेगम साहब के पास ले गये। वह उस वक्त जैन – उल – आब्दीन खान आरिफ मरहूम के दोनों साहबजादों, बाकर अली खान (6 बरस) और हसीन अली खान (3 बरस) को खाना खिला रही थीं। मिर्जा साहब ने मेरा तारुफ कराया और कहा कि यह मेरे अज़ीज़ है और रिश्ते में मेरे भतीजे होते हैं । किसी काम से यहाँ (दिल्ली) आये हैं। तुम्हारे पास ठहरेंगे, ज़रा खयाल रखना, इन्हें किसी किस्म की तकलीफ़ नहीं हो।

‘ मैं आदाब बजा लाया। बेगम साहब ने दुआ दी और फरमाया कि बेटा, तकलीफ का खाना खराब। अगर तुम्हें कोई चीज़ चाहिए तो किसी नौकर से कह दो या मुझे अन्दर कहलवा भेजो। मुहैया हो जायेगी। और अगर शरमा – शरमी में रहे तो तुम जानो। इसी वक्त यहाँ इस बात को दर्ज करना ज़रूरी हो जाता है कि इस खुशगवार बातचीत के पर्दे में गालिब और उमराव बेगम के बीच के खट्टे मीठे ताल्लुकात का दूसरा पहलू भी उजागर कर दिया जाये। एक तरफ मिर्जा गालिब में जहाँ एक अजब – सा दिल लुभावन फक्कड़पन, फाका – मस्ती का अन्दाज़ था तो दूसरी तरफ हर तरह के आराम और आसाइश के बीच पलकर आयी हुई उमराव बेगम के लिए इन मुश्किल हालात में खुद को ढालने में मुश्किलें पेश आना लाजिमी था। वह भी इतनी कम उम्र में।

जिन्दगी के इन दो धारों का मिलन बेहद मुश्किल था, लेकिन आफ़रीन है इन दोनों के उस बुलन्द पाया किरदार को कि लगभग रेल की पटरियों की तरह अलग – अलग रहकर भी साथ – साथ पूरी ज़िन्दगी गुजार दी। मिर्जा जी की दुनिया थी उनका दीवानखाना, वहाँ जमती महफ़िलों में उनकी जान बसती थी। इस दीवानखाने की साँसों को हरदम कायम रखने के लिए पीछे के हिस्से में बसी थी उमराव बेगम की दुनिया।

इक अजब रंग था कि मिर्जा नौशा (गालिब) घर पर हों न हों तो भी उनका दीवानखाना सदा आबाद रहता और बेगम साहिबा एक लाजवाब मेजबान की तरह उसे चमन बनाये रहतीं।

मालिक राम लिखते हैं … थोडी देर में मीर अहमद हुसैन ‘ मैकश ‘ आ गये। ये भी मिर्जा साहब के शागिर्द थे। इन अहबाब को देखकर कल्लू ( गालिब का ख़ास सेवक ) हुक्का ताज़ा करके ले आया। सबने कल्लू से कहा कि बेगम साहब की खिदमत में हमारा आदाब कहला दो … जब अन्दर इतल्ला हुई तो … गिलोरियों की थाली ले आए और कहा कि बेगम साहब सबको आदाब और बालमुकुन्द को दुआ कहती हैं और यह कहा है कि मिर्जा साहब अब आये जाते हैं। आप बैठिये और हुक्का पीजिए और पान खाइये। हम सब बैठे गप कर रहे थे कि दस बजे के लगभग मिर्जा साहब किले से लौटे।

मशहूर है कि गालिब एक डोमनी के फेर में रहे और खूब रहे। उसके मरने पर खूब आँसू भी बहाये और बहते आँसुओं से शेर भी लिखे। ऐसे हालात में ही उमराव बेगम के सब्र का पैमाना छलक जाना लाज़िमी था। बहरहाल किसी जगह इसके पुख्ता सुबूत किन्हीं अल्फाज़ में नहीं मिलते। अलबत्ता मियाँ – बीवी के ताल्लुकात को लेकर कुछ बयान ज़रूर मौजूद हैं। रिश्ते में मिर्जा गालिब की बहू मुअज्जम ज़मानी बेगम की तहरीर का एक हिस्सा सुनिये। ” इधर गालिब की शराबनोशी और मस्ती को इससे कोई सरोकार न था। जवानी से बुढ़ापे तक किसी मंजिल पर भी उनकी तबीयत इधर नहीं आयी। नौबत यहाँ तक पहुँची कि परहेजगार बीवी ने शराबी शौहर के खाने – पीने के बर्तन तक अलग कर दिये।

” एक और वजह मनमुटाव की – दोनों में से एक की संजीदगी और दूसरे का मसखरापन। गालिब की ठट्ठे की आदत अक्सर मौक़ों पर उमराव बेगम को ना – काबिले बरदाश्त मालूम होती थी। वह खोखला हँसोड़पन जिसके पीछे नाक़दरी और फ़ाका – मस्ती का भयानक चेहरा था, उस बीवी के लिए कोई मानी नहीं रख सकता था, जिसे अपनी बिरादरी से इज्जत – आबरू का ताल्लुक रखने के लिए खुदा जाने क्या – क्या जतन करने पड़ते थे।

(प्रकाशक-मंजुल पब्लिशिंग हाउस)

Next Post

सार्थक फिल्म पत्रकारिता के पुरोधा अरविन्द कुमार

Sun Mar 21 , 2021
बातें फिल्मों की | उन दिनों फिल्म पत्रिकाओं में फिल्मों के मुहूर्त शॉट, क्लैप देने की रस्म, सांग रिकॉर्डिंग आदि के ढेर सारे फोटो, शूटिंग रिपोर्ट, फ़िल्मी गॉसिप, आने वाली फिल्मों का कथासार और फ़िल्मी सितारों के सतही इंटरव्यू आदि ही प्रमुखता से छपते थे। इसके अलावा फ़िल्मी सितारों के […]