जनसंख्या नीति के साथ डीएनए डेटा संधारण पर विचार की जरूरत

– कौशल मूंदड़ा

पिछले दिनों से देशभर में जनसंख्या नीति को लेकर बड़ी बहस छिड़ी हुई है। इसी बीच, कर्नाटक हाईकोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा है कि माता-पिता नाजायज हो सकते हैं लेकिन संतान नहीं क्योंकि अपने जन्म में बच्चे की कोई भूमिका नहीं होती। इन्हीं दो मुद्दों पर गहराई से मंथन किया जाए तो अब देश में डीएनए डेटा संधारण की जरूरत महसूस होने लगी है।

पहली बार ऐसा हुआ है कि देश की एक राज्य सरकार ने तीसरी संतान होने पर हर तरह की सरकारी सब्सिडी व सुविधाएं स्थगित करने का प्रावधान निर्धारित किया है। अबतक ऐसा नहीं होता था इसलिए दो से अधिक संतानों पर भी सब्सिडी व सुविधाएं मिलती रहती थीं और देश में हो रहे जनसंख्या विस्फोट के विषय पर व्यक्ति सरोकार नहीं रखता था। अब व्यक्ति सोचने पर मजबूर होगा।

इसी के साथ बलवती होती इस आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता कि सख्त जनसंख्या नीति माता-पिता को संतान का त्याग करने पर भी मजबूर कर सकती है। इसे दूसरे शब्दों में यूं भी कहा जा सकता है कि तीसरी संतान के त्याग का तरीका अपनाकर जनसंख्या नीति को चुनौती दी जा सकती है। अबतक हम यही मानते रहे हैं कि सामाजिक लोकलाज के भय से नन्हीं-सी जान को अनाथालय के पालने में दूसरों के भरोसे छोड़ने की मजबूरी होती है अथवा आकस्मिक विपत्ति इस मजबूरी का कारण बनती है जब माता-पिता का साया सिर से उठ जाता है। लेकिन अब निहित स्वार्थों के चलते तीसरी संतान के त्याग का चलन न बन जाए, यह आशंका बनी रहेगी।

भले सरकार दो संतानों के बाद तीसरे गर्भ के सुरक्षित समाधान के लिए प्रावधान बना ले लेकिन कतिपय नीति विरोधी ताकतें जनसंख्या को बढ़ाने के लिए संतानों को अनाथालयों के पालनों में डालने का तरीका अपना सकती हैं। हो सकता है कि अनाथालय भी चुनिंदा हों जो इस तरह के षड्यंत्र में शामिल हों। अब अनाथालयों में आए बच्चों को तो सरकार को संभालना ही होगा। इससे कोई भी सरकार इनकार नहीं कर सकती।

ऐसी आशंकाओं में डीएनए का डेटा बैंक बेहद कारगर साबित हो सकता है। बच्चों के पैदा होते ही उनके माता-पिता के डीएनए के साथ उसका डीएनए लेकर सरकार आधारकार्ड जैसे पहचान पत्र में इसे शामिल कर सकती है अथवा सरकार इसे गोपनीय डेटा के रूप में भी अपने पास संग्रहित रख सकती है। ऐसे में अनाथालय के पालने में पहुंचने वाले बच्चे के जनकों का भी पता लगाना आसान हो सकेगा। हालांकि, सरकार को अस्पतालों पर मॉनिटरिंग रखनी होगी कि वे डीएनए डेटा संग्रहित करने में ईमानदारी बरतें। ऐसे बच्चे जिनके माता-पिता के डीएनए डेटा की उपलब्धता न हो सके, उनका रिकॉर्ड अलग से वर्गीकृत करने के प्रावधान पर भी विचार करना होगा।

कर्नाटक हाईकोर्ट की टिप्पणी पर बात करें तो हाईकोर्ट की चिंता उस बच्चे को लेकर है और सही भी है कि उस बच्चे का आखिर क्या दोष। ऐसे मामलों में भी डीएनए डेटा बैंक का प्रावधान कारगर साबित हो सकता है। अव्वल तो डीएनए डेटा बैंक जिस दिन से बनना शुरू होगा, तब से उम्मीद की जा सकती है कि अनैतिक कृत्यों और अपराधों में कमी शुरू हो जाए। ऐसे अपराधियों की पहचान करना कानून के लिए आसान होगा। इससे भी ऊपर उन आपराधिक मानसिकता के लोगों पर दबाव होगा जो झांसा देकर किसी भी युवती के साथ अनैतिक सम्बंध बनाते हैं और बाद में उनका त्याग कर देते हैं। डीएनए के मामले में देश में एक बड़े राजनेता का मामला चर्चित भी रहा और डीएनए उस मामले में न्याय का आधार बना था।

मोहनलाल सुखाडि़या विश्वविद्यालय, उदयपुर की सेवानिवृत्त छात्रकल्याण अधिष्ठाता मनोविज्ञानी और समाजशास्त्री प्रो. विजयलक्ष्मी चौहान कहती हैं कि नागरिकों के डीएनए डेटा का संग्रहण न केवल जनसंख्या नियंत्रण की नीति को धोखा देने वालों की पहचान करा सकती है, बल्कि इस डेटा का उपयोग अपराधियों की मानसिकता को समझने और विभिन्न बीमारियों के उपचार ढूंढ़ने में भी हो सकता है। वे कहती हैं कि सामाजिक सुरक्षा के साथ राष्ट्रीय सुरक्षा में भी इस डेटा का उपयोग महत्वपूर्ण साबित होगा, बशर्ते सरकार इस डेटा की सम्पूर्ण सुरक्षा की नीति पुख्ता बनाए क्योंकि शातिर मानसिकता वाले लोग दूसरों को फंसाने के लिए भी ऐसे डेटा का इस्तेमाल कर सकते हैं।

कुवैत ने हिंसा और आतंकवाद पर अंकुश के लिए डीएनए सैम्पल लेने का नियम बनाया था। अमेरिका में भी किसी भी मामले में गिरफ्तार या हिरासत में लिए गए लोगों का डीएनए लिया जाता है। ऑस्ट्रेलिया, स्वीडन में भी ऐसा नियम है। हालांकि, इसका कई जगह मानवाधिकार संस्थाओं की ओर से पुरजोर विरोध भी किया गया है लेकिन किसी अपराध के मामले में डीएनए सैम्पल लेने का नियम कई देशों में लागू है। भारत में भी वर्ष 2015 में मोदी सरकार द्वारा वर्ष 2012 में तत्कालीन केन्द्र सरकार द्वारा लाए गए बिल को संशोधित करके ह्यूमन डीएनए प्रोफाइलिंग बिल – 2015 प्रस्तुत करने की कवायद की गई थी, तब यह चर्चा में रहा था। आज के परिप्रेक्ष्य में इसकी जरूरत समझी जा सकती है।

चाहे जनसंख्या नीति के लिए हो, अनैतिक अपराध कम करने के लिए हो अथवा राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला हो, डीएनए के डेटा बैंक की अवधारणा पर विचार आज की परिस्थितियों में आवश्यक हो गया है। चाहे वृहद स्तर पर हो या सीमित स्तर पर, इस पर विचार करना अब समय की जरूरत हो गई है। आधार कार्ड में अंगुलियों के निशान और आंखों की पुतलियों के स्कैन का डेटा सरकार के पास सुरक्षित है तो डीएनए का डेटा भी सुरक्षित रह सकता है।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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