बुलंदी पर ठहरना कमाल होता है

सरकार का एक साल |

मुख्यमंत्री के रूप में शिवराज सिंह चौहान की चौथी पारी के एक साल पूरे हो गए हैं। चौथी पारी में शिवराज अलग अंदाज में बैटिंग कर रहे हैं। लगता है कि वह हाफ पिच पर आकर शॉट लगाने के मूड में हैं।

– धर्मेंद्र पैगवार, वरिष्ठ पत्रकार

मशहूर शायर अशोक साहिल ने सालों पहले एक शेर लिखा था
नजर नजर में उतरना कमाल होता है।
नफस नफस में उतरना कमाल होता है।।
बुलंदी पर पहुंचना कमाल नहीं।
बुलंदी पर ठहरना कमाल होता है।।

सालों पहले लिखा यह शेर मानों मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के लिए लिखा गया हो। 1980 के दशक में जब शिवराज विद्यार्थी परिषद और बाद में भारतीय जनता युवा मोर्चा के जरिए राजनीति के पहले पायदान पर कदम रख रहे थे तब किसी ने भी यह कल्पना नहीं की थी कि वह मुख्यमंत्री के रूप में मध्यप्रदेश में ऐसी पारियां खेलेंगे कि वह उन्हें इतिहास में अजर-अमर कर देंगी।

मुख्यमंत्री के रूप में शिवराज सिंह चौहान की चौथी पारी का एक साल पूरा हो गया। मध्य प्रदेश की राजनीति के तीन दशक मानो शिवराज सिंह चौहान के इर्द-गिर्द घूमते रहे हैं। 1985 से 90 के बीच कांग्रेस की ही सरकार थी। तब भारतीय जनता युवा मोर्चा का प्रदेश अध्यक्ष रहते शिवराज सिंह चौहान ने सड़क पर रहकर अपने साथियों के साथ जो संघर्ष किया था वह किसी से छुपा नहीं है। क्रांति मशाल यात्रा, साइकिल यात्रा, परिवर्तन यात्रा और सुंदरलाल मोगरा हत्याकांड पर गांव-गांव में सरकार की मुखालफत। 1990 में जब पटवा सरकार बनी तो इसका श्रेय युवा मोर्चा के लगातार चलाए गए आंदोलनों को भी दिया गया।

2018 विधानसभा चुनाव के पहले जो राकेश सिंह प्रदेश अध्यक्ष बन कर शिवराज सिंह चौहान के लिए चुनौती बनने की कोशिश कर रहे थे वह पार्टी में हाशिए पर हैं। जिन गोपाल भार्गव को शिवराज सिंह चौहान ने नेता प्रतिपक्ष बनवाया था, वे सत्ता परिवर्तन के दौरान मुख्यमंत्री पद के दावेदार हो गए थे। वह भार्गव अब सरकार में तीसरे नंबर के मंत्री हैं। बहुत राजनीतिक कौशल के साथ शिवराज सिंह चौहान सरकार और संगठन दोनों को साधे हुए हैं।

मौजूदा दौर में जब भी शिवराज सिंह चौहान के मुख्यमंत्रित्व काल की बात होती है तो उनकी उपलब्धियों में 2008 और 2013 के चुनाव जोड़े जाते हैं। लेकिन जो लोग मध्य प्रदेश की राजनीति और शिवराज सिंह चौहान को काफी करीब से जानते हैं। वे इस हकीकत को स्वीकारते हैं कि 1990 में प्रदेश में बनी भाजपा सरकार में बहुत बड़ा योगदान शिवराज सिंह चौहान और उनके साथियों के सड़क पर किए गए संघर्ष का भी था। 80 के दशक में शिवराज सिंह चौहान में जो जोश और जुनून था वह चार बार मुख्यमंत्री बनने के बाद भी कायम है। वे कभी भी आम आदमी के लिए सड़क पर उतर आते हैं। मुख्यमंत्री के रूप में भले ही वह देश के बड़े उद्योगपतियों टाटा, बिड़ला और अंबानी से मिलते हो लेकिन गांव के कोटवार को गले लगाने में उन्हें कोई गुरेज नहीं है। मैले कुचेले कपड़े पहने आदिवासियों को वह गले लगा लेते हैं।

कोई हादसा हो तो फिर पीड़ितों के परिजनों के साथ सड़क पर बैठकर विलाप भी करते हैं। सीधी बस हादसे में मारे गए लोगों के परिजनों के साथ जिस भावुकता से शिवराज सिंह चौहान मिले और उनका दर्द बांटा उनकी यही संवेदनशीलता उन्हें बाकी राजनेताओं से अलग करती है। मुख्यमंत्री के रूप में चौथी पारी का 1 साल पूरा करने वाले शिवराज सिंह चौहान ने वक्त के साथ बहुत कुछ सीखा है।

1990 में बुधनी से पहली बार विधायक चुने गए थे। 1991 के लोकसभा चुनाव में अचानक अटल बिहारी वाजपेई को विदिशा से उम्मीदवार बनाया गया। अटल जी चुनाव जीते लेकिन विदिशा से इस्तीफा दे दिया। तब सुंदरलाल पटवा मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। उन्होंने शिवराज सिंह चौहान को विदिशा उप चुनाव में उम्मीदवार घोषित कर दिया। उस वक्त जिस तेजी से शिवराज आगे बढ़ रहे थे तब माना जा रहा था कि वह भविष्य में मध्य प्रदेश का नेतृत्व करेंगे। पटवा जी के साथ स्वर्गीय कैलाश नारायण सारंग, शिवराज के बड़े भाई और हित चिंतक के रूप में खड़े थे। लोकसभा में भेज कर शिवराज को प्रदेश निकाला देने की बात पर वह उस वक्त प्रसन्न नहीं थे। उन्होंने शिवराज जी से कहा कि तुम्हें तो आगे मध्य प्रदेश की सत्ता संभालनी है लोकसभा क्यों जा रहे हो। तब शिवराज जी ने बहुत आत्मविश्वास के साथ वापस आने की बात कही थी। इस चुनौती को शिवराज सिंह चौहान ने अवसर में बदला। पहले युवा मोर्चा के राष्ट्रीय महामंत्री बने तो फिर युवा मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष। बहुत कम उम्र में ही पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव भी बनाए गए। जब अटल बिहारी वाजपेई जैसे नेता देश के प्रधानमंत्री थे तब शिवराज सिंह चौहान के पास पार्टी के महासचिव की जिम्मेदारी थी।

चुनौतियों को अवसर में बदलने की उनकी यही कला आगे भी काम आई। डेढ़ साल में मध्यप्रदेश में दो मुख्यमंत्री बदलने के बाद पार्टी ने उन्हें प्रदेश अध्यक्ष की कमान सौंपी। पार्टी को लेकर सड़क से लेकर सदन तक उनकी हाड़ तोड़ मेहनत ही मुख्य वजह थी कि 29 नवंबर 2005 को उन्हें पहली बार मुख्यमंत्री बनाने का निर्णय लिया गया। शिवराज सिंह चौहान एक ऐसे नेता के रूप में मुख्यमंत्री की शपथ ले रहे थे जिसने कभी किसी राज्य में या केंद्र में मंत्री के रूप में भूमिका नहीं निभाई थी। उन्हें कोई प्रशासकीय अनुभव भी नहीं था। उनके विरोधियों के लिए यह उनका माइनस पॉइंट था। लेकिन शिवराज जी ने इस चुनौती को भी स्वीकार किया शुरुआती कार्यकाल में ही उन्होंने अपने कई फैसलों से राजनीतिक आलोचकों को चुप कर दिया। इसमें पार्टी में उनके धुर विरोधी भी शामिल हैं।

29 नवंबर 2005 के बाद शिवराज सिंह चौहान ने एक बार फिर कभी अपने कदमों से तो कभी हेलीकॉप्टर के जरिए पूरे प्रदेश को नापा। जनता के दुख तकलीफ को उन्होंने बेहतर तरीके से समझा। पहली ही पारी में वे मतदाताओं की नब्ज समझ गए। इसके बाद उनके फैसले जनता के बीच उन्हें जननायक के रूप में स्थापित करते रहे। विरोधियों के द्वारा फेंके गए पत्थरों को इकट्ठा करके उन्होंने एक बड़ा महल तैयार कर दिया। युवा मोर्चा के समय से ही पार्टी में उनकी जो विरोधी रहे वह लोग कितने ही आरोप लगाने के बाद भी शिवराज का कुछ बाल बांका नहीं कर सके। पार्टी के बाहर के विरोधियों को भी शिवराज ने चारों खाने चित किया। लाड़ली लक्ष्मी योजना, कन्यादान योजना, गरीबों के लिए तीर्थ दर्शन और हर गरीब को मुफ्त अनाज बांटने की योजनाओं ने शिवराज को रातों-रात हर दिल अजीज बना दिया।

पहली दूसरी और तीसरी हर पारी के बाद शिवराज में निखार आया। उन्होंने बेहतर प्रशासक नहीं होने की आलोचनाओं को अपने कड़े फैसलों से शांत किया। पार्टी कार्यकर्ताओं की सरकार में उपेक्षा के आरोपों से गिरने के बाद भी उन्होंने कई जमीनी कार्यकर्ताओं को मौके देकर संतुष्ट किया। वर्ष 2018 के चुनाव में शिवराज पार्टी का चेहरा थे कांग्रेस से अधिक मत प्राप्त करने के बाद भी वह सरकार नहीं बना पाए। विपक्ष में रहते 15 महीनों में उन सभी कमियों पर चिंतन किया जो 2018 के चुनाव में रह गईं थीं। उन्होंने कुछ सीट कम आने के बाद जोड़-तोड़ की बजाए इस्तीफा देकर खुद को एक परिपक्व नेता साबित किया। जब भाजपा कांग्रेस की अंदरूनी कलह का फायदा लेने की कोशिश कर रही थी तब भी वे अधीर नहीं हुए और तटस्थ रह कर पर्दे के पीछे पार्टी के मिशन में लगे रहे।

यही वजह थी कि जब पूरा देश कोरोना से जूझ रहा था। उस वक्त भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को मध्यप्रदेश में नए मुख्यमंत्री का चयन करना था। पार्टी के सामने 29 सीटों पर उपचुनाव की चुनौती थी। पिछड़ा वर्ग बाहुल्य मध्यप्रदेश में जनता के बीच जाकर उपचुनाव जीतकर यदि कोई सरकार को स्थायित्व दे सकता है, तो उसके लिए एक बार फिर शिवराज सिंह चौहान का नाम ही संगठन को याद आया। मीडिया गॉसिप और चंदू खाने की वे खबरें जो मोदी- शााह से शिवराज की दूरियों को लेकर कही जा रही थी, उन्हें पार्टी नेतृत्व और शिवराज दोनों ने एक ही फैसले के जरिए खारिज कर दिया। उनको चौथी बार मुख्यमंत्री बनाने का फैसला बताता है कि मध्य प्रदेश की जनता के साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व का पूरा भरोसा शिवराज पर कायम है।

चौथी पारी में शिवराज अलग अंदाज में बैटिंग कर रहे हैं। वे फार्म में हैं। जिस तरीके से वे फैसले ले रहे हैं उससे लगता है कि वह हाफ पिच पर आकर शॉट लगाने के मूड में हैं। एक कुशल प्रशासक की तरह उन्होंने सत्ता के सारे सूत्र अपने हाथ में रखे हुए हैं। संगठन से भी उनका बेहतर तालमेल है। 2018 विधानसभा चुनाव के पहले जो राकेश सिंह प्रदेश अध्यक्ष बन कर शिवराज सिंह चौहान के लिए चुनौती बनने की कोशिश कर रहे थे वह पार्टी में हाशिए पर हैं। जिन गोपाल भार्गव को शिवराज सिंह चौहान ने नेता प्रतिपक्ष बनवाया था, वे सत्ता परिवर्तन के दौरान मुख्यमंत्री पद के दावेदार हो गए थे। वही भार्गव अब सरकार में तीसरे नंबर के मंत्री हैं। बहुत राजनीतिक कौशल के साथ शिवराज सिंह चौहान सरकार और संगठन दोनों को साधे हुए हैं। नागपुर से लेकर दिल्ली तक उन्होंने अपने काम से वाहवाही बटोरी है। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष विष्णु दत्त शर्मा के साथ उनका अच्छा समन्वय है। जनता के साथ पार्टी नेतृत्व का भरोसा भी उन पर बरकरार है।

चुनौती को अवसर में बदला
कोरोना महामारी ने जन-स्वास्थ्य को तो प्रतिकूल रूप से प्रभावित किया ही, प्रदेश की अर्थ-व्यवस्था की कमर तोड़ कर रख दी। एक ओर हर नागरिक को कोरोना से बचाव व उपचार के लिए नि:शुल्क एवं उत्कृष्ट चिकित्सा सुविधा देना तथा दूसरी ओर लॉकडाउन से ध्वस्त व्यापार, व्यवसाय एवं सेवा क्षेत्र को नवजीवन देने का कार्य वही व्यक्ति कर सकता है, जिसके जीवन का एकमात्र उद्देश्य जनता जनार्दन की सेवा करना हो।

मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने गत एक वर्ष की अल्प अवधि में यह कार्य कर दिखाया है। उन्होंने गंभीर चुनौती को अवसर में बदला तथा न केवल प्रदेश में कोरोना के संक्रमण को प्रभावी ढंग से रोका, कोरोना पीड़ितों को सर्वश्रेष्ठ इलाज मुहैया कराया, टीकाकरण अभियान का सफल संचालन किया अपितु मृतप्राय अर्थ-व्यवस्था में नवजीवन का संचार भी किया।

23 मार्च 2020 – यही वह दिन था, जिस दिन शिवराज सिंह चौहान को चौथी बार मध्यप्रदेश की बागडोर मिली। कोरोना महामारी ने प्रदेश में पाँव पसार लिए थे और उसकी रोकथाम एवं उपचार की कोई व्यवस्था नहीं थी। शिवराज सिंह चौहान को इस संकट का भली-भांति अंदेशा था। इसीलिए वे शपथ ग्रहण करने के पश्चात सीधे मंत्रालय गए और कोरोना की व्यवस्थाओं के संबंध में बैठक ली। फिर युद्ध स्तर पर कोरोना के संक्रमण को रोकने तथा हर कोरोना पीड़ित को सर्वश्रेष्ठ इलाज देकर स्वस्थ करने का कार्य प्रारंभ हुआ। प्रदेश में आईआईटीटी अर्थात इन्वेस्टिगेट, आईडेंटिफाई, टेस्ट एंड ट्रीट की रणनीति पर प्रभावी ढंग से कार्य किया गया। मुख्यमंत्री चौहान प्रतिदिन वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से प्रत्येक जिले के साथ कोरोना की स्थिति एवं व्यवस्थाओं की समीक्षा करते थे और एक-एक गंभीर मरीज के इलाज की स्वयं मॉनिटरिंग करते थे। उनके लिए हर जान कीमती थी, जिसे वे गँवाना नहीं चाहते थे। परिणाम था कोरोना पर प्रभावी नियंत्रण, कोरोना रिकवरी रेट का निरंतर बढ़ना और मृत्यु दर का न्यूनतम होना।

लाकडाउन होते ही एक बड़ी समस्या थी, मध्यप्रदेश के मजदूरों का देश के कई राज्यों में फँसा होना और अन्य राज्यों के मजदूरों का मध्यप्रदेश में होना। इन सब के खाने, आवास, दवाइयों आदि की व्यवस्था कोई सरल कार्य नहीं था। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने संकल्प लिया कि हर मजदूर को चाहे वह मध्यप्रदेश का हो अथवा बाहर का, सभी आवश्यक सुविधाएँ दी जाएंगी। रोटी, पानी, आवास से लेकर उनके लिए जूते-चप्पलों तक की व्यवस्था सरकार द्वारा की गई।

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