प्रतिज्ञा से डिगे नहीं, सत्य में ही सम्पूर्ण लोक प्रतिष्ठित है

गुनो भई साधो |

पूरी चित्रकूट सभा में एक प्रसंग ऐसा है जिसे वाल्मीकि ने पूरे साहस से रखा पर तुलसी ने योजनाबद्ध ‘गोल’ कर दिया। वह है भरत की प्रार्थना को स्वीकार न करने पर महर्षि जाबालि का राम को समझाना। इसमें कही गई श्रीराम की बातें सत्यनिष्ठा की सच्ची सीख देती है।

– डॉ. विवेक चौरसिया, पौराणिक साहित्य के अध्येता

गोस्वामी तुलसीदास ने अपने श्रीरामचरितमानस की रचना का आधार भले आदिकाव्य रामायण को बनाया हो पर चित्रकूट सभा के सौंदर्य और सुगन्ध की स्थापना में वे महर्षि वाल्मीकि से कई सोपान ऊपर खड़े हैं। चित्रकूट में वाल्मीकि के भरत श्रीराम के अयोध्या न लौटने पर अपने साथ वन ले चलने की प्रार्थना तो करते हैं पर तुलसी के भरत की भाँति यह प्रस्ताव नहीं देते कि हे राम! यदि दो भाइयों को वन जाना ही है तो आप और लक्ष्मण अयोध्या लौट जाइए और बदले में मैं व शत्रुघ्न 14 बरस ले लिए वन चले जाते हैं। मानो तुलसी ने जिस प्रकार अपने सुंदरकांड में हनुमानजी की गरिमा को चरम सीमा पर जाकर चित्रित किया उसी प्रकार चित्रकूट सभा में अपने भरत को अनकहे ही श्रीराम के समतुल्य गरिमा से अलंकृत कर दिया है। यहाँ तक कि तुलसी ने अपने आराध्य श्रीराम के श्रीमुख से अनुज के सम्मान में कहलवा दिया कि ‘मिटिहहिं पाप प्रपंच सब अखिल अमंगल भार, लोक सुजसु परलोक सुखु सुमिरत नामु तुम्हार!’

वाल्मीकि रामायण में भाइयों के बीच ह्रदय खोलकर एक-दूसरे के लिए बिछ-बिछ जाने वाला यह निर्मल-निश्छल प्रेम नहीं है। न ही राम द्वारा भरत की इतनी बढ़-चढ़कर बढ़ाई कि ‘हे भरत! तुम्हारा नाम स्मरण करते ही सब पाप, अज्ञान और समस्त अमङ्गलों के समूह मिट जाएंगे। ऐसा करने पर इस लोक में सुंदर यश और परलोक में सुख प्राप्त होगा।’ अभिव्यक्ति और प्रस्तुति का यह अंतर देशकाल और समाज की आवश्यकता के अनुरूप है। वाल्मीकि राम के समकालीन हैं और तुलसी ने अपना महाकाव्य रामराज के हज़ारों बरस बाद लिखा है। इसलिए अंतर स्वाभाविक है।

जाबालि दशरथ के ऋत्विज थे और वसिष्ठ, भरत आदि के साथ राम को अयोध्या लौटाने चित्रकूट गए थे। वाल्मीकि रामायण के अयोध्याकांड का 108 वाँ अध्याय इन्हीं के वचनों से भरा है।

पूरी चित्रकूट सभा में एक प्रसङ्ग ऐसा है जिसे वाल्मीकि ने पूरे साहस से रखा पर तुलसी ने योजनाबद्ध ‘गोल’ कर दिया। वह है भरत की प्रार्थना को स्वीकार न करने पर महर्षि जाबालि का राम को समझाना। वाल्मीकि रामायण में जाबालि और राम के इस संवाद में जाबालि के तर्कों का खंडन करते हुए कही गई श्रीराम की बातें सत्य के धर्म और मर्म को सुविधानुसार लाँघ कर ‘पलटी मार जाने वाले’ अवसरवादियों को सत्यनिष्ठा की सच्ची सीख देती है।

जाबालि दशरथ के ऋत्विज थे और वसिष्ठ, भरत आदि के साथ राम को अयोध्या लौटाने चित्रकूट गए थे। वाल्मीकि रामायण के अयोध्याकांड का 108 वाँ अध्याय इन्हीं के वचनों से भरा है। जब भरतादि सबके अनुनय विनय के बाद भी वचन की आन के लिए राम लौटने को तैयार न हुए तब जाबालि ने उन्हें अपने ही ढंग से समझाने का प्रयास किया। बोले, ‘हे राम! संसार में कौन किसका बन्धु है और किससे किसको क्या पाना है? जीव अकेला ही जन्म लेता है और अकेला ही नष्ट हो जाता है। राजा (दशरथ) को जहाँ जाना था, वहाँ चले गए। यह प्राणियों के लिए स्वाभाविक है। फिर आप क्यों वन जाने का कष्ट उठाते हैं? देवताओं के लिए यज्ञ और पूजन करो, दान दो, यज्ञ की दीक्षा ग्रहण करो और घर-द्वार छोड़कर संन्यासी बन जाओ इत्यादि बातें बताने वाले ग्रन्थ बुद्धिमान मनुष्यों ने दान और लोगों की प्रवृत्ति कराने के लिए ही बनाए हैं।’ और जाबालि अंत में बोले, ‘स नास्ति परमित्येतत् कुरु बुद्धिं महामते। प्रत्यक्षं यत् तदातिष्ठ परोक्षं पृष्ठत: कुरु।।’ अर्थात् हे महामते! आप अपने मन में यह निश्चय कीजिए कि इस लोक के सिवा कोई दूसरा लोक नहीं है। अतः वहाँ फल भोगने के लिए धर्म पालन की आवश्यकता नहीं है। जो प्रत्यक्ष राज्य लाभ है, उसका आश्रय लीजिए और परोक्ष पारलौकिक लाभ को पीछे ढकेल दीजिए।

तुलसी ने जाबालि प्रसङ्ग को अपने मानस में इसलिए स्थान नहीं दिया क्योंकि जाबालि की बातें ‘नास्तिकता’ से भरी थी। उनके सब कथन लौकिक लाभ का समर्थन कर रहे थे जबकि ‘आस्तिकता’ इससे आगे पारलौकिक हित की पक्षधर होती है। वाल्मीकि के राम भी राज्य की तुलना में सत्य का ही चयन करते हैं और जाबालि के मत का प्रबल खंडन करते हैं। रामायण की कथा प्रमाण है कि जब जाबालि ने अपनी बात पूरी की तब राम बोले, ‘आचार ही बताता है कि कौन उत्तम कुल में जन्मा है और कौन अधम कुल में। कौन वीर है और कौन व्यर्थ ही अपने को पुरुष मानता है। कौन पवित्र है और कौन अपवित्र?’

राम ने कहा, ‘यद्यपि आपने मेरे हित की बात कही पर यदि मैं प्रतिज्ञा तोड़कर वन के बजाय राज्य स्वीकार लेता हूँ तो उस दशा में इस जगत् में दुराचारी तथा लोक को कलंकित करने वाला समझा जाऊंगा।’ कामवृत्तोSन्वयं लोक: कृतस्र: समुपवर्तते। यद् वृत्ता: सन्ति राजानस्तद् वृत्ता: सन्ति हि प्रजा:।। अर्थात् ‘आपके बताए हुए मार्ग से चलने पर पहले तो मैं स्वेच्छाचारी बनूंगा। फिर यह सारा लोक स्वेच्छाचारी हो जाएगा, क्योंकि राजाओं के जैसे आचरण होते हैं, प्रजा भी वैसा ही आचरण करने लगती है।’ स्मरण रखे कि दशरथ ने कभी राम को वन जाने की आज्ञा न दी थी। राम केवल कैकयी के वचन को सिर माथे धर निर्विकार निर्विचार वनवास पर निकल पड़े थे। चूँकि एक बार वे प्रतिज्ञा पूर्वक राज की जगह वन का चयन कर चुके थे, अतः निर्णय में परिस्थितिजन्य संशोधन उन्हें स्वीकार नहीं हुआ।

साधो! श्रीराम ने ठीक ही कहा था, ‘सत्यमेवानृशंसं च राजवृत्तं सनातनम्। तस्मात् सत्यात्मकं राज्यं सत्ये लोक: प्रतिष्ठित:।।’ अर्थात् सत्य का पालन ही राजाओं का दयाप्रधान धर्म है और सनातन आधार है। राज्य सत्य स्वरूप है। सत्य में ही सम्पूर्ण लोक प्रतिष्ठित है। सीख यह कि सब राम को लौटाना चाहते थे और जाबालि ने तर्को से लौटने का मार्ग सही भी सिद्ध कर दिया था पर सत्य से कभी न डिगने वाले राम न लौटे। क्या तब राम लौट जाते तो आज ‘श्रीराम’ बन पाते!

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