न्याय को पेचीदा बनाने की कोशिश!

किशोर न्याय |

नए विधेयक में जिला मजिस्ट्रेट (डीएम) को जेजे एक्ट की धुरी बना दिया गया है। न्यायालय और राज्य शासन की भूमिका को एक तरह से विलोपित ही करके नया कानून जिला मजिस्ट्रेट को सर्वेसर्वा बनाने वाला है। यह इस संशोधन का डरावना पक्ष है।

– डॉ. अजय खेमरिया,  स्वतंत्र लेखक

संसद के बजट सत्र में सरकार ने किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2021प्रस्तुत किया है। इस विधेयक में मौजूदा किशोर अधिनियम 2015 में कुछ बुनियादी बदलाव सुनिश्चित किये जा रहे हैं। महिला बाल विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने कहा है कि प्रस्तावित बदलाव किशोर अधिनियम को सशक्त, एवं समावेशी बनाने में सहायक होंगे। सुप्रीम कोर्ट ने भी शिल्पा मित्तल बनाम राष्ट्रीय राजधानी राज्य 2020 दांडिक अपील संख्या 34 में सरकार को इस कानून के कतिपय दुविधाजनक प्रावधानों में परिवर्तन का निर्देश दिया था। नया संशोधन प्रस्ताव जेजे एक्ट की व्यावहारिक समस्याओं के शमन की गारंटी अवश्य प्रतिध्वनित करता है लेकिन अनुभवजन्य तथ्य यही प्रमाणित करते हैं कि कानून का यह स्वरूप क्रियान्वयन के स्तर पर राज्य और सिविल सोसायटी की प्रतिबद्धता को कटघरे में खड़ा करता रहा है।

नए प्रस्ताव सिद्धांतत: उजले भविष्य की इबारत भले ही कहते हों लेकिन देश भर के बाल अधिकार विशेषज्ञ इन अधिकांश प्रस्तावों के जरिये अफसरशाही की परम्परागत कुसंस्कृति हावी होने का अंदेशा व्यक्त कर रहे हैं। नए विधेयक में जिला मजिस्ट्रेट (डीएम) को जेजे एक्ट की धुरी बना दिया गया है। न्यायालय और राज्य शासन की भूमिका को एक तरह से विलोपित ही करके नया कानून जिला मजिस्ट्रेट को सर्वेसर्वा बनाने वाला है। एडॉप्शन, बाल गृह, बाल कल्याण समिति,जेजेबी और अपील जैसे मामलों में अब जिला मजिस्ट्रेट ही सर्वशक्तिमान इकाई होगी। यह इस संशोधन का डरावना पक्ष है। सर्वविदित तथ्य है कि डीएम मूलतः एक कलेक्टर के रूप में ही काम करते हैं और जिन मामलों में वे जिला मजिस्ट्रेट होते हैं वहां भी उनकी कार्य संस्कृति एक सुप्रीम ब्यूरोक्रेट्स की ही होती है। मसलन राजस्व मामलों में वे जिस तरह से मजिस्ट्रेट की भूमिका का निर्वहन 70 वर्षों से करते आ रहे हैँ वह देश भर के लिए एक बुरा और औपनिवेशिक अनुभव ही है। ऐसे में सिद्धान्त: डीएम का प्रावधान भले ही न्यायालय की तुलना में त्वरित निस्तारण की प्रतिध्वनि देता हो लेकिन व्यवहार में यह बाल संरक्षण प्रतिबद्धता को अफसरशाही का मोहताज बनाने वाला है। नए प्रस्ताव में अब गोद लेने की पूरी प्रक्रिया में डीएम या एडीएम निर्णायक होंगे अभी यह कार्य एडीजे स्तर के न्यायाधीश करते हैं।

बाल कल्याण समितियों में नियुक्तियों से जुड़ी अहर्ताएं इस विधेयक में प्रमाणिकता से परिभाषित की गई हैं जिसके चलते सुशिक्षित एवं अनुभवी लोग ही अब इन समितियों में आ सकेंगे। विधेयक में संगीन और गंभीर अपराधों में होने वाले ट्रायल और सजा के मामले को भी स्पष्टता से परिभाषित किया गया है जिसे लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में सवाल उठाया था।

सरकार का दावा है कि न्यायालय में अनावश्यक बिलंब होता है इसलिए डीएम को यह अधिकार दिए जा रहे हैं कि अब दत्तक ग्रहण के आदेश पारित कर सकेंगे। इस प्रस्ताव के बाद जिला बाल संरक्षण इकाई जिसके कार्यकारी मुखिया पहले से ही डीएम हैं जेजे एक्ट की धारा 63 के तहत दत्तक ग्रहण प्रमाणपत्र जारी करेंगे। मूल अधिनियम की धारा 16 में अब डीएम को यह अधिकार दिया जा रहा है कि वह किसी भी मामले में सीडब्ल्यूसी, जेजेबी की विचाराधीन फाइल को अपने यहां बुला सकेंगे। इसके प्रभावी होते ही इस बात की पूरी संभावना है कि डीएम की व्यवस्था पर कलेक्टर का रुतबा हावी हो जाएगा। हाल ही में ग्वालियर कलेक्टर के ऐसे ही एक आदेश को मप्र उच्च न्यायालय ने एरर ऑफ ज्यूरिडिक्शन का केस मानकर खारिज किया है। यानी कतिपय दबाब या स्टेक होल्डर्स के मध्य टकराव की स्थिति में कलेक्टर का शक्तिशाली पक्ष सदैव जेजे एक्ट पर हावी रहने की संभावना होगी। नए प्रस्तावों में बाल देखरेख संस्थाओं के पंजीयन में डीएम को अधिकृत किया गया है लेकिन सवाल उनकी मौजूदा भूमिका को लेकर इसलिए भी है क्योंकि जिन राज्यों में संस्थागत गड़बड़ी या बालशोषण के मामले सामने आते हैं वहां डीएम ने अपनी विहित भूमिका का निर्वहन क्यों नही किया है। जबकि वे अपने जिले की बाल संरक्षण इकाइयों के प्रमुख हैं। व्यवहारिक पक्ष यह है कि कलेक्टर की रुतबेदार भूमिका से डीएम कभी बाहर आ ही नही पाते हैं और आईसीपीएस (एकीकृत बाल संरक्षण) जैसी योजना जिसे जेजे एक्ट के क्रियान्वयन के लिए डिजाइन किया गया है महिला बाल विकास विभाग के मैदानी अमले के रहमोकरम पर चल रही है।

देशभर में इस योजना के तहत अल्प वेतन संविदाकर्मियों से काम लिया जा रहा है। हर जिले में इन कर्मियों से दूसरे सरकारी काम कराए जाते हैं और जिस योजना में इन्हें भर्ती किया गया है वह निचली प्राथमिकता में बनी हुई है। दूसरा पहलू आईसीपीएस में मिशन मोड़ कार्य संस्कृति का नितांत अभाव होना है। महिला बाल विकास के प्रमुख सचिव या कमिश्नर दूसरी फ्लैगशिप स्कीमों बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ,पोषण आहार,पोषण मिशन को अपनी प्राथमिकता पर रखते है। नतीजतन जिला स्तर पर भी आईसीपीएस जेजे एक्ट की भावना के अनुरूप क्रियान्वित नही हो पाई है। खासबात यह है कि जिला कलेक्टर इस योजना के भी सुपर स्टेकहोल्डर हैं। फिलहाल देश भर में बाल कल्याण समितियों, अन्य संबद्ध संस्थाओं औऱ महिला बाल विकास विभाग के मध्य स्थाई टकराव बना रहता है क्योंकि सरकारी तंत्र इन समितियों को अपने हिसाब से चलाने की कोशिशें करते हैं उन्हें एक्ट की मूल भावना के अनुरूप काम करने की जगह सरकारी ढर्रे पर चलाना चाहते हैं।

एक्ट में कलेक्टर अभी केवल नस्तियों पर दस्तखत भर की रुचि दिखाते हैं जो उनके समक्ष महिला बाल विकास के अफसरों द्वारा प्रस्तुत की जाती है। ऐसे में नए प्रस्ताव एक तरह से जेजे एक्ट में डीएम के नाम से कलेक्टर राज की बहाली का मार्ग प्रशस्त करने वाले है। जबकि यह कानून सिविल सोसायटी की भागीदारी पर अबलंबित है। सवाल यह है कि डीएम पहले से ही औसतन 50 जिला स्तरीय कमेटियों के मुखिया कलेक्टर के रूप मे होते हैं और वे किन कतिपय दबाबों में काम करते हैं यह भी जगजाहिर है। इन परिस्थितियों में अतिशय अधिकारों के साथ जिलों में डीएम की न्यायसम्मत भूमिका आईएएस अफसर निभा पायेंगे? डीएम इन मामलों में एडीएम को भी अधिकृत कर सकेगें औऱ डीएम के निर्णयों की अपील कमिश्नर के यहां प्रस्तावित है। पहले तो यह सुष्पष्ट ही है कि व्यावहारिक रूप से डीएम या एडीएम केवल महिला बाल विकास महकमे की नस्तियों को ही निस्तारित करेंगे और इन निर्णयों की अपील कमिश्नर कार्यालय में राजस्व मामलों की तरह ब्यूरोक्रेसी के पक्ष में नही होगी इसकी कोई गारंटी नही है। यानी गतिरोध या आधिकारिता के सभी सवाल अब ब्यूरोक्रेसी की चौखट पर तय होंगे। इसलिए संशोधन प्रस्तावों को कानून में परिवर्तित करने से पहले भारतीय ब्यूरोक्रेसी की सामंती कार्य संस्कृति पर भी उदारता के साथ विचार किये जाने की आवश्यकता है। जेजे एक्ट में सबसे अहम कड़ी बाल कल्याण समितियां हैं जिन्हें एक तरह से डीएम यानी कलेक्टर के खौफ़ में कार्य करने की संस्कृति भी इन प्रस्तावों से निर्मित होने जा रही है। दत्तक ग्रहण या बालकों के पुनर्वास से लेकर पॉक्सो में पीड़िताओं के मामलों में प्रभावशाली लोग मनमाने निर्णय डीएम के माध्यम से नहीं करा पायेंगे इसकी भी कोई गारंटी अब तक अनुभवों से नहीं है।

हालांकि बाल कल्याण समितियों में नियुक्तियों से जुड़ी अहर्ताएं इस विधेयक में प्रमाणिकता से परिभाषित की गई हैं जिसके चलते सुशिक्षित एवं अनुभवी लोग ही अब इन समितियों में आ सकेंगे। अभी तक राजनीतिक और प्रशासकीय अनुकम्पा से बड़ी संख्या में अपात्र लोग जगह पा जाते थे। विधेयक में संगीन और गंभीर अपराधों में होने वाले ट्रायल और सजा के मामले को भी स्पष्टता से परिभाषित किया गया है जिसे लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में सवाल उठाया था। संरक्षण औऱ आवश्यकता वाले बालकों की शब्दकोशीय परिभाषा को समावेशी बनाते हुए प्रस्ताव में बाल तस्करी, ड्रग पीड़ित बच्चों को भी शामिल किया जाना स्वागत योग्य है। इनके अलावा बालक की पहचान स्थाई रूप से अप्रकट करने संबंधी धारा 74 में प्रस्तावित संशोधन भी सराहनीय है जिसके तहत पुलिस सत्यापन या चरित्र प्रमाणपत्र में विधि विरुद्ध किसी भी बालक की जानकारी निषिद्ध की जा रही है।

(लेखक बाल कल्याण समिति ग्वालियर के अध्यक्ष है)

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